भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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कर्म जब स्वयं उत्पन्न होता है तब किसी न किसी संयोग और विभाग को उत्पन्न करता है, और संयोग विभागों के उत्पादन में यद्यपि कर्म, सम- वायि द्रव्य की और पूर्व संयोग के नाश की अपेक्षा रखता है तथापि न तो वह द्रव्य, कर्म की उत्पत्ति के पश्चात् उत्पन्न होता, न पूर्व संयोगनाशाभाव है, इस कारण संयोग विभागों में निरपेक्ष कारण ही है ॥ १७ ॥ अब इन द्रव्य गुण कर्मों का साधर्म्य बतलाते हैं:- १८-द्रव्यगुणकर्मणां द्रव्यं कारणं सामान्यम् ॥ १८ ॥ (द्रव्य-णाम्) द्रव्यों, गुणों और कर्मों का (द्रव्यं कारणं) द्रव्य कारण होता है (सामान्यम्) यह समानता है ॥ द्रव्य गुण कर्म तीनों एक द्रव्य के आश्रय रहते हैं, यही इन तीनों का साधर्म्य वा सामान्य है ॥ १८ ॥ १९-तथा गुणः ॥ १९ ॥ (तथा) इसी प्रकार (गुणः) गुण हैं ॥ जिस प्रकार द्रव्य गुण कर्मों का कारण एक द्रव्य होता है, इसी प्रकार गुण भी उन तीनों का कारण होता है। यथा कारण द्रव्यों का 'संयोग'= गुण, कार्य द्रव्य का कारण हुआ, कार्य रूपादि गुणों का कारण भी कारण रूपादि हुवे और गुरुत्वादि गुण, उत्क्षेपणादि कर्मों का कारण हुवे, इस प्रकार सब द्रव्य गुण कर्मों का कारण कोई न कोई गुण हुआ । यह भी द्रव्य- गुण कर्मों का गुण के साथ साधर्म्य है ॥ १९ ॥ अब और भी साधर्म्य कहते हैं:- २०-संयोगविभागवेगानां कर्म समानम् ॥ २० ॥ (संयो-नाम्) संयोग, विभाग और वेगों का [कारण] (कर्म) कर्म है (समानम्) यह समान है ॥ संयोगों का कारण कर्म है, विभागों का कारण भी कर्म है और वेगों का कारण भी कर्म है। इस बात में संयोग, विभाग, वेग; तीनों समान हैं कि उन तीनों का कारण एक कर्म है। यही इन तीनों का साधर्म्य है ॥ जैसे बाण आदि में संधानादि=कर्म ही बाण से धनुष् के संयोग का कारण हुआ, प्रत्यञ्चा का खींचना (कर्म), बाण से धनुष् के वियोग का कारण हुआ, तथा