वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header] प्रथमोऽध्याय १३
बाण में वेग के उत्पादन करने से वेग का भी कारण हुआ। इस प्रकार संयोग, विभाग और वेग का कारण कर्म है ॥ २० ॥ यदि कहो कि संयोग, विभाग और वेग; इन तीन का ही क्यों, द्रव्यों का कारण भी तौ कर्म हैं, सो सूत्र में क्यों न कहा ? तौ उत्तर— २१-न द्रव्याणां कर्म ॥ २१ ॥ ( द्रव्याणां ) द्रव्यों का [ कारण ] (कर्म) कर्म (न) नहीं होता ॥ २१ ॥ क्योंकि— २२-व्यतिरेकात् ॥ २२ ॥ ( व्यतिरेकात् ) अभाव होने से ॥ द्रव्यों की उत्पत्ति के समय कर्म व्यतिरिक्त (अभावप्राप्त) होता है। क्यों कि कर्म तौ द्रव्य के आरम्भ करने वाले संयोग को उत्पन्न करके स्वयं प्रध्वं- साऽभाव को प्राप्त हो जाता है, फिर संयोग उस द्रव्य का कारण हो, पर कर्म साक्षात् किसी कार्य द्रव्य का कारण नहीं बन सकता। यद्यपि कर्म संयोग का कारण और संयोग कार्यद्रव्योत्पत्ति का कारण हो, इस प्रकार परम्परा से चाहे कर्म कारण रहो, परन्तु साक्षात् नहीं। यही सूत्रकार की विवक्षा है ॥ २२ ॥ कारण का सामान्य कह कर अब कार्य का सामान्य कहते हैं:— २३-द्रव्याणां द्रव्यं कार्यं सामान्यम् ॥ २३ ॥ (द्रव्याणां) द्रव्यों का (द्रव्यं) द्रव्य (कार्यं) कार्य होता है, यह (सामान्यं) समानता है ॥ जिस प्रकार द्रव्यों का कारण द्रव्य होते हैं, इसी प्रकार द्रव्यों का कार्य भी द्रव्य होते हैं, यह सामान्य है ॥ जैसे घट दो कपालों का कार्य द्रव्य है, पट तन्तुओं का कार्य द्रव्य है ॥ २३ ॥ प्रश्न-तौ क्या जिस प्रकार गुण द्रव्यों का आश्रय करते हैं, उसी प्रकार कर्म भी द्रव्यों का आश्रय करते हैं, तब जैसे गुणों का कार्य गुण होना सामान्य है, वैसे कर्मों का कार्य कर्म हो, यह सामान्य भी है ? उत्तर-नहीं ? क्योंकि- २४-गुणवैधर्म्यान्न कर्मणां कर्म ॥ २४ ॥ ( गुणवैधर्म्यात् ) गुण की विरुद्धता से (कर्मणां) कर्मों का (कर्म) कर्म [ कार्य हो, यह सामान्य ] ( न ) नहीं है ॥