भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 160 में से

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[Header] तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ९९

से दिशा एक है, ऐसे ही सुख, दुःख, ज्ञानादि लिङ्गों के अविशेष (सामान्य) से आत्मा भी अनेक शरीरों में एक ही है ॥ १९ ॥ आगे सिद्धान्त सूत्र से उत्तर देते हैंः- १५६-व्यवस्थातोनाना ॥ २० ॥ ( व्यवस्थातः ) व्यवस्था के भेद से ( नाना ) आत्मा अनेक हैं ॥ अर्थात् सुख दुःख ज्ञानादि लिङ्ग यद्यपि सब शरीरों में पाये जाते हैं तथापि एक काल में एक ही प्रकार का सुख वा दुःख वा ज्ञान सब के शरीरों में नहीं पाया जाता । जिस समय में देवदत्त सुख का अनुभव करता है उसी समय में यज्ञदत्त दुःख का अनुभव करता है, और विष्णुमित्र दोनों के सुख और दुःख को जानता है, इसलिये सुख दुःख और ज्ञान सब में समान होने पर भी एक काल में एक को सुख होने से सब को सुख नहीं होता और एक को दुःख होने से सब को दुःख भी नहीं होता तथा एक को ज्ञान होने से सब को ज्ञान भी नहीं होता, यदि होता तो एक पाठशाला के अनेक विद्यार्थियों में से एक के पढ़कर ज्ञानी होने से सब विद्यार्थी ज्ञानी होजाते, परन्तु ऐसा नहीं होता । इस लिये सुख दुःख और ज्ञान की व्यवस्था होने से सब शरीरों में एक आत्मा नहीं है किन्तु अनेक हैं ॥ २० ॥ अब दूसरा हेतु देते हैं-यदि कोई कहे कि केवल युक्ति से आत्मा का अनेक होना सिद्ध किया, शास्त्र से नहीं, तो उत्तरः- १५७-शास्त्रसामर्थ्याच्च ॥ २१ ॥ ( शास्त्रसामर्थ्यात् ) शास्त्र के सामर्थ्य से ( च ) भी ॥ शास्त्र के सामर्थ्य से भी आत्मा अनेक सिद्ध होते हैं । जैसा कि यजुर्वेद अध्याय १६ मन्त्र ४६ में “जीवा जीवेषु सस्रकाः” और कठोपनिषद् वल्ली ५ कण्डिका १३ में “नित्यो नित्यानाम्, चेतनश्चेतनानाम्, एको बहूनाम्” इत्यादि वेद और उपनिषदादि शास्त्रों के सहस्त्रों प्रमाणों से जीवात्मा का अनेक होना पाया जाता है । वेदादि शास्त्रों के बहुत से प्रमाण इसी वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद अध्याय ३ आह्निक १ सूत्र १९ के भाष्य में पृष्ठ ६३ से ६६ तक जीवों के अनेकत्व, अणुत्व और भिन्न भिन्नत्व में हम लिख आये हैं, वहां देख लीजिये ॥ २१ ॥

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