वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 160 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत की षष्ठी विभक्ति का अर्थ "का, के, की" होता है। उदाहरण- देवदत्त का शिर, यज्ञदत्त के हाथ, विष्णुमित्र की जङ्घा इत्यादि । इस से पाया जाता है कि देवदत्त और शिर एक ही होते तो 'देवदत्त का शिर' यह षष्ठी ( का ) प्रयोग में न आती । आती है, इस से पाया जाता है कि शिर, हाथ, जङ्घा आदि से देवदत्त यज्ञदत्तादि संज्ञा वाले आत्मा भिन्न हैं । जैसे 'देवदत्त का घोड़ा' कहने से देवदत्त और घोड़ा एक नहीं हो सकते, इसी प्रकार देवदत्त का शिर, हाथ, पांव कहने से देवदत्त ही शिर हाथ पांव नहीं हो सकते । इस से पाया जाता है कि आत्मा ही देहादि संज्ञक नहीं है ॥ १३०-प्रसिद्धिपूर्वकत्वादपदेशस्य ॥ १४ ॥ ( अपदेशस्य ) लिङ्ग के ( प्रसिद्धिपूर्वकत्वात् ) प्रसिद्धिपूर्वक होने से ॥ सूत्र ९ में कह आये हैं कि इन्द्रियार्थों की प्रसिद्धि, इन्द्रियार्थों से भिन्नार्थ का हेतु है । क्योंकि लिङ्ग प्रसिद्धिपूर्वक हुआ करता है, इस कारण प्रसिद्धि से जिस की जिस के साथ व्याप्ति ज्ञात हो, उस को उस का लिङ्ग समझना चाहिये । जैसे अग्नि की धूम के साथ व्याप्ति है, इस लिये धूम अग्नि का लिङ्ग है ॥ " व्याप्ति " क्या पदार्थ है, इस के विषय में लगभग एक दूसरे से मिलते जुलते कई प्रकार के मत हैं । कोई तो कहते हैं कि-किसी वस्तु का स्वा- भाविक और अव्यभिचारी ( अटल ) सम्बन्ध जो साध्य और साधन में है, वह व्याप्ति कहाता है । इसी को कोई अविनाभाव सम्बन्ध कहते हैं, इस का भी वही तात्पर्य है कि एक का दूसरे के बिना न होना, अर्थात् व्यभिचारराहित्य से नित्य सम्बन्ध । कोई इसी व्याप्ति को साहचर्य नियम कहते हैं। नवीन लोग इसी व्याप्ति पदार्थ को बड़े जटिल शब्दों में कहते हैं कि- साध्यवत्प्रतियोगिकभेदाधिकरणनिरूपितवृत्तित्वाऽभाव= व्याप्ति है, अथवा:- हेतुसमानाधिकरणात्यन्ताभावा- ऽप्रतियोगिसाध्यसमानाधिकरणता=