भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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५६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद १११-लिङ्गाच्चाऽनित्यः शब्दः ॥ ३२ ॥ ( लिङ्गात् ) लिङ्ग से ( च ) भी ( शब्दः ) शब्द (अनित्यः) अनित्य है। उत्पत्तिमान् होना शब्द का लिङ्ग है, उस से भी शब्द की अनित्यता सिद्ध है ॥ आगे पूर्व पक्ष करते हैं:- ११२-द्वयोस्तु प्रवृत्त्योरभावात् ॥ ३३ ॥ ( द्वयोः ) दोनों ( तु ) ही ( प्रवृत्त्योः ) प्रवृत्तियों के ( अभावात् ) अभाव से ॥ यदि शब्द अनित्य होता तो दोनों (गुरु शिष्यों) की प्रवृत्तियें न होतीं। क्योंकि अध्यापक जिस अनित्य शब्द को पढ़ाने में उच्चारण करता, वह तो उच्चारण करते ही नष्ट हो जाता, अतः फिर अध्येता शिष्य उसी शब्द की पुनरावृत्ति न कर सकता, क्यों कि गुरु का बताया तो उसी समय नष्ट हो गया समझना चाहिये, परन्तु हम देखते हैं कि गुरु के उच्चारण किये शब्दों को शिष्य ज्यों का त्यों बोलते हैं, जिस से शब्द अनित्य नहीं, किन्तु नित्य जान पड़ता है ॥ अन्य हेतु से भी शब्द अनित्य नहीं जान पड़ता कि- ११३-प्रथमाशब्दात् ॥ ३४ ॥ ( प्र-शब्दात् ) प्रथमा शब्द से ॥ ऐतरेय ब्राह्मण ३ । ३ में लिखा है कि-"त्रिः प्रथमामन्वाह, त्रिरुत्तमाम्” ऋग्वेद ३ । २१ । १ से ११ तक ऋचायें सामिधेनी संज्ञक हैं, उन में से प्रथमा ( पहली ) ऋचा को तीन बार पढ़ा जाता है और अन्त की ऋचा को भी। यदि शब्द अनित्य होता तो एक ऋचा ३ बार कैसे पढ़ी जाती क्योंकि एक वार पढ़ी हुई अगले क्षण में शब्द की अनित्यता से नष्ट हो जाती, इस से पाया जाता है कि शब्द अनित्य वा उच्चरितप्रध्वंसी नहीं, किन्तु स्थिर वा नित्य है ॥ इसी पक्ष में तीसरा हेतु और भी देते हैं कि:- ११४-सम्प्रतिपत्तिभावाच्च ॥ ३५ ॥ ( संप्र-भावात् ) ठीक २ पहचान रहने से ( च ) भी ॥ यदि शब्द अनित्य होता तो एक के शब्द को सुन कर दूसरा सम्प्रति पत्ति=प्रत्यभिज्ञा=याद=पहचान कर ठीक २ उस का अनुकरण न कर

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