वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 160 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ७४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद १४८-देवदत्तो गच्छति यज्ञदत्तो गच्छती- त्युपचाराच्छरीरे प्रत्ययः ॥ १२ ॥ (देवदत्तो गच्छति) देवदत्त जाता है (यज्ञदत्तो गच्छति) यज्ञदत्त जाता है (इति) ऐसी (उपचारात्) बोलचाल होने से (शरीरे) देह में (प्रत्ययः) निश्चय होता है ॥ देवदत्त और यज्ञदत्त को जाता हुआ देख कर जब कहते हैं कि देवदत्त वा यज्ञदत्त जाता है, तब तौ शरीर में ही गति क्रिया देखकर यही निश्चय होगा कि जाने वाला शरीर ही देवदत्त वा यज्ञदत्त है, न कि ज्ञानादि गुणों वाला कोई पदार्थ आत्मा है। परन्तु बिना ज्ञानादि गुणों के भित्ति के समान देवदत्त वा यज्ञदत्त के शरीर को कोई आत्मा नहीं मान सकता ॥१२॥ शङ्का- १४६-संदिग्धस्तूपचारः ॥ १३ ॥ (उपचारः) बोलचाल (तु) तौ (संदिग्धः) संदेहयुक्त है ॥ अर्थात् देवदत्त जाता है, यज्ञदत्त जाता है, इस उपचार=बोलचाल से यह पूरा निश्चय नहीं होता कि बोलने वाला देवदत्त वा यज्ञदत्त के शरीर को जाता समझता है अथवा ज्ञानादि गुणों वाले आत्मा को जाता समझता है ॥१३॥ तथा च-यदि हमारा कहा उपचार संदिग्ध है तब मैं देवदत्त हूं, मैं यज्ञ- दत्त हूं, इत्यादि प्रत्यक्ष प्रतीति शरीर में नहीं तौ किस में है ? उत्तर- १५०-अहमिति प्रत्यगात्मनि भावात्परत्रा- ऽभावादर्थान्तरप्रत्यक्षः ॥ १४ ॥ (अहम् इति) मैं हूं, ऐसा व्यवहार (प्रत्यगात्मनि) छिपे हुये आत्मा में (भावात्) होने से और (परत्र) शरीर में (अभावात्) न होने से (अर्था- न्तरप्रत्यक्षः) अन्य अर्थ का प्रत्यक्ष है ॥ अर्थात् जब 'मैं हूं' इत्यादि प्रत्यक्ष अदृष्ट आत्मा में होता है और शरीर में नहीं होता तब मैं देवदत्त हूं, मैं यज्ञदत्त हूं, ऐसा जो प्रत्यक्ष होता है उस को अर्थान्तर (आत्मा) का ही प्रत्यक्ष कह सकते हैं ॥ १४ ॥ आगे पूर्वपक्षी अपने पक्ष का समाधान करता है किः- CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.