भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 160 में से

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८२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद वेदान्त में शुद्ध प्रकृति के भाग विशेष माना गया है । इस प्रकार शास्त्रों में कोई विरोध नहीं किन्तु संज्ञाभेद और प्रक्रियाभेद मात्र है । अहङ्कार के सत्त्वगुणप्रधान भाग विशेष से ईश्वराज्ञानुकूल प्रत्येक जीव को एक आ- भ्यन्तर इन्द्रिय मन दिया गया है । अहङ्कार के तमोगुणप्रधान भाग विशेष से व्यापक दिशा और काल, व्यापक शब्द तन्मात्र, अणुस्पर्श तन्मात्र, रूप, तन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र; यह चारों भी उत्पन्न होते हैं। इन चारों को न्याय, वैशेषिक और मीमांसा में द्वयणुक कहते हैं । शब्दतन्मात्र से आकाश, स्पर्शतन्मात्र से वायु, रूपतन्मात्र से तेज, रसतन्मात्र से जल और गन्धतन्मात्र से पृथिवी; यह पांच महाभूत उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥ शङ्का-कार्यलिङ्ग से किसी कारण की सिद्धि तौ अवश्य होती है पर उस कारण के नित्य होने में क्या लिङ्ग है ? समाधान- १६१-अनित्य इति विशेषतः प्रतिषेधभावः ॥ ४ ॥ (अनित्यः इति) " अनित्य " इस शब्द में (विशेषतः) विशेष का (प्रतिषेधभावः) निषेध होना पाया जाता है ॥ यदि नित्य कोई पदार्थ नहीं होता तौ " अनित्य " शब्द में नञ् का अकार किस का निषेध करता ? बस अनित्य कहना भी किसी के नित्य होने का लिङ्ग है ॥ ४ ॥ यदि कहो कि हम तौ नित्य की अपेक्षा से नित्य नहीं कहते, तौ उत्तर- १६२-अविद्या ॥ ५ ॥ (अविद्या) तो आप की भ्रान्ति है । अर्थात् नित्य की अपेक्षा के विना अनित्य मानना अविद्या वा भ्रान्ति है क्योंकि अनित्य शब्द में जो निषेधार्थक अकार है वह नित्य का ही तौ निषेध कर सकता है ॥ ५ ॥ क्यों जी ! यदि पृथिवी आदि तत्त्वों का मूल कारण प्रकृति है, तौ फिर वह आंख से क्यों नहीं दीखती ? उत्तर- १६३-महत्यनेकद्रव्यवत्त्वाद्रूपाच्चोपलब्धिः ॥ ६ ॥ (महति) स्थूल वस्तु में अथवा महत्तत्त्व में (अनेकद्रव्यवत्त्वात्) अनेक द्रव्यवाला होने से (च) और (रूपात्) रूप से (उपलब्धिः) उपलब्धि होती है ॥