भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 160 में से

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१४४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद समवायी और प्रसङ्गप्राप्त असमवायी कारणों की परीक्षा कह चुके । आगे निमित्त कारण की परीक्षा करेंगे, इस लिये उसका आरम्भ करते हैं- ३७०-संयुक्तसमवायादग्नेर्वैशेषिकम् ॥ ७ ॥ (संयुक्तसमवायात्) संयोगसम्बद्ध समवाय से (अग्नेः) अग्नि का (वै- शेषिकम्) विशेष गुण उष्णता [कारण है] ॥ पाक से उत्पन्न रूपादि रङ्गादि कार्यों में अग्नि निमित्त कारण है, जो अपने संयुक्तसमवाय से गरमी पहुंचा कर किसी वस्तु पर रङ्ग उत्पन्न कर देता है। अपना विशेष गुण अग्नि में गरमी का स्पर्श है, उस गुण का आश्रय द्रव्य अग्नि है, उस अग्नि का संयोग पकने वाले फल पुष्पादि से है, वहां अग्नि और फलादि के समवाय से पकने से उत्पन्न होने वाले रङ्गों की, जो पाकज हैं, उत्पत्ति होती है । इस उत्पत्ति में फलादिक उपादान कारण= समवायी हैं, तेज का संयोग असमवायी कारण है, गरमी का स्पर्श और अन्य अदृष्ट कारण मिलकर सब निमित्त कारण हैं ॥ ७ ॥ पदार्थों का उद्देश और परीक्षा की जा चुकी, जिन के तत्त्वज्ञान से मुक्ति होती है। तत्त्वज्ञान धर्म विशेष से उत्पन्न होता है, धर्मविशेष वैदिक कर्मों के करने से, वैदिककर्मजन्य पुण्य उस के ऊपर अत्यन्त श्रद्धा से बनता है । तब कहीं वैदिककर्मानुष्ठानियों को दृष्टफल के न पाने से अश्रद्धा न हो जावे, इस लिये कृपालु कणाद मुनि अत्यन्त श्रद्धा उत्पन्न कराते हुवे, विद्या- र्थियों को विश्वास दिलाते हैं कि- ३७१-दृष्टानां दृष्टप्रयोजनानां, दृष्टाऽभावे प्रयोगोऽभ्युदयाय ८ (दृष्टानाम्) [वेद में] देखे हुये (दृष्टप्रयोजनानाम्) जिन का प्रयोजन इस लोक में ही दीखता है, उन का तथा (दृष्टाभावे) जब दृष्ट ऐहिक फल न मिले तब भी (प्रयोगः) अनुष्ठान करना (अभ्युदयाय) पारलौकिकफल के लिये [माननीय है] ॥ ८ ॥ ३७२-अस्मद्बुद्धिभ्यो लिङ्गमृषेः ॥ ६ ॥ (अस्मद्बुद्धिभ्यः) हम सर्वसाधारणों के ज्ञानों से (ऋषेः) वेद के प्रकाशक ज्ञानदाता ऋषि परमात्मा की (लिङ्गम्) पहचान होती है ॥ यदि परमात्मा ज्ञान न देता तो मनुष्यों को ज्ञान न होता । मनुष्यों को ज्ञान है, यह परमात्मा के ज्ञानदान की पहचान है ॥ ९ ॥