भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 160 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 70

६६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद

रणत्वात्” इति योगदर्शने; “तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरि- ष्वक्तः”, “ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ”, “ नाणुरतच्छ्रुतेरिति- चेन्नेतराधिकारात्”, “अंशो नानाव्यपदेशात्”, “असंततेश्चा- ऽव्यतिकरः ” इत्यादि वेदान्तदर्शनसूत्रेषु । प्रशस्तपादभाष्ये ऽपि च “आत्मत्वाभिसंबन्धादात्मा, तस्य सौक्ष्म्यादप्रत्यक्षत्वे सति करणैः शब्दाद्युपलब्ध्यनुमितैः श्रोत्रादिभिः समधिगमः क्रियते... तस्य गुणा बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माऽधर्म- संस्कारसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः ... व्यवस्था- वचनात्संख्यापृथक्त्वमप्यत एव । पृथिव्युदकज्वलनपव- नात्ममनसामनेकत्वाऽपरजातिमत्त्वे, बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेष- प्रयत्नानां द्वयोरात्ममनसोः संयोगादुपलब्धिः” इति । एवं श्रुतिस्मृतिशास्त्रप्रतिपादितमिदमाऽऽत्मबहुत्वं लोकव्यवहारे ऽपि प्रसिद्धम्” ॥ जीव अणु हैं और अनेक तथा असंख्येय हैं। इस विषय में “नमोभस्त एमसि० ” इत्यादि वेदवचन ऊपर संस्कृत में देखिये, जिन से जीवों का अणुत्व परिच्छिन्नत्व और एकदेशीयपना तथा बहुत होना पाया जाता है जो वस्तु संख्या में अनेक हों वे सर्वव्यापक नहीं हो सकते और जो जीव गमनशील हों अर्थात् एक देह से दूसरे देह में जावें, वे विभु नहीं हो सकते यह बात “एषोणुरात्मा०” इत्यादि सैकड़ों उपनिषद् वचनों में भी वर्णित है जिन में से कुछ एक ऊपर संस्कृत में लिखे हैं । अन्य दर्शनों में भी जीवात्मा का बहुत्व माना गया है जैसा कि सांख्यदर्शन में-“ पुरुषबहुत्वं व्यवस्थातः ६। ४५ । और-“ नाद्वैतश्रुतिविरोधो जातिपरत्वात् ” १ । १५४ इन सूत्रों में जीवों का बहुत्व और अद्वैत कहने वाली श्रुतियों का जातिपरक होना मानकर विरोधपरिहार किया गया है । इसी प्रकार योगदर्शन में भी जीवात्मा का अनेक होना और एकदेशीय होना कहा गया है । यथा - “कृता प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ” २ । २२ इत्यादि । इसी प्रकार

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित) · पृष्ठ 70, कुल 160 में से · BharatKosha