भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 160 में से

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२० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद होना=काल । पूर्व पश्चिमादि व्यवहार का हेतु होना दिशापन है ॥ नाम लेकर किसी पदार्थ का कथन करना=उद्देश है । और विभाग भी एक प्रकार का उद्देश ही है, उस में भी नाम ही गिनाये जाते हैं। उद्दिष्ट पदार्थ के निजस्वरूप को बताने वाला असाधारण धर्म लक्षण है। लक्षित में लक्षण घटता है वा नहीं, इस बात को प्रमाणों से परखना=परीक्षा है। पृथिवी, जल, तेज, वायु, और आकाश, ये ५ भूत हैं। चक्षुरादि बाह्येन्द्रियों से ग्रहण करने योग्य विषय वाला होना=भूतत्व है। जैसे आंख से ग्राह्य रूप का भूत=तेज । नाक से ग्राह्य गन्ध का भूत= पृथिवी । कान से ग्राह्य शब्द का भूत=आकाश । त्वचा से ग्राह्य स्पर्श का भूत=वायु और रसना से ग्राह्य रस का भूत जल है॥३॥ ३५-भावोऽनुवृत्तेरेव हेतुत्वात्सामान्यमेव ॥ ४ ॥ (भावः) सत्ता (अनुवृत्तेः) अनुवृत्ति के ( एव) ही ( हेतुत्वात् ) हेतु होने से ( सामान्यम् ) सामान्य ( एव ) ही है ॥ सब ही पदार्थ किसी की अपेक्षा से सामान्य हैं, तौ दूसरे की अपेक्षा से विशेष भी हैं, परन्तु भाव= सत्ता=होना एक ऐसा पदार्थ है जिस को सामान्य ही कह सक्ते हैं, विशेष नहीं, क्योंकि वह अनुवृत्ति का ही हेतु है, व्यावृत्ति का नहीं। और विशेष कहते हैं व्यावर्तक हेतु को । सत्ता तौ अनुवृत्ति बुद्धि के अतिरिक्त कभी व्यावृत्ति की प्रतीति कराती ही नहीं। इसलिये सामान्य ही है, विशेष नहीं ॥४॥ ३६-द्रव्यत्वं गुणत्वं कर्मत्वं च सामान्यानि विशेषाश्च ॥५॥ (द्रव्यत्वं) द्रव्यत्व (गुणत्वं) गुणत्व ( च ) और ( कर्मत्वं.) कर्मत्व ( सामा- न्यान्यि ) ये सामान्य हैं ( च ) और ( विशेषाः ) विशेष भी ॥ द्रव्यत्व गुणत्व कर्मत्वादि, सत्ता की अपेक्षा विशेष हैं, परन्तु पृथिवी- त्वादि की अपेक्षा से सामान्य हैं । क्योंकि सत्ता से अधिकदेशवर्त्ती तौ कोई है ही नहीं, इसलिये भाव वा सत्ता से सब विशेष हैं, परन्तु जो द्रव्यत्व द्रव्य सामान्य में है, वही द्रव्यत्व अपने एक विभाग पृथिवीत्वादि में भी है, इसलिये द्रव्यत्व सामान्य भी हुवा । इसी प्रकार गुणत्व और कर्मत्व को समझिये ॥ ५ ॥ ३७-अन्यत्राऽन्त्येभ्योविशेषेभ्यः ॥ ६ ॥ ( अन्त्येभ्यः ) अन्त में होने वाले ( विशेषेभ्यः ) विशेषों से ( अन्यत्र ) अन्यत्र [ पूर्वसूत्रोक्त नियम है ] ॥