वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 160 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस में स्वधा का अर्थ यह है कि अपने धारण किये हुवे जीवग्रामसहित ॥ तथा इस से अगले मन्त्र ये हैं किः- तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् । तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाऽजायतैकम् ॥३॥ कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥ अर्थ-(अग्रे तमः आसीत्) प्रलयकाल में अन्धियारा रहता है और (इदं सर्वमप्रकेतं सलिलम् आ तमसा गूढम्) यह सब चिह्नहित अदृश्य जल सा अन्धियारे से आच्छादित रहता है। जैसे जल बाष्परूप होकर फिर आकाश में अदृश्य अप्रकेत हो जाता है, वैसे जगत् भी अव्यक्तभाव में होता है। (यत् आभू तुच्छये न अपिहितमासीत्) जो जगत् तुच्छ अर्थात् सूक्ष्म अव्यक्तभावा- पन्न तम से आच्छादित होता है (तत् एकं तपसः महिना अजायत) वह एक अन्धकारावृत अवस्था के पश्चात् महत्तत्त्वरूप से उत्पन्न होता है अर्थात् प्रकृति से महत्तत्त्व की उत्पत्ति सब से प्रथम हुवा करती है। इस मन्त्र में यह कहा है कि प्रथम प्रकृति रहती है, उससे महत्तत्त्व उत्पन्न होता है। अब इस से अगले मन्त्र में यह कहा जाता है कि महत्तत्त्व से काम अर्थात् अहङ्कार की उत्पत्ति होती है ॥ ३ ॥ इस से पूर्वमन्त्र ३ (महिनाऽजायतैकम्०) में महत्तत्त्व की उत्पत्ति कह चुके हैं। (तदग्रे कामः समविवर्त्तत) उस महत्तत्त्व के पश्चात् काम= अहङ्कार उत्पन्न होता है, उसी को मन कहते हैं (मनसः रेतः प्रथमं यत् आसीत्) उस मन का बीज जो पूर्व था (कवयः मनीषा हृदि प्रतीष्य) विद्वान् लोग बुद्धि से हृदय में विचार करके (असति सतो बन्धुं निरविन्दन्) असत्-अप्रतीयमान अवस्था में सत्-प्रतीयमान जगत् के बन्धु=बान्धने वाले कर्म को जानते हैं अर्थात् प्रकृति से जगदुत्पत्ति में पूर्वकल्पकृत कर्म हेतु होते हैं । निष्प्रयोजन जगद्रचना नहीं होती। इस सब से जीव ब्रह्म प्रकृति और जीवों के कर्म प्रवाह से अनादि सिद्ध होते हैं ॥ ४ ॥ इस प्रकार महत्तत्त्व और अहङ्कार इन दोनों को सांख्य और योग शास्त्र में प्रकृति के परिणाम माना गया है तथा न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और ११