वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
व्याप्ति है। उस व्याप्तिज्ञान को या तो व्यभिचाररहित बहुधा साहचर्य से वा एक बार साहचर्य से, जिस का जिस के साथ ग्रहण हो उस को उस का अनुमान कराने वाला लिङ्ग समझना चाहिये ॥ जैसा कि रसोई घर आदि बहुत स्थानों में साधन धर्म धूमादि को अग्नि आदि से साहचर्य देखते हैं, इस से यह निश्चित ज्ञान होता है कि जहां २ धुवा है, वहां २ अग्नि का अनुमान करना चाहिये । यह तो निश्चित साध्यवाला सपक्ष है । और जहां पर्वतादि में साध्य धर्म विषयक यह संदेह हो कि यहां अग्नि आदि है वा नहीं? यह संदिग्ध साध्यवान् पक्ष है ॥ अनुमान करने के साधन ( करण ) को " अनुमान " कहते हैं । क्रिया करने के असाधारण क्रियायुक्त साधन को " करण "कहते हैं। जो कारण से उत्पन्न होकर किसी कार्य को उत्पन्न करती है, वह " क्रिया " कहाती है, इसी को " व्यापार " भी कहते हैं । जैसा कि छेदन एक क्रिया वा व्यापार है, उस क्रिया का क्रियायुक्त असाधारण साधन कुठार है, उस कुठार को 'करण' कहेंगे । और छिन्न होने वाले काष्ठ से छेदन उत्पन्न होकर छेदनानन्तर हुवे द्वैधीभाव का उत्पादक होने से छेदन ( काष्ठ पर कुठार के आघात ) का नाम " क्रिया " हुआ ॥ भाव यह है कि जो छेदन क्रिया में साधन रूप कुठार करण है, उस लिङ्ग का ज्ञान, बिना व्याप्ति ज्ञान के हो नहीं सकता । व्याप्ति ज्ञान प्रसिद्धि से होता है, प्रसिद्धि बहुतायत से अनुभव द्वारा होती है । जब बहुत बार कुठार से आघात करके काष्ठ का छेदन अनुभव में आता है तब तब काष्ठ और कुठार के संयोग से छेदन क्रिया में अनुमान होने लगता है ॥ जैसे अग्नि का धुंवे से अविनाभाव सम्बन्ध = व्याप्ति है । इसी प्रकार रस से भी अविनाभाव सम्बन्ध है । पृथिवी जल तेज इन तीनों में रूप सदा रहता है, और पृथिवी तथा जल में रस सदा रहता है । अर्थात् जहां पृथिवी है वहां गन्ध है, जहां तेज है वहां रूप है, जहां जल है वहां रस है, तथा जहां पृथिवी जल तेज हैं वहां रूप है, यह व्याप्ति पाई जाती है। इस प्रकार गन्ध पृथिवीत्व का व्यापक है, पृथिवीत्व गन्ध का भी व्यापक है तथा पृथिवीत्व गन्ध का व्याप्य है और गन्ध पृथिवीत्व का भी व्याप्य है अर्थात् दोनों में परस्पर व्याप्य व्यापक सम्बन्ध है । इसी को समानव्याप्ति