वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद उ०-एक के नाश होने पर दूसरी का नाश न होने से एकता नहीं हो सकती॥ यदि चक्षु इन्द्रिय एक ही होता तो एक आंख के नष्ट होने पर दूसरी भी नहीं रहती, परन्तु यह प्रत्यक्ष सिद्ध है कि एक आंख के फूट जाने पर दूसरी शेष रहती है और उस से आंख का काम लिया जाता है। इस लिये चक्षु एक नहीं॥ पुनः पूर्वपक्षी इस पर आक्षेप करता है:- अवयवनाशेऽप्यवयव्युपलब्धेरहेतुः ॥ १० ॥ पू०-अवयव का नाश होने पर भी अवयवी की उपलब्धि होने से ( उक्त हेतु ) अहेतु है ॥ उक्त हेतु ठीक नहीं है क्योंकि अवयव के नाश होने पर भी अवयवी की उपलब्धि देखने में आती है। जैसे-वृक्ष की किन्हीं शाखाओं के कट जाने पर भी वृक्ष की उपलब्धि होती है, ऐसे ही अवयव रूप एक चक्षु के विनाश होने पर भी दूसरे चक्षु में अवयवी की उपलब्धि शेष रहती है। इस लिये चक्षुद्वैत मानना ठीक नहीं ॥ अब सिद्धान्त सूत्र के द्वारा समाधान करते हैं:- दृष्टान्तविरोधादप्रतिषेधः ॥ ११ ॥ उ०—दृष्टान्त के विरोध से निषेध नहीं हो सकता ॥ दृष्टान्त के विरोध से चक्षुर्द्वैत का निषेध नहीं हो सकता, क्यों कि जैसे शाखायें वृक्ष रूप अवयवी का अवयव हैं, तद्वत् एक चक्षु दूसरे चक्षु का अव- यव नहीं अर्थात वे दोनों ही अवयव हैं। अवयवी उन का कोई और है। अतः दृष्टान्त में विरोध आने से निषेध युक्त नहीं। अथवा दृश्यमान अर्थ के विरोध को दृष्टान्तविरोध कहते हैं। मृत मनुष्य के कपाल में नासास्थि का व्यवधान होने पर भी दो छिद्र भिन्न २ रूप से स्पष्ट दीख पड़ते हैं। यों तो हृदय का व्यवधान होने से दोनों हाथों को भी कोई एक कह सकता है, परन्तु यह दृश्यमान अर्थ का साक्षाद्विरोध है इस लिये चक्षुरैक्य ठीक नहीं और जब चक्षु दो सिद्ध हो गये, तब एक के देखे हुवे अर्थ की दूसरे को प्रत्य- भिज्ञा होना यह सिद्ध करता है कि उस प्रतिभिज्ञा का कर्त्ता इन्द्रियों से भिन्न कोई और ही पदार्थ है और वही चेतन आत्मा है ॥ फिर उसी की पुष्टि करते हैं:- इन्द्रियान्तरविकारात् ॥ १२ ॥