भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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तृतीयाऽध्याय १ आन्हिक ५५ उ०-(किसी इन्द्रिय से उस के विषय को ग्रहण करने पर) अन्य इन्द्रिय में विकार उत्पन्न होने से (आत्मा देहादि से पृथक् है) ॥ किसी अम्ल द्रव्य को चक्षु से देखने अथवा घ्राण से उस का गन्ध ग्रहण करने पर रसना में विकार उत्पन्न होता है, अर्थात् मुंह में पानी भर आता है। यदि इन्द्रियों को ही चेतन माना जावै तो यह बात हो नहीं सकती कि अन्य के देखे को कोई और स्मरण करे। इस लिये इन्द्रियों से पृथक् कोई आत्मा है ॥ अब इस पर शङ्का करते हैं:— न, स्मृतेः स्मर्त्तव्यविषयत्वात् ॥ १३ ॥ पू०—स्मृति के स्मर्त्तव्यविषयिणी होने से (पृथक् आत्मा के मानने की कोई आवश्यकता) नहीं ॥ स्मरणयोग्य विषयों का अनुभव करना स्मृति का धर्म है, वह स्मृति स्मर्त्तव्य विषयों के योग से उत्पन्न होती है, उसी से इन्द्रियान्तरविकार उत्पन्न होते हैं। जिस मनुष्य ने एक बार निंबू के रस को चाखा है, दूसरी वार उस को स्मरण करने से उस के मुंह में पानी भर आता है, सो यह स्मृति का धर्म है, न कि आत्मा का ॥ अब इस का समाधान करते हैं:— तदात्मगुणसद्भावादप्रतिषेधः ॥ १४ ॥ उ०—उस के आत्मगुण होने से (आत्मा का) निषेध नहीं हो सकता ॥ स्मृति कोई द्रव्य नहीं है, किन्तु वह आत्मा का एक गुण है, इस लिये उक्त आक्षेप युक्त नहीं है। जब स्मृति आत्मा का गुण है तभी तौ अन्य के देखे का अन्य को स्मरण नहीं होता। यदि इन्द्रियों को चेतन मानोगे तो अनेक कर्त्ता होने से विषयों का प्रतिसन्धान न होसकेगा, जिस से विषयों की कोई व्यवस्था न रहेगी अर्थात् कोई देखेगा और कोई स्मरण करेगा और यह हो नहीं सकता। यह व्यवस्था तौ तभी ठीक रह सकती है जब कि अनेक अर्थों का एक द्रष्टा भिन्न २ निमित्तों के योग से पूर्वानुभूत विषयों का स्मरण करता हुवा इन्द्रियान्तरविकारों को उत्पन्न करता है, ऐसा माना जायगा। क्योंकि अनेक विषयों के द्रष्टा को ही दर्शन के प्रतिसन्धान से स्मृति का होना सिद्ध हो सकता है, अन्यथा विना आधार के स्मृति किस में रहे ? इस के अति- रिक्त "मैं स्मरण करता हूं" यह प्रत्यय (जो बिना किसी भेद के प्रत्येक मनुष्य को होता है) भी स्मृति का आत्मगुण होना सिद्ध करता है ॥