वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयाऽध्याय २ आन्हिक ३३ ( अह्मिति शब्दस्य ) " अहम्=मैं" इस शब्द के ( व्यतिरेकात् ) भिन्न होने से ( आगमिकम् ) शास्त्रानुकूल ( न ) नहीं होगा ॥ अर्थात् मैं और मेरा का व्यवहार पृथिवी आदि अन्य द्रव्यों में नहीं पाया जाता इस कारण पृथिवी आदि अन्य आठ द्रव्यों में से किसी को आत्मा मानना शास्त्रानुकूल नहीं ॥ ९ ॥ प्रश्न-हम तो प्रत्यक्षात्मवादी हैं, तब- १४६-यदि दृष्टमन्वक्षमऽहं देवदत्तोऽहं यज्ञदत्त इति ॥ १० ॥ (यदि) यदि (अन्वक्षम्) आंखों सामने (दृष्टं) देखे हुवे को ( अहम् देवदत्तः ) मैं देवदत्त हूं ( अहम् यज्ञदत्तः ) मैं यज्ञदत्त हूं ( इति ) इस प्रकार [ आत्मा मानलेवें तो क्या हानि है ? ] ॥ १० ॥ उत्तरः- १४७-दृष्ट आत्मनि लिङ्गे एकएव दृढत्वात् प्रत्यक्षवत् प्रत्ययः ॥ ११ ॥ (आत्मनि) [ षष्ठ्यर्थे सप्तमी ] आत्मा के (लिङ्गे) लिङ्ग के (दृष्टे) दृष्ट होने पर तौ ( दृढत्वात् ) दृढ़ होने से (एकः) एक (एव) ही (प्रत्ययः) प्रतीति होती (प्रत्यक्षवत्) जैसा कि प्रत्यक्ष में होती है ॥ यदि मैं देवदत्त हूं, मैं यज्ञदत्त हूं, ऐसा कहने वाले देवदत्त वा यज्ञदत्त को ही आत्मा मानलें तब तौ शरीरसमुदाय में ही दृढ़ प्रतीति होजावेगी कि यही आत्मा है तब फिर ज्ञानादि गुणों की और उन के आश्रय द्रव्य आत्मा की जिज्ञासा ही व्यर्थ है परन्तु शरीर को देख कर भी आत्मा को प्रत्यक्ष नहीं देखा जाता जैसा कि इसी शास्त्र में आगे अध्याय ८ आह्निक १ सूत्र २ में कहेंगे कि " तत्रात्मा मनश्चाप्रत्यक्षे " आत्मा और मन प्रत्यक्ष नहीं। तब देवदत्त और यज्ञदत्त संज्ञा वाले देहादि संघात को प्रत्यक्ष आत्मा कैसे मान लिया जावे ? ॥ ११ ॥ यदि कहो कि हम तौ ज्ञानादि लिङ्गों से लिङ्गी आत्मा का प्रत्यक्ष नहीं कहते किन्तु हम तौ यह कहते हैं कि मैं देवदत्त हूं, मैं यज्ञदत्त हूं, ऐसा जो मन में निश्चय होता है, इस मानसिक प्रत्ययगोचर होने से आत्मा को प्रत्यक्ष कहते हैं ? तो उत्तर- १०