वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१ अध्याय २ आन्हिक १९ तीसरे वस्तु के पास विषमता भी होती है, विषमता और विशेष एक ही बात है, जो बुद्धिकृत अपेक्षा से है ॥ इस विषय में "समानप्रसवात्मिका जातिः" इस न्याय सूत्रानुसार कदा- चित् कोई लोग सामान्य का अर्थ सजातीयता समझें, इस कारण हम उद- यनाचार्य की एक कारिका वैशेषिकदर्शन वैदिक सूत्रवृत्ति से उठा कर रखते हैं, जिस से कई प्रकार का सामान्य भी जाति होने में बाधक ज्ञात होता है। यथा- व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं सङ्करोऽथानवस्थितिः । रूपहानिरसम्बन्धोजातिबाधकसंग्रहः ॥ १ ॥ इतने कारण जाति के बाधक संगृहीत हैं। १- यह कि व्यक्ति का भेद ( डिफरेंशियर्शी ) न होना । जैसे काल, दिशा, आकाश, तीनों एक दूसरे से व्यक्ति में भिन्न नहीं, इस लिये काल दिशा आकाश एक जाति नहीं। २- यह कि सर्वथा तुल्य होना, जैसे घट और कलश एक जाति नहीं, प्रत्युत एक ही वस्तु हैं, केवल नाममात्र का अन्तर है । ३- यह कि एक धर्म का दूसरे धर्म में अत्यन्त अभाव हो, परन्तु एक द्रव्य के ही आश्रय दोनों धर्म हों, इस को संकर कहते हैं । यह भी जातिबाधक है। जैसे भूतपना और मूर्त्त- पना जाति नहीं । यद्यपि एक ही द्रव्य ( पृथिवी वा जल आदि ) में आश्रय रखने वाले दोनों धर्म हैं । पृथिवी भूत भी है, मूर्त्त भी है, तथापि भूतत्व और मूर्त्तत्त्व एक जाति नहीं। क्योंकि भूतत्त्व से रहित मूर्त्तत्त्व 'मन' में है। मूर्त्तत्त्व से रहित भूतत्त्व आकाश में है और पृथिवी जल अग्नि में भूतत्व मूर्त्तत्त्व दोनों इकट्ठे हैं। ४- यह कि अनवस्था होना, जैसे सामान्यमें एक दूसरा सामान्य मानने लगें और फिर उस में एक तीसरा सामान्य मानने लगें तो यह अनवस्था ( तसलसुल ) होगी, जो जाति नहीं। ५- यह कि रूप की हानि । जैसे विशेष पदार्थ में विशेषत्व कोई जाति नहीं, क्योंकि वह तो स्वरूप से व्यावर्तक स्वीकृत है । ६- यह कि संबन्ध न होना । जैसे समवाय होना कोई जाति नहीं, क्योंकि एक समवाय में कोई दूसरा समवाय माना नहीं गया ॥ जाति आदि कई शब्द जो इस व्याख्यान में आये हैं उन का अर्थ बताये देते हैं । नित्य होते हुये अनेकों से समवाय होना=सामान्य । अपने पराये के भेदक स्वभाव वाला होना=विशेष । नित्य सम्बन्ध=समवाय । शब्द का समवायी कारण होना=आकाशत्व । व्यतीत आदि व्यवहार का हेतु