भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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ओ३म् अथ नवमोऽध्यायः तत्र प्रथममाह्निकम् प्रश्न-ये पृथिवी आदि कार्य द्रव्य उत्पत्ति से पूर्व सत् थे वा असत् ? उत्तर- ३२९-क्रियागुणव्यपदेशाऽभावात् प्रागसत् ॥ १ ॥ ( क्रियागुणव्यपदेशाभावात् ) क्रिया और गुण का व्यवहार न पाया जाने से ( प्राक् ) उत्पत्ति से पूर्व ( असत् ) अभावरूप थे ॥ यदि कार्य द्रव्य उत्पत्ति से पूर्व विद्यमान होता तो कोई क्रिया और कोई गुण उस का पाया जाता, नहीं पाया जाता, इस लिये प्रागभाव मानना ठीक है ॥ १ ॥ प्रश्न-यदि कार्य पदार्थ उत्पत्ति से पूर्व सत् नहीं था तो कारण की क्रिया से उत्पन्न कैसे हो सकेगा ? क्योंकि हम देखते हैं कि तिलों में तेल है, इस लिये उन से उत्पन्न होता है तथा बालू में तेल नहीं है, इस लिये उस से उत्पन्न नहीं होता ? उत्तर- ३३०-सदसत् ॥ २ ॥ ( सत् ) कारणरूप से भाव और ( असत् ) कार्यरूप से अभाव [उत्पत्ति के पूर्व ] होता है ॥ २ ॥ प्रश्न-यदि प्रत्येक कार्य उत्पत्ति से पूर्व कारणरूप में वर्त्तमान था तो उस की उत्पत्ति मानने का क्या लाभ है ? उत्तर- ३३१--असतः क्रियागुणव्यपदेशाभावादर्थान्तरम् ॥ ३ ॥ ( असतः ) असत् के ( क्रियागुणव्यपदेशाभावात् ) क्रिया और गुणों का व्यवहार न पाये जाने से [ सत् पदार्थ ] ( अर्थान्तरम् ) अन्य पदार्थ है ॥ अर्थात् सत् असत् एक नहीं होसक्ते, असत् कार्य विषय में कोई क्रिया वा कोई गुण नहीं कहा देखा माना जाता और सत्कार्य में क्रिया और गुण