वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवमाध्याय १ आन्हिक . १३५ देखे पड़े और माने जाते हैं । इस लिये असत् (उत्पत्ति से पूर्व) की अपेक्षा सत् = उत्पन्न हुवा कार्य पदार्थ भिन्न है ॥ ३ ॥ ३३२-सच्चासत् ॥ ४ ॥ ( सत् ) होता हुवा [ भी कार्य पदार्थ ] ( च ) फिर=नाश के पश्चात् ( असत् ) सत् नहीं रहता ॥ ४ ॥ ३३३-यच्चाऽन्यदऽसदतस्तदऽसत् ॥ ५ ॥ ( च ) और ( यत् ) जो पदार्थ ( अतः ) इस पूर्वोक्त सदसत् उभय- विध से ( अन्यत् ) विलक्षण=जो तीनों काल में ( असत् ) न होवे, वह ( असत् ) केवल असत् है ॥ अर्थात् जो पदार्थ उत्पन्न होने से पूर्व असत् और उत्पन्न होकर सत् हैं, वे तो 'सदसत्' कहाते हैं और जो कभी भी सत्तात्मक नहीं, वे असत् हैं॥५॥ ३३४-असदिति भूतप्रत्यक्षाऽभावाद् भूतस्मृतेर्विरोधिप्रत्यक्षवत् ॥६॥ ( असत् ) अब नहीं है ( इति ) ऐसा जो ज्ञान है, वह ( भूतप्रत्यक्षा- ऽभावात् ) हुवे पदार्थ का प्रत्यक्ष न होने से [परन्तु] (भूतस्मृतेः) हुवे पदार्थ की स्मृति बनी रहने से ( विरोधिप्रत्यक्षवत् ) विरोधिप्रत्यक्ष के समान है ॥ जैसे असत् के विरोधी सत् का प्रत्यक्ष होता है, वैसे ही जो होकर फिर न रहे, उस में न रहने पर प्रत्यक्ष न होने पर भी, होते हुये समय की स्मृति बनी रहने से ज्ञान रहता है ॥ ६ ॥ ३३५-तथाऽभावे भावप्रत्यक्षत्वाच्च ॥ ७ ॥ ( तथा ) इसी प्रकार ( अभावे ) अभाव=असत् में ( च ) भी ( भाव- प्रत्यक्षत्वात् ) सत् के प्रत्यक्ष होने से [ ज्ञान होता है ] ॥ अर्थात् मृत्तिका से घट बना, फिर फूट टूट कर मृत्तिका होगया, तब टूट जाने और अपने कारण में लीन होजाने ( अभाव होजाने ) पर भाव (मृत्तिका) के प्रत्यक्ष होने से भी पूर्वप्रत्यक्षीकृत घट का ज्ञान होता है ॥७॥ ३३६-एतेनाऽघटोऽगौरऽधर्मश्च व्याख्यातः ॥ ८ ॥