भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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१६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद जब कि शरीर का ही प्रत्यक्ष अभिमान और अहङ्कार है, आत्मा का प्रत्यक्ष नहीं, तब सामान्यतोदृष्ट से विशेष सिद्ध न होने पर आत्मा केवल शास्त्रसिद्ध है, और उस के अनुमान से सिद्ध करने का परिश्रम वृथा है ? तो उत्तरः- १५४-अहमिति मुख्ययोग्याभ्यां शब्दवद् व्यतिरेकाऽव्यभि- चाराद्विशेषसिद्धेर्नागमिकः ॥ १८ ॥ ( अहमिति ) 'मैं' ऐसे ( मुख्ययोग्याभ्याम् ) उपचाररहित और योग्य प्रत्ययों से ( शब्दवत् ) शब्द के समान ( व्यतिरेकाऽव्यभिचारात् ) पृथक्ता के अव्यभिचार से ( विशेषसिद्धेः ) विशेष सिद्ध होने से ( आगमिकः ) केवल शास्त्रसिद्ध ( न ) नहीं है ॥ अर्थात् आत्मा केवल शास्त्रसिद्ध ही नहीं है किन्तु अनुमानसिद्ध भी है क्योंकि 'मैं हूं' ऐसी प्रतीति न तो औपचारिक है किन्तु उपचाररहित है और योग्य भी है क्योंकि केवल शरीर को कोई 'मैं' नहीं कहता, प्रत्युत 'मेरा शरीर' कहता है, तब आत्मा शरीर से नित्य भिन्न हुवा अर्थात् शरीर कभी भी आत्मा नहीं हुवा, तब जैसे शब्द गुण, पृथिवी आदि आठ द्रव्यों में से किसी द्रव्य का गुण न होने से किन्तु आठों से व्यतिरिक्त आकाश का गुण होने से भिन्न है । ऐसे ही आत्मा भी पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से व्यतिरिक्त विशेष सिद्ध होने से केवल शास्त्रसिद्ध ही नहीं, किन्तु अनुमान- सिद्ध भी है । इस प्रकार आत्मा-शास्त्र और अनुमान दोनों से सिद्ध है ॥१८॥ आत्मा की परीक्षा हो चुकी । अब आत्मा के नाना अर्थात् अनेक होने की परीक्षा करेंगे, इस लिये पहले पूर्व पक्ष करते हैं:- १५५-सुखदुःखज्ञाननिष्पत्त्यविशेषादैकात्म्यम् ॥ १९ ॥ ( सुखदुःख-ऽविशेषात् ) सुख दुःख और ज्ञान की सिद्धि में विशेष न होने से ( ऐकात्म्यम् ) आत्मा एक ही जान पड़ता है ॥ जैसा सुख दुःख और ज्ञान एक शरीर में है, वैसा ही सब शरीरों में है, कुछ विशेष नहीं । इस कारण देवदत्त, यज्ञदत्त, विष्णुमित्र, चैत्र, मैत्र इत्यादि के अनेक शरीरों में एक ही आत्मा प्रतीत होता है क्योंकि जैसे शब्दलिङ्ग की विशेषता न होने से आकाश एक है और जैसे शीघ्र विलम्ब एकसाथ इत्यादि सामान्य से काल एक है और जैसे पूर्व, पश्चिम आदि प्रत्ययलिङ्ग के अविशेष