वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद जिस प्रकार रागोत्पन्न प्रयत्न=प्रवृत्ति और द्वेषोत्पन्न प्रयत्न=निवृत्ति अपने आत्मा में देखी जाती हैं इसी प्रकार हितकारक कामों में प्रवृत्ति और अहित कामों में निवृत्ति देखकर दूसरों के आत्मा का लिङ्ग से अनुमान करना चाहिये कि मेरे समान इन की भी प्रवृत्ति निवृत्ति आदि चेष्टायें हैं इसलिये अवश्य मेरे समान इन में भी एक पृथक् २ आत्मा है ॥ २० ॥ इस प्रकार आत्मा की सिद्धि के प्रकरण से आत्मा के लिङ्ग और अनात्मा के लिङ्ग तथा अपने आत्मा के समान पराये आत्माओं का होना इस आन्हिक में वर्णन किया गया ॥ इति तृतीयाध्याये प्रथममाह्निकम् अथ द्वितीयमाह्निकम् आत्मा की पहचान में जिस प्रकार प्रथमान्हिक में इन्द्रियार्थप्रसिद्धि को लिङ्ग कहा गया, इसी प्रकार इस द्वितीय आन्हिक में मन की गति को आत्मा का लिङ्ग बतायेंगे, इस लिये प्रथम मन की परीक्षा आरम्भ करते हैं और उद्देश के क्रम को छोड़कर भी आवश्यकतावश मन की परीक्षा करते हैं:- १३७-आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य भावोऽभावश्च मनसो लिङ्गम् ॥ १ ॥ (आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे) आत्मा, इन्द्रियों और विषयों के सामीप्य में भी ( ज्ञानस्य ) ज्ञान का ( भावः ) होना ( च ) और ( अभावः ) न होना ( मनसः ) मन का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग है ॥ देखा जाता है कि इन्द्रियों के समीप विषय हों तब भी उन का ज्ञान नहीं होता और होता भी है अर्थात् हमारी आंख के सामने से हाथी निकल जाता है और हमें ज्ञान नहीं होता । हमारे कानों को सुनाने के लिये कोई पुकार जाता है और हम नहीं सुनते, इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों के विषयों को भी हम ग्रहण नहीं करते, जब तक कि इन्द्रियों के अतिरिक्त मन भी उस विषय में न लगे । यों तो एक ही काल में हमारी त्वचा स्पर्श करती रहती है, नासिका के सामने गन्ध उपस्थित रहता है, आंखों के आगे कोई न कोई रूप रहता है परन्तु क्या हम पाञ्चों इन्द्रियों से पाञ्चों विषयों का ग्रहण एक