भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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[Page Header] नवमाऽध्याय २ आह्निक १३९


३५१-स्वप्नान्तिकम् ॥ ८ ॥ (स्वप्नान्तिकम्) स्वप्नावस्थाविषयक अन्य स्वप्नदृष्ट पदार्थों का ज्ञान [भी आत्मा और मन के विशेष संयोग और संस्कार से होता है] ॥ ८ ॥ प्रश्न - स्मृतिज्ञान और स्वप्नज्ञान में भेद पाया जाता है, और कारण दोनों का एक है, अर्थात् आत्मा और मन के संयोग विशेष से तथा संस्कार वश स्मृति होती है, और इन्हीं कारणों से स्वप्न होता है, तब स्मृति और स्वप्न भी दो क्यों हैं, एक ही क्यों नहीं ? उत्तर- ३५२-धर्माच्च ॥ ९ ॥ (धर्मात्) धर्म से (च) भी [स्वप्नज्ञान होता है] ॥ धर्म शब्द से शारीरक धातु विकारादि विवक्षित हैं। कामी पुरुष सोता है, तब स्वप्न में भी संस्कारवश वैसा देखता है, परन्तु बहुत से ऐसे स्वप्न भी दीखते हैं कि जिन का तात्कालिक संस्कार नहीं होता। जैसे अपना आकाश में उड़ना, अग्नि में प्रवेश करना, सुवर्ण, पर्वत, उदय होते सूर्य का दीखना, नदी समुद्र तड़ागादिका तिरना, इत्यादि प्रकार के स्वप्न शरीर के धर्म = वातपित्तकफादि दोषों के प्राबल्य दौर्बल्य से होते हैं। इस लिये स्मृतिज्ञान के कारणों से स्वप्नज्ञान के कारण अन्य भी हैं, यही कारण है कि स्मृति तथा स्वप्न एक नहीं हो सक्ते ॥ ९ ॥ स्मृति की परीक्षा हो चुकी, अब अविद्या की परीक्षा करते हैं:- ३५३-इन्द्रियदोषात्संस्कारदोषाच्चाऽविद्या ॥ १० ॥ (इन्द्रियदोषात्) आंख कान आदि इन्द्रियों में कोई दोष होने से (च) और (संस्कारदोषात्) संस्काररूप दोष से [और धर्म अधर्म आदि से] (अविद्या) विपरीत ज्ञान होता है ॥ १० ॥ ३५४-तद् दुष्टज्ञानम् ॥ ११ ॥ (तत्) वह = अविद्या (दुष्टज्ञानम्) दोषयुक्त ज्ञान है ॥ ११ ॥ ३५५-अदुष्टं विद्या ॥ १२ ॥ (अदुष्टम्) निर्दोष ज्ञान (विद्या) विद्या कहाती है ॥ १२ ॥ ३५६-आर्षं सिद्धदर्शनं च धर्मेभ्यः ॥ १३ ॥