भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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तृतीयाऽध्यायः १ आह्निकं ६३ वेदान्तदर्शन में भी- "तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः ३ । १ । १ और- “उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्” २ । ३ । १९ तथा-“नाणुरतच्छ्रुतेरिति चेन्नेतराधि- कारात् ” २ । ३ । २१ और भी-“ अंशोनानाव्यपदेशात् ” २ । ३ । ४३ तथा च-“ असन्ततेश्चाव्यतिकरः ” २ । ३ । ४९ इत्यादि सूत्रों में जीवों का भागना, दौड़ना जाना आना अणु होना और अणुत्वविरोधाभासप्रतिपादक वाक्यों- का दोषपरिहार और नानात्व तथा एकदेशीयत्व और अव्यापकत्व स्पष्ट प्रति- पादन किया है ॥ प्रशस्तपाद भाष्य में भी जो ऊपर संस्कृत में उद्धृत है, जीव का संख्या- युक्त होना, अलग २ होना, संयोग और विभाग करना कहा गया है । इस प्रकार वेद, उपनिषद्, सांख्य योग वेदान्त इत्यादि दर्शन, प्रशस्तपाद भाष्य और अनेक उपनिषद् जीवों को बहुत्व मानते हैं । इस पर कई लोग शङ्का करेंगे कि आप ने जीवों के बहुत्वप्रतिपादक वचन तौ इकट्ठे कर दिये परन्तु सैंकड़ों वचन जो वेद, उपनिषद् और शास्त्रों में आत्मा के एकत्व को प्रति- पादन करते हैं उन की क्या गति होगी ? यथा-यस्तु सर्वाणि० यस्मिन् सर्वाणि० योसावादित्ये पुरुषः० ईशोपनिषद् और-यदेवेह तदमुत्र० मनसैवेदमाप्तव्यम्० कठोपनिषद् इत्यादि अनेक उपनिषदों, वेदों और दर्शनसूत्रों में कहे गये हैं ? उत्तर-प्रत्येक वचन के यहां संग्रह करने और दोषपरिहार करने में तौ ग्रन्थ बहुत बढ़ जावेगा किन्तु यदि वाचकवृन्द विचार करेंगे तो सर्वत्र ही नीचे लिखे कारणों से संगति मिल जायगी और दोषपरिहार हो जायगा ॥ १-कहीं २ अपने समान सुख दुःख का अनुभव जानकर किसी पर भी अन्याय न करने के लिये आत्मा आत्मा की एकता कहते हुवे एकत्व का भ्रम होता है। कहीं २ जीवात्मा को परमात्मा से अनन्य भक्ति के समय तन्मयता का वर्णन करने को वचन हैं, जिन में जीव ब्रह्म की एकता भ्रान्ति से प्रतीत होती है । कहीं २ परमात्मा का एकत्व प्रतिपादित है जिसको भ्रम से कोई लोग जीवों का एकत्व समझ लेते हैं परन्तु वास्तव में भेदप्रतिपादक वाक्य स्पष्ट और यथार्थ हैं और समस्त व्यवहार उन्हीं से चलता है, इस के विरुद्ध एकत्वप्रति- पादक वाक्य लक्षण से व्याख्या करने योग्य हैं ॥ १९ ॥ १३६-प्रवृत्तिनिवृत्ती च प्रत्यगात्मनि दृष्टे परत्र लिङ्गम् ॥ २० ॥ ( प्रवृत्तिनिवृत्ती च ) प्रवृत्ति और निवृत्ति ( प्रत्यगात्मनि ) अपने अपने आत्मा में ( दृष्टे ) देखी जाती हैं (परत्र ) पराये में (लिङ्गम् ) वही लिङ्ग हैं ॥