भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्याय १ आह्निक [८३]

जो पदार्थ महान् होते हैं वा स्थूल होते हैं, वे अनेक द्रव्यों के संयोग के बने होते हैं और रूप वाले होते हैं इस लिये उन की आंख से उपलब्धि होती है, परन्तु प्रकृति ऐसी नहीं । अर्थात् प्रकृति में न तो अनेक द्रव्यों का संयोग है और न रूप है, इस लिये इस की उपलब्धि आंख से नहीं होती ॥ ६ ॥ प्रश्न-अच्छा तो प्रकृति की उपलब्धि तो आंख से इस लिये नहीं होती कि वह अनेक द्रव्य वाली नहीं, परन्तु वायु तो अनेक द्रव्यों वाला है, फिर वह आंख से क्यों नहीं दीखता, वह तो महान् है ? उत्तर- १६४-सत्यपि द्रव्यत्वे महत्त्वे रूपसंस्काराभावाद् वायोरनुपलब्धिः ॥ ७ ॥ (वायोः) वायु की (अनुपलब्धिः) उपलब्धि न होना (द्रव्यत्वे) द्रव्य होने (महत्त्वे) महान् होने (सति) पर (अपि) भी (रूपसंस्कारा- ऽभावात्) रूपसम्बन्ध के न होने से है ॥ यद्यपि वायु द्रव्य है और महान् है परन्तु उस में रूप का सम्बन्ध नहीं है, इस कारण उस की उपलब्धि आंख से नहीं होती ॥ ७ ॥ प्रश्न-जिस रूप के सम्बन्ध से प्रत्येक द्रव्य आंख से उपलब्ध होने लगता है, स्वयं उस रूप की उपलब्धि किस से होती है ? उत्तर- १६५-अनेकद्रव्यसमवायाद् रूपविशेषाच्च रूपोपलब्धिः ॥८॥ (अनेकद्रव्यसमवायात्) अनेक द्रव्यों के साथ सम्बन्ध होने से (च) और (रूपविशेषात्) रूप के विशेष से (रूपोपलब्धिः) रूप की उपलब्धि होती है ॥ जो पदार्थ अनेक द्रव्यों के संयोग से बनता है और उन द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखता है तथा अन्य रस गन्ध आदि से विशेष (भिन्नता) रखता है वही रूप आंख से उपलब्ध होता है ॥ ८ ॥ इसी प्रकार- १६६-तेन रसगन्धरूपर्शेषु ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ ६ ॥ (तेन) उसी प्रकार से (रसगन्धरूपर्शेषु) रस, गन्ध और स्पर्श, इन तीनों में भी (ज्ञानम्) ज्ञान को (व्याख्यातम्) कहा गया समझना चाहिये ॥ जिस प्रकार अनेक द्रव्यों के संयोग से और रूप विशेष से रूप उपलब्ध होता है इसी प्रकार समझना चाहिये कि अनेक द्रव्यों के संयोग और रस

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