वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 76, कुल 160 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
प्रश्न- ज्ञानादि गुण तो अदृष्ट हैं ? किसी दृष्ट लिङ्ग से आत्मा सिद्ध कीजिये ? उत्तर- सुनियेः-
१४२-यज्ञदत्त इति सन्निकर्षे प्रत्यक्षाभावाद् दृष्टं लिङ्गं न विद्यते ॥ ६ ॥
( सन्निकर्षे ) समीप होने पर भी ( यज्ञदत्तः इति ) यज्ञदत्त है, ऐसा ( प्रत्यक्षाभावात् ) प्रत्यक्ष न होने से ( दृष्टम् ) दृष्ट ( लिङ्गम् ) लिङ्ग ( न ) नहीं ( विद्यते ) होता है ॥
भाव यह है कि संसार में सामने खड़े हुये देवदत्त यज्ञदत्तादि को देख कर भी केवल शरीर का प्रत्यक्ष होता है, न कि इस बात का कि यह देवदत्त है वा यज्ञदत्त है। तब फिर आत्मा के सिद्ध करने में यदि दृष्ट लिङ्ग न हो तो क्या हानि वा आश्चर्य है ? ॥ ३ ॥
तब फिर आत्मा कैसा है ? उस को कैसे जानें ? सुनियेः-
१४३-सामान्यतोदृष्टाच्चाविशेषः ॥ ७ ॥
( सामान्यतोदृष्टात् ) सामान्यतोदृष्ट से ( च ) और [ ज्ञानादि गुणों से ] ( अविशेषः ) विशेष नहीं कह सकते ॥
अर्थात् जो ज्ञानादि गुण चतुर्थ सूत्र में कहे गये हैं उन्हीं से समझलो कि इन गुणों का आश्रय कोई द्रव्य है, विशेष कुछ नहीं कह सकते ॥ ७ ॥
तो फिर उस का नाम आत्मा है, यह कैसे जानें ? उत्तरः-
१४४-तस्मादागमिकः ॥ ८ ॥
( तस्मात् ) इस कारण ( आगमिकः ) शास्त्रसिद्ध है ॥
अर्थात् जब सामान्यतोदृष्ट ज्ञानादि गुणों का आश्रय द्रव्य विशेष कोई न कोई है और वह क्या है अर्थात् उसका नाम क्या है यह बात शास्त्र में देखकर इतनी ही निश्चित होती है कि उस का नाम आत्मा है। जैसा कि “आत्मैवाभूद्विजानतः” यजुः ४०।७। “आत्मानं चेद्विजानीयात्” बृहदारण्यक ४।४।१२ इत्यादि शास्त्र में उस का नाम आत्मा पाया जाता है ॥ ८ ॥
प्रश्न- पृथिव्यादि आठ द्रव्यों में से ही किसी को आत्मा क्यों न मान लिया जाय ? उत्तर-
१४५-अहमिति शब्दस्य व्यतिरेकान्नागमिकम् ॥ ९ ॥