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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

८२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद वेदान्त में शुद्ध प्रकृति के भाग विशेष माना गया है । इस प्रकार शास्त्रों में कोई विरोध नहीं किन्तु संज्ञाभेद और प्रक्रियाभेद मात्र है । अहङ्कार के सत्त्वगुणप्रधान भाग विशेष से ईश्वराज्ञानुकूल प्रत्येक जीव को एक आ- भ्यन्तर इन्द्रिय मन दिया गया है । अहङ्कार के तमोगुणप्रधान भाग विशेष से व्यापक दिशा और काल, व्यापक शब्द तन्मात्र, अणुस्पर्श तन्मात्र, रूप, तन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र; यह चारों भी उत्पन्न होते हैं। इन चारों को न्याय, वैशेषिक और मीमांसा में द्वयणुक कहते हैं । शब्दतन्मात्र से आकाश, स्पर्शतन्मात्र से वायु, रूपतन्मात्र से तेज, रसतन्मात्र से जल और गन्धतन्मात्र से पृथिवी; यह पांच महाभूत उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥ शङ्का-कार्यलिङ्ग से किसी कारण की सिद्धि तौ अवश्य होती है पर उस कारण के नित्य होने में क्या लिङ्ग है ? समाधान- १६१-अनित्य इति विशेषतः प्रतिषेधभावः ॥ ४ ॥ (अनित्यः इति) " अनित्य " इस शब्द में (विशेषतः) विशेष का (प्रतिषेधभावः) निषेध होना पाया जाता है ॥ यदि नित्य कोई पदार्थ नहीं होता तौ " अनित्य " शब्द में नञ् का अकार किस का निषेध करता ? बस अनित्य कहना भी किसी के नित्य होने का लिङ्ग है ॥ ४ ॥ यदि कहो कि हम तौ नित्य की अपेक्षा से नित्य नहीं कहते, तौ उत्तर- १६२-अविद्या ॥ ५ ॥ (अविद्या) तो आप की भ्रान्ति है । अर्थात् नित्य की अपेक्षा के विना अनित्य मानना अविद्या वा भ्रान्ति है क्योंकि अनित्य शब्द में जो निषेधार्थक अकार है वह नित्य का ही तौ निषेध कर सकता है ॥ ५ ॥ क्यों जी ! यदि पृथिवी आदि तत्त्वों का मूल कारण प्रकृति है, तौ फिर वह आंख से क्यों नहीं दीखती ? उत्तर- १६३-महत्यनेकद्रव्यवत्त्वाद्रूपाच्चोपलब्धिः ॥ ६ ॥ (महति) स्थूल वस्तु में अथवा महत्तत्त्व में (अनेकद्रव्यवत्त्वात्) अनेक द्रव्यवाला होने से (च) और (रूपात्) रूप से (उपलब्धिः) उपलब्धि होती है ॥

चतुर्थोऽध्याय १ आह्निक [८३]

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चतुर्थोऽध्याय १ आह्निक [८३]

जो पदार्थ महान् होते हैं वा स्थूल होते हैं, वे अनेक द्रव्यों के संयोग के बने होते हैं और रूप वाले होते हैं इस लिये उन की आंख से उपलब्धि होती है, परन्तु प्रकृति ऐसी नहीं । अर्थात् प्रकृति में न तो अनेक द्रव्यों का संयोग है और न रूप है, इस लिये इस की उपलब्धि आंख से नहीं होती ॥ ६ ॥ प्रश्न-अच्छा तो प्रकृति की उपलब्धि तो आंख से इस लिये नहीं होती कि वह अनेक द्रव्य वाली नहीं, परन्तु वायु तो अनेक द्रव्यों वाला है, फिर वह आंख से क्यों नहीं दीखता, वह तो महान् है ? उत्तर- १६४-सत्यपि द्रव्यत्वे महत्त्वे रूपसंस्काराभावाद् वायोरनुपलब्धिः ॥ ७ ॥ (वायोः) वायु की (अनुपलब्धिः) उपलब्धि न होना (द्रव्यत्वे) द्रव्य होने (महत्त्वे) महान् होने (सति) पर (अपि) भी (रूपसंस्कारा- ऽभावात्) रूपसम्बन्ध के न होने से है ॥ यद्यपि वायु द्रव्य है और महान् है परन्तु उस में रूप का सम्बन्ध नहीं है, इस कारण उस की उपलब्धि आंख से नहीं होती ॥ ७ ॥ प्रश्न-जिस रूप के सम्बन्ध से प्रत्येक द्रव्य आंख से उपलब्ध होने लगता है, स्वयं उस रूप की उपलब्धि किस से होती है ? उत्तर- १६५-अनेकद्रव्यसमवायाद् रूपविशेषाच्च रूपोपलब्धिः ॥८॥ (अनेकद्रव्यसमवायात्) अनेक द्रव्यों के साथ सम्बन्ध होने से (च) और (रूपविशेषात्) रूप के विशेष से (रूपोपलब्धिः) रूप की उपलब्धि होती है ॥ जो पदार्थ अनेक द्रव्यों के संयोग से बनता है और उन द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखता है तथा अन्य रस गन्ध आदि से विशेष (भिन्नता) रखता है वही रूप आंख से उपलब्ध होता है ॥ ८ ॥ इसी प्रकार- १६६-तेन रसगन्धरूपर्शेषु ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ ६ ॥ (तेन) उसी प्रकार से (रसगन्धरूपर्शेषु) रस, गन्ध और स्पर्श, इन तीनों में भी (ज्ञानम्) ज्ञान को (व्याख्यातम्) कहा गया समझना चाहिये ॥ जिस प्रकार अनेक द्रव्यों के संयोग से और रूप विशेष से रूप उपलब्ध होता है इसी प्रकार समझना चाहिये कि अनेक द्रव्यों के संयोग और रस

CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

तब नवम सूत्र का व्याख्यान कैसे ठीक माना जाय ? उत्तर-

८४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद विशेष से रस उपलब्ध होता है, अनेक द्रव्यों के संयोग और गन्ध विशेष से गन्ध उपलब्ध होता है और अनेक द्रव्यों के संयोग और गन्ध विशेष से गन्ध उपलब्ध होता है ॥ ९ ॥ शङ्का-पाषाणादि में जो गन्ध है वह तो नासिका से उपलब्ध नहीं होता, तब नवम सूत्र का व्याख्यान कैसे ठीक माना जाय ? उत्तर- १६७-तस्याऽभावादव्यभिचारः ॥ १० ॥ ( तस्य ) उस गन्ध विशेष के ( अभावात् ) उद्भूत न होने से ( अव्य- भिचारः ) नियम का भङ्ग नहीं होता ॥ पाषाणादि में गन्ध है तो सही परन्तु छिपा हुवा है इस लिये उपलब्ध नहीं होता, तब नवम सूत्र का व्याख्यान शङ्का के योग्य नहीं रहता । यदि पाषाण में सर्वथा गन्ध न होता तो पाषाण के भस्म में गन्ध क्यों उपलब्ध होता । भेद केवल इतना है कि वही गन्ध जो पाषाण में छिपा हुवा है, पाषाण के भस्म में प्रकट वा उद्भूत होने से उपलब्ध होने लगता है ॥१०॥ क्यों जी ! जैसे रूप, रस, गन्ध और स्पर्श; इन सब गुणों की उपलब्धि में एक एक इन्द्रिय से उपलब्ध होना कारण बताया गया, क्या इसी प्रकार संख्या परिमाण आदि गुणों की उपलब्धि में भी कोई कारण कहा जा सक्ता है ? उत्तर, हां- १६८-संख्याः परिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वे कर्म च रूपिद्रव्यसमवायाच्चाक्षु- षाणि ॥ ११ ॥ ( संख्याः ) संख्यायें, ( परिमाणानि ) परिमाण, ( पृथक्त्वं ) पृथक् होना, ( संयोगविभागौ ) संयोग और विभाग, (परत्वापरत्वे) परला होना और वरला होना, ( कर्म ) कर्म, ( च ) और स्नेह, द्रवता और वेग; ये सब भी (रूपिद्रव्यसमवायात्) रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध होने से (चाक्षुषाणि) आंख से उपलब्ध होने वाले हैं ॥ जिस प्रकार रूप गुण आंख से उपलब्ध होता है इसी प्रकार संख्यायें भी आंख से उपलब्ध होती हैं क्योंकि संख्यायें भी रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखती हैं, तथा जैसे रूप का आंख से ग्रहण होता है

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थाध्याय १ आन्हिक ८५ वैसे ही परिमाणों ( लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई, नीचाई, मोटाई ) का भी आंख से ग्रहण होता है क्योंकि लम्बाई चौड़ाई आदि परिमाण भी रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखते हैं । तथा पृथक् होना गुण भी आंख से ग्रहण किया जाता है और संयोग और विभाग भी आंख से ग्रहण होते हैं क्योंकि पृथक्ता, संयोग और विभाग भी रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखते हैं । ऐसे ही परे होना वा वरे होना भी रूप वाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखने से चक्षु द्वारा ही उप- लब्ध होता है। ऐसे ही कर्म भी चक्षु द्वारा उपलब्ध होता है क्योंकि कर्म भी रूपवाले द्रव्य के साथ समवाय सम्बन्ध रखता है। इस सूत्र में चकार से ( स्नेह ) चिकनाई, ( द्रवत्व ) गीलापन, और ( वेग ) धक्का; इन का ग्रहण है क्योंकि चिकनाई, तरी और धक्का; ये सब भी रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखते हैं ॥ ११ ॥ १६६-अरूपिष्वचाक्षुषाणि ॥ १२ ॥ ( अरूपिषु ) रूपरहित द्रव्यों में ( अचाक्षुषाणि ) [ संख्या आदि गुण ] आंख से ग्रहण नहीं किये जाते ॥ जो पदार्थ रूपरहित हैं अर्थात् चक्षु का विषय नहीं हैं उन में संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, वियोग, परत्व, अपरत्व, कर्म, स्नेह, द्रवत्व और वेग; ये सब गुण भी चक्षु का विषय नहीं होते ॥ १२ ॥ १७०-एतेन गुणत्वे भावे च सर्वेन्द्रियं ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ १३ ॥ ( एतेन ) इसी से ( गुणत्वे ) गुणत्व जाति में ( च ) और ( भावे ) सत्ता में ( सर्वेन्द्रियम् ) सब इन्द्रियों से होने वाला ( ज्ञानम् ) ज्ञान ( व्याख्या- तम् ) कहा गया समझना चाहिये ॥ जिस प्रकार चक्षुर्ग्राह्य द्रव्यों में संख्या आदि गुण आंख का विषय होते हैं तथा रूपरहित द्रव्यों में आंख का विषय नहीं होते, इसी प्रकार गुणत्व जाति और सत्ता में भी सर्वेन्द्रिय ज्ञान की व्याख्या होगई समझनी चाहिये ॥१३॥ इस आह्निक में पृथिवी आदि सब भावों का मूल कारण तथा उन की परोक्षता और अपरोक्षता शङ्का समाधानपूर्वक परीक्षित की गई ॥ इति चतुर्थाध्याये प्रथममाह्निकम् CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

८६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद अथ द्वितीयमान्हिकम् प्रश्न-प्रकृति के होने में जो पृथिवी आदि कार्य द्रव्यों को लिङ्ग बताया गया वह, कै प्रकार का होता है ? उत्तर- १७१-तत्पुनः पृथिव्यादि कार्यद्रव्यं त्रिविधं शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् ॥ १ ॥ ( तत् ) वह ( पृथिव्यादि कार्यद्रव्यं ) पृथिवी आदि कार्यद्रव्य ( पुनः ) फिर ( शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् ) शरीर, इन्द्रिय और विषय नाम वाला ( त्रिविधम् ) तीन प्रकार का है ॥ पृथिवी आदि कार्य पदार्थ, जो प्रकृति के होने में लिङ्ग हैं, तीन ३ प्रकार के होते हैं:-१-शरीररूप २-इन्द्रियरूप ३-विषयरूप ॥ इस दर्शन में जो पृथिवी आदि कार्य द्रव्य कहे गये हैं वे शरीर, इन्द्रिय और विषय भेद से तीन ३ प्रकार के होते हैं, उन में से शरीर = भोक्ता के भोग का स्थान कहाता है, इन्द्रिय = शरीर के आश्रय से रहता हुवा अपने से छूने वाले विषय में प्रत्यक्ष प्रतीति का साधन कहाता है और विषय = इन्द्रियों से भिन्न, आत्मा के उपभोग का साधन द्रव्य विषय कहाता है । इस प्रकार पृथिवी तीन प्रकार की है, जल तीन प्रकार का, तेज तीन प्रकार का, वायु तीन प्रकार का और आकाश दो प्रकार का होता है (क्योंकि आकाश शरीर रूप नहीं होता ) । काल एक प्रकार का होता है ( क्योंकि काल न शरीर रूप होता, न इन्द्रिय रूप होता, केवल विषय रूप होता है) । दिशा भी एक प्रकार की होती है ॥ हम लोगों के शरीर = देह, नाक इन्द्रिय, मिट्टी पत्थर आदि विषय; यह तीन प्रकार की पृथिवी है । जलस्थ प्राणियों के शरीर, रसना इन्द्रिय, नदी समुद्र हिमालय इत्यादि विषय, इस रीति से तीन प्रकार का जल है । तेजोमण्डल में रहने वाले प्राणियों का शरीर, आंख इन्द्रिय, पृथिवी आकाश उदर और खानि में उत्पन्न अग्नि विषय, इस रीति से तीन प्रकार का तेज है । वायुमण्डलस्थ प्राणियों का शरीर, सब शरीर में रहने वाली त्वक् इन्द्रिय, वृक्षादि को हिलाने वाला तथा शरीर के भीतर घूमने वाला वायु

चतुर्थाध्याय २ आह्निक ८९

चतुर्थाध्याय २ आह्निक ८९ प्राण विषय, इस रीति से तीन प्रकार का वायु है । यद्यपि प्राण एक है तथापि हृदय आदि भिन्न २ स्थानों में रहने से और मुख तथा नासिका आदि द्वारों में होकर निकलने से प्राण दश प्रकार का कहाता है- १-प्राण, २-अपान ३-समान ४-उदान ५-व्यान ६-नाग ७-कूर्म ८-कृकल ९-देवदत्त और १०-धनञ्जय, ये सब १० प्राण के भेद हैं जैसा कि एक श्लोक में कहा गया है- हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिसंस्थितः । उदानः कण्ठदेशस्थो व्यानः सर्वशरीरगः ॥ १ ॥ हृदय में प्राण, गुदा में अपान, नाभि में समान, कण्ठ में उदान और समस्त शरीर में व्यान नाम से प्राण रहता है तथा उगलने का काम करने वाला वायु नाग कहाता है, पलक मारने का कूर्म, भूख लगाने का कृकल, जम्भाई लेने का देवदत्त और पुष्टि करने वाला प्राण वायु धनञ्जय कहाता है ॥ आकाश के दो भेद ये हैं-१ कर्णपुट में रहनेवाला आकाश श्रोत्रेन्द्रिय है, तथा २-बाहर का समस्त आकाश विषय है । काल एक प्रकार का है परन्तु उस के भेद क्षण, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन, रात्रि, सप्ताह, पक्ष, मास, वर्ष, युग और कल्पभेद से अनेक प्रकार के हैं, सो सब विषयरूप हैं, इस लिये काल एक प्रकार का है ॥ दिशा भी पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैर्ऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और ईशान भेद से यद्यपि आठ प्रकार की हैं और किन्हीं के मत में ऊपर और नीचे की दो मिलाकर १० प्रकार की हैं परन्तु वे सब केवल एक विषय रूप हैं, शरीररूप वा इन्द्रियरूप नहीं होतीं ॥ मन केवल एक प्रकार का इन्द्रियरूप है, शरीररूप और विषयरूप नहीं ॥१॥ प्रश्न-पूर्व सूत्र में जो पृथिवी आदि कार्य द्रव्यों को शरीर इन्द्रिय विषय भेद से तीन प्रकार का कहा गया है, वह वह पृथिवी आदि कार्य द्रव्य पाञ्च महाभूतों से एक एक बनता है अथवा केवल एकला एकला ही है ? उत्तर- १७२-प्रत्यक्षाऽप्रत्यक्षाणां संयोगस्याऽप्रत्य- क्षत्वात् पञ्चात्मकं न विद्यते ॥ २ ॥

८८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद (प्रत्यक्षाऽप्रत्यक्षाणाम्) प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष द्रव्यों का (संयोगस्य) संयोग (अप्रत्यक्षत्वात्) प्रत्यक्ष न होने से (पञ्चात्मकम्) एक एक में पाञ्च पाञ्च का संयोग (न) नहीं (विद्यते) है ॥ पृथिवी आदि एक एक कार्य द्रव्य में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अन्य चार द्रव्यों का संयोग होता तौ पृथिवी प्रत्यक्ष न होती, प्रत्यक्ष होती है इस लिये पृथिवी को पञ्चभूतात्मक नहीं कह सकते । इसी प्रकार जल और तेज को समझो । वायु और आकाश, ये दोनों अप्रत्यक्ष हैं तब इन का संयोग प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है और जब संयोग प्रत्यक्ष नहीं तब किसी कार्य द्रव्य को पञ्चभूतात्मक कहना नहीं बनता ॥ २ ॥ क्योंजी ! पृथिवी आदि कार्य द्रव्यों को संयोगस्वरूप न जानकर संयोग से बना हुवा मानलें तब तौ उन को एक २ में पाञ्च पाञ्च के संयोग वाला मान सकते हैं, इस में क्या दोष है ? उत्तर- १७३-गुणान्तराऽभावाच्च ॥ ३ ॥ (गुणान्तराभावात्) अन्य गुणों के अभाव से (च) भी पृथिवी आदि कार्य द्रव्य को पञ्चात्मक नहीं मान सकते ॥ यदि पृथिवी आदि कार्य द्रव्य संयोग से बने होते तौ अवश्य उन में अन्य नये गुण पाये जाते जैसा कि हलदी और चूने के मिलाने से हलदी में रक्तवर्ण पाया जाता है, परन्तु हम नहीं देखते कि पृथिवी आदि कार्य द्रव्यों में कोई नया गुण पाया जाता हो, इस लिये पृथिवी आदि कार्य द्रव्यों को पञ्चात्मक नहीं मान सकते ॥ ३ ॥ अच्छा पञ्चात्मक न सही, त्र्यात्मक तौ मान सकते हो ? उत्तर नहीं, १७४-न त्र्यात्मकम् ॥ ४ ॥ (त्र्यात्मकम्) तीन तीन के संयोग से बनाहुवा भी (न) नहीं मान सक्ते, क्योंकि अन्य गुणों को नहीं पाते ॥ जैसे पृथिवी आदि कार्य द्रव्य को अन्य नये गुणों के न पाये जाने से एक एक में पाञ्च पाञ्च का संयोग नहीं मानाजासकता ऐसे ही अन्य गुणों के न पायेजाने से एक एक को तीन तीन के संयोग वाला भी नहीं मान सक्ते क्योंकि १-पृथिवी २-जल और ३-अग्नि, इन तीनों के गुण भी पृथिवी आदि किसी एक द्रव्य में नहीं पाये जाते, इस लिये त्र्यात्मक मानना भी ठीक नहीं ॥ ४ ॥

चतुर्थोध्याय २ आन्हिक ८९ यदि पृथिवी में गन्ध गुण के समान अन्य द्रव्यों के गुण रस और प्रकाश आदि नहीं होते तो पृथिवी में गीलापन जल का, पकना अग्नि का, उड़ना वायु का और अवकाश आकाश का गुण क्यों देखा जाता है ? उत्तर- १७५-अणुसंयोगस्त्वऽप्रतिषिद्धः ॥ ५ ॥ ( अणुसंयोगः ) अणुओं का संयोग ( तु ) तो ( अप्रतिषिद्धः ) निषिद्ध नहीं किया गया ॥ हमने पहले दोनों सूत्रों में जो एक २ के पञ्चात्मक होने का निषेध किया है उस से हमारा तात्पर्य अणुसंयोग के निषेध का नहीं है अर्थात् पृथिवी आदि एक एक द्रव्य से बने हुए पार्थिव शरीरादि एक एक कार्य में अन्य द्रव्यों को उन कार्यों का बनाने वाला न मानने से यह तात्पर्य है कि अस- मवायीकारण रूप संयोग हम नहीं मानते, इतने से यह नहीं समझना चाहिये कि हम निमित्त कारण रूप संयोग को भी न मानते हों । इस लिये पार्थिव शरीर आदि कार्य द्रव्यों में यदि जल का गीलापन, अग्नि की गर्मी, वायु की क्रिया और आकाश का अवकाश पाया भी जाता है तो भी हमारे मत में कोई दोष नहीं क्योंकि हम अणुओं के संयोग का निषेध नहीं करते ॥ ५ ॥ आगे शरीरों का विभाग करते हैं कि शरीर कै प्रकार के होते हैं- १७६-तत्र शरीरं द्विविधं योनिजमऽयोनिजं च ॥ ६ ॥ ( तत्र ) उन में ( शरीरं ) शरीर ( योनिजं ) योनि से उत्पन्न होने वाला ( च ) और ( अयोनिजं ) बिना योनि के उत्पन्न होने वाला ( द्विविधं ) दो प्रकार का है ॥ पिछले पाञ्च सूत्रों में जो पृथिवी आदि द्रव्यों को १-शरीर २-इन्द्रिय और ३-विषय नाम से तीन प्रकार का बताया गया है, उन तीनों में से १-शरीर दो प्रकार का होता है-१-योनिज, २-अयोनिज ॥ जल अग्नि और वायु से उत्पन्न शरीर अयोनिज होते हैं तथा पृथिवी से उत्पन्न शरीर योनिज तथा अयोनिज भी होते हैं, यह प्रशस्तपाद आचार्य्य का मत है। फिर योनिज भी दो प्रकार के होते हैं-१-जरायुज और २-अण्डज । गर्भ के लपेटने वाली झिल्ली जरायु कहाती है, उस से जन्म लेने वाले मनुष्य पशु और मृगों का शरीर जरायुज कहाता है । एक प्रकार को गोड़े १२

९० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद को अण्डहा कहते हैं जो भीतर से पोला होता है और उसी के भीतर शरीर बनता है, उस के टूटने से जिन के शरीरों का जन्म होता है, उन पक्षियों और सांपों का शरीर अण्डज कहाता है । फिर अयोनिज शरीर भी चार प्रकार के होते हैं-१-साङ्कल्पिक, २-सांसिद्धिक, ३-स्वेदज और ४-उद्भिज्ज । १-परमात्मा के सङ्कल्प से प्रत्येक सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न होने वाले ऋषि मुनि महर्षि और साधारण मनुष्यों के और पशु आदि के शरीर साङ्कल्पिक कहाते हैं । २-योगियों को जो योग द्वारा सिद्धियें प्राप्त होती हैं, उन सिद्धियों के बल से योगी लोग जिस चाहे उस शरीर को धारण करते हैं, वे उन के शरीर सांसिद्धिक कहाते हैं । ३-डांस, मच्छर, यूँत और अनेक प्रकार के जन्तु जो सील Dempness से उत्पन्न होते हैं, उन के शरीर स्वेदज कहाते हैं । ४-वृक्ष, वनस्पति, गुल्म, वीरुध, लता, घास, फूस आदि जो पृथिवी को फोड़कर उपजते हैं, उन के शरीर उद्भिज्ज कहाते हैं ॥ ६ ॥ शङ्का-सृष्टि के आदि में उत्पन्न होने वाले जीवों के शरीर परमात्मा के सङ्कल्प मात्र से अयोनिज उत्पन्न हो जाते हैं, यह बात समझ में नहीं आई, क्योंकि उस का कारण नहीं बताया गया ? अब समाधान समझिये- १७७-अनियतदिग्देशपूर्वकत्वात् ॥ ७ ॥ [ सर्गारम्भ के शरीर जिस कारण से उत्पन्न होवें, उस कारण की ] (अनियतदिग्देशपूर्वकत्वात्) दिशा और देश पूर्व नियत न होने से [उन को अयोनिज ही मान सकते हैं] ॥ सृष्टि के आरम्भ में किसी दिशा वा देश में किसी जीव की कोई योनि शेष नहीं थी और प्रकृति जड़ होने से इस चमत्कारचातुरीयुक्त सृष्टि को उत्पन्न करले, यह सम्भव नहीं, इस लिये चेतन परमात्मा के सङ्कल्प से उपादान कारण प्रकृति में से इस आश्चर्य्यरूप जगत् का उत्पन्न होना माना जा सकता है, इस लिये सर्गारम्भ में उत्पन्न होने वाले मनुष्य पशु पक्षी कीट पतङ्ग आदि सब प्राणियों के देहों को परमात्मा के सङ्कल्प से उत्पन्न होने से साङ्कल्पिक कहा गया ॥ १ ॥ प्रश्न-यदि ऐसा है तो समान कारण से उत्पन्न हुवे समस्त शरीर एक से होते ? भिन्न २ और विलक्षण सृष्टि की उत्पत्ति का क्या कारण है ? उत्तर- १७८-धर्मविशेषाच्च ॥ ८ ॥

चतुर्थाध्याय २ आन्हिक २९ ( धर्मविशेषात् ) विशेष धर्म से ( च ) और विशेष अधर्म से ॥ सृष्टि के आरम्भ में जो जीव भिन्न २ देहों को धारण करते हैं, उन्हों ने पूर्व कल्प में भिन्न २ प्रकार के धर्म विशेष और अधर्म विशेष किये थे, बस उन्हीं धर्माऽधर्मों के विशेष ( भिन्न २ ) होने से मनुष्य पशु पक्षी आदि एक दूसरे से विलक्षण शरीर उत्पन्न हुये ॥ अर्थात् सातवें सूत्र में कहा हुवा ही एक हेतु नहीं है; जिस से दिशा और देश का पूर्व कारण में भेद न होने से सब के एकसे देह उत्पन्न होने की शङ्का बन सकती, किन्तु दूसरा हेतु भी जो इस आठवें सूत्र में कहा गया है, वह धर्म और अधर्म विशेष है, क्योंकि सब जीवों के धर्म अधर्म आपस में समान नहीं होते, इस लिये धर्माऽधर्म के फल भोगने के लिये जो देह उन को दिये जाते हैं, वे सब भी एकसे नहीं होते किन्तु अपने २ किये हुए धर्मविशेष और अधर्मविशेष से सब को भिन्न २ प्रकार के देह मिलते हैं ॥ ८ ॥ सर्गारम्भ के शरीरों के अयोनिज होने में अन्य भी हेतु है । यथा- १७९-समाख्याभावाच्च ॥ ९ ॥ ( समाख्याभावात् ) प्रसिद्ध नाम पाये जाने से ( च ) भी ॥ अग्नि, वायु, रवि, भृगु, वशिष्ठ, गौतम, भरद्वाज, अङ्गिरा, जमदग्नि आदि कितने ही ऋषियों के नाम सदा से प्रसिद्ध हैं कि जिन का कोई पिता वा माता परमात्मा के अतिरिक्त नहीं था, इस ऐतिहासिक प्रमाण से भी साङ्कल्पिक अयोनिज शरीर सिद्ध होते हैं ॥ ९ ॥ क्योंकि- १८०-संज्ञाया आदित्वात् ॥ १० ॥ ( संज्ञायाः ) संज्ञा के ( आदित्वात् ) सब से प्रथम होने से ॥ अग्नि, वायु, रवि आदि की संज्ञा ( नाम ) सब से प्रथम पाये जाते हैं, उन से पूर्व उन के पिता आदि का नाम नहीं पाया जाता, इस से उन को अयोनिज मानना बनता है ॥ १० ॥ १८१-सन्त्यऽयोनिजाः ॥ ११ ॥ ( अयौनिजाः ) बिना योनि से उत्पन्न हुवे ( सन्ति ) सिद्ध हैं ॥ छठे सूत्र से दशवें पर्यन्त सूत्रों में वर्णित और प्रमाणित अयोनिज शरीर अवश्य होते हैं, यह सिद्ध हुवा ॥ ११ ॥

गये, अगले सूत्र में वेद की साक्षी भी देते हैं-

९२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद इसी अर्थ की पुष्टि में अनुमान प्रमाण और ऐतिहासिक प्रमाण तो कहे गये, अगले सूत्र में वेद की साक्षी भी देते हैं- १८४-वेदलिङ्गाच्च ॥ १२ ॥ (वेदलिङ्गात्) वेदों में चिन्ह पाये जाने से (च) भी ॥ ऋग्वेद अष्टक ८ अध्याय ४ वर्ग १८ ऋचा ५ "विश्वाञ् देवान् जगत्या विवेश। तेन चाक्लृपे ऋषयो मनुष्याः" तथा ऋग्वेद अष्टक ८ अध्याय ४ वर्ग १८ ऋचा १० "तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः" तथा यजुर्वेद अध्याय ३१ मन्त्र ८ भी अक्षरशः इसी ऋचा के समान है तथा अथर्व काण्ड १० अनुवाक ४ मन्त्र ८ " प्रजापतिः ससृजे विश्वरूपम्। इत्यादि अनेक वेदमन्त्रों में पाया जाता है कि परमात्मा ने उपादान कारण से बिना योनिविशेष के अनेक ऋषि मुनि आदि मनुष्यों, पशुओं और पक्षी आदि की सृष्टि को अयोनिज उत्पन्न किया । जैसा कि सूत्र संख्या १६० में भी कुछ विस्तार से निरूपण किया गया है। वे वेदमन्त्र भी अयोनिज सृष्टि में प्रमाण हैं ॥ १२ ॥ इस चतुर्थाध्याय के द्वितीय आह्निक में पृथिवी आदि का शरीर इन्द्रिय विषयभेद से त्रिविध होना तथा फिर योनिज अयोनिज भेद से शरीर का द्विविध होना कहा गया ॥ इति चतुर्थाध्याये द्वितीयमाह्निकम् —**— इति श्री तुलसीराम स्वामि कृते वैशेषिक दर्शन भाषानुवादे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

ओ३म् अथ पञ्चमोऽध्यायः तत्र प्रथममाह्निकम् द्रव्यों की परीक्षा हो चुकी, आगे गुणों की परीक्षा करनी है, उस में गुणों की परीक्षा से पहले कर्मों की परीक्षा करना चाहते हुए पञ्चमाध्याय का आरम्भ करते हुवे वैशेषिकाचार्य मुनिवर कणाद ग्रन्थ पढ़नेवालों के उपकारार्थ प्रथम उत्क्षेपण नाम कर्म के विषय में कहते हैं कि- १८३-आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्यां हस्ते कर्म ॥ १ ॥ ( आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्याम् ) मन सहित आत्मा के संयोग और प्रयत्न से ( हस्ते ) हाथ में ( कर्म ) उठाने वा उछलने की क्रिया होती है ॥ जब कि कोई पुरुष यज्ञ वा वेदपाठ आदि कर्मों में हाथ उठाना चाहता है तब उस के आत्मा में एक प्रकार का प्रयत्न उत्पन्न होता है, उस प्रयत्न से मन और आत्मा हाथ से संयोग करते हैं और तब हाथ में उठाने वा उछलने का कर्म प्रकट होता है ॥ आशय यह है कि यद्यपि आत्मा अणु और सूक्ष्म है तथा हृदय में रहता है इस लिये आत्मा का संयोग हाथ के साथ साक्षात् नहीं हो सक्ता तथापि मन जो कि आत्मा और हाथ के बीच में है, वह एक ओर से आत्मा के प्रयत्न को ग्रहण करलेता है और दूसरी ओर हाथ से छूकर आत्मा से लिये हुए प्रयत्न को हाथ से लगा देता है तब उस प्रयत्न से प्रेरा हुवा हाथ उठने वा उछलने का काम करने लगता है ॥ १ ॥ हाथ का उठना कहकर आगे मूसल का उठना कहते हैं- १८४-तथा हस्तसंयोगाच्च मुशले कर्म ॥ २ ॥ ( तथा ) इसी प्रकार ( हस्तसंयोगात् ) हाथ के संयोग से ( च ) और भारी होने से ( मुशले ) मूसल में ( कर्म ) क्रिया होती है ॥ जिस प्रकार आत्मा की प्रेरणा से मन में प्रयत्न होता है और मन के संयोग से हाथ में, इसी प्रकार मूसल के बोझ से मूसल में उत्क्षेपणकर्म होता है ॥ २ ॥

९४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद क्यों जी ! जब मूसल ओखली में चोट खाकर फिर ऊपर को उछलता है, तब उस के ऊपर उठने में कारण क्या है ? क्या हाथ का संयोग ही उस का कारण है ? उत्तर, नहीं- १८५-अभिघातजे मुशलादौ कर्मणि व्यतिरेका- दऽकारणं हस्तसंयोगः ॥ ३ ॥ (अभिघातजे) चोट देने से उत्पन्न हुए (मुशलादौ) मूसल आदि में (कर्मणि) जो क्रिया उत्पन्न होती है उस में (हस्तसंयोगः) हाथ का संयोग (अकारणम्) कारण नहीं है (व्यतिरेकात्) तद्भिन्न होने से ॥ हाथ से पकड़ कर जब मूसल को ओखली में मारते हैं तब मूसल फिर ऊपर को उठता है उस के उठने में केवल हाथ का संयोग कारण नहीं है क्यों कि चोट खाया हुवा मूसल आदि विना हाथ लगाये अपने आप भी ऊपर को उछलता है इस लिये हाथ का संयोग मूसल के उठने में कारण नहीं है किन्तु वेग कारण है ॥ ३ ॥ और भी- १८६-तथात्मसंयोगो हस्तकर्मणि ॥ ४ ॥ (तथा) इसी प्रकार (आत्मसंयोगः) आत्मा का संयोग (हस्तकर्मणि) हाथ के उठने रूप कर्म में [कारण नहीं है ] ॥ ४ ॥ प्रश्न-तौ फिर हाथ के उठने में कारण क्या है ? उत्तर- १८७-अभिघातान्मुशलसंयोगाद्धस्ते कर्म ॥ ५ ॥ (अभिघातात्) चोट मारने से (मुशलसंयोगात्) मूसल को पकड़े रहने से (हस्ते) हाथ में (कर्म) उठने की क्रिया होती है ॥ मूसल को ओखली में मारने से मूसल में वेग उत्पन्न होता है और वेग- वान् मूसल के संयोग से हाथ में ऊपर को उठना रूप कर्म होता है, उस कर्म में आत्मा का संयोग वा मन का संयोग कारण नहीं, किन्तु मूसल में उत्पन्न हुवा वेग ही हाथ लगने से हाथ के उठने में कारण है ॥ ५ ॥ क्यों जी ! हाथ के उठने में तौ मूसल का वेग कारण है परन्तु हाथ के साथ २ अन्य शरीर के उभार में क्या कारण है ? उत्तर- १८८-आत्मकर्म हस्तसंयोगाच्च ॥ ६ ॥ (हस्तसंयोगात्) हाथ के संयोग से (च) और वेग से (आत्मकर्म) आपे [देह] में कर्म होता है ॥

अर्थात् उछलते हुए मूसल के साथ संयुक्त हुवा हाथ ऊपर को उठता है और उठते हुए हाथ के साथ संयुक्त होने से शरीर भी ऊपर को उठता है, तब शरीर के ऊपर उठने में भी आत्मा का प्रयत्न कारण नहीं, किन्तु हाथ का संयोग और वेग ही कारण है ॥ ६ ॥ प्रश्न-अच्छा, हाथ और मूसल के उठने में तो वेग कारण हुवा परन्तु मूसल के फिर नीचे गिरने में क्या कारण है क्योंकि हाथ अलग करलेने पर भी मूसल नीचे गिरा करता है ? उत्तर- १८६-संयोगाभावे गुरुत्वात् पतनम् ॥ ७ ॥ ( संयोगाभावे ) हाथ का संयोग न रहने पर ( गुरुत्वात् ) भारी होने से ( पतनम् ) गिरना होता है ॥ ७ ॥ क्यों जी ! भारी होने से केवल नीचे ही को गिरना क्यों होता है जब कि उठे हुए मूसल के चारों ओर एकसा आकाश है तब मूसल केवल नीचे ही को क्यों गिरता है ? पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर वा ऊपर को क्यों न गिरने लगे ? उत्तर- १९०-नोदनविशेषाभावान्नोर्ध्वं न तिर्यग् गमनम् ॥ ८ ॥ ( नोदनविशेषाभावात् ) प्रेरणा विशेष के न होने से ( ऊर्ध्वम् ) ऊपर को ( न ) नहीं और ( तिर्यग् ) पूर्व पश्चिम दक्षिण उत्तर को तिरछा ( गम- नम् ) गमन भी ( न ) नहीं होता ॥ ऊपर को उठा हुवा मूसल और भी ऊपर को उठता अथवा पूर्व पश्चि- मादि दिशाओं को तिरछा जाता, यदि आत्मा में प्रेरणा विशेष होती, परन्तु प्रेरणा विशेष न होने से मूसल किसी अन्य दिशा को नहीं चलता किन्तु सूत्र ७ में कहे गुरुत्वकारण से जिस में पृथिवी और मूसल का गुरुत्वधर्म आकर्षक है, केवल नीचे को गिरता है ॥ ८ ॥ प्रश्न-प्रेरणा विशेष क्यों नहीं होती और क्यों होती है ? उत्तर- १९१-प्रयत्नविशेषात्नोदनविशेषः ॥ ९ ॥ ( प्रयत्नविशेषात् ) विशेष प्रयत्न से ( नोदनविशेषः ) विशेष प्रेरणा होती है ॥

९६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद जब आत्मा में कोई विशेष प्रयत्न होता है तब उस प्रयत्न से मन में, मन से हाथ में, और हाथ से मूसल में प्रेरणा उत्पन्न होती है तब मूसल तिरछा वा ऊपर को चलता है और प्रेरणा नहीं होती तब नहीं चलता ॥९॥ प्रश्न-अच्छा, विशेष प्रयत्न से विशेष प्रेरणा होती है सही परन्तु भारी द्रव्य के ऊपर को वा तिरछा चलने में क्या कहा गया ? उत्तर-यह कहा गया है कि- १६२-नोदनविशेषादुदसनविशेषः ॥ १० ॥ (नोदनविशेषात्) विशेष प्रेरणा से (उदसनविशेषः) विशेष उछाल होता है ॥ अर्थात् जैसी प्रेरणा होती है वैसा उछाल होता है। दूर फेंकने की प्रेरणा हो तो दूर तक उछाल होता है और अति दूर फेंकने की प्रेरणा हो तो अति दूर तक उछाल होता है। उछाल में ही तिरछा फेंकना भी अन्तर्गत समझना चाहिये ॥१०॥ प्रश्न-यदि प्रेरणा विशेष से विशेष उछलना होता है तो फिर खेलते हुए बालक के हाथ पांव चलना न होना चाहिये क्योंकि बालक में कोई प्रेरणा विशेष नहीं होती तो भी इधर उधर हाथ पांव चलते हिलते देखे जाते हैं ? उत्तर- १६३-हस्तकर्मणा दारककर्म व्याख्यातम् ॥ ११ ॥ (हस्तकर्मणा) हाथ की क्रिया से (दारककर्म) बालकों की क्रिया (व्याख्यातम्) व्याख्या की गयी ॥ कन्दुक आदि फेंकने के समय आत्मा का संयोग और प्रयत्न मन की सहायता से हाथ में पहुंचता है, उस से हाथ चलता है, उस के साथ अन्य अङ्गों में भी क्रिया उत्पन्न हो जाती है ॥ ११ ॥ प्रश्न-क्या कोई और भी ऐसा कर्म है जो विशेष प्रेरणा के बिना ही प्रेरणा मात्र से उत्पन्न हो जाता हो ? उत्तर, हां- १६४-तथा दग्धस्य विस्फोटने ॥ १२ ॥ (तथा) इसी प्रकार (दग्धस्य) फुंकी हुई वस्तु के (विस्फोटने) फोड़ने में॥ जैसे कन्दुक आदि फेंकने में बालकों के हाथ आत्मा और मन के प्रयत्न से चलते हैं और उस से अन्य अङ्गों में क्रिया उत्पन्न हो जाती है। इसी

प्रकार अग्नि के संयोग से थोड़े फुंके हुए पत्थर या फल आदि के फोड़ने या फाड़ने में उस पत्थर वा फल आदि के अवयवों का दायें बायें या ऊपर को फटकर जाना इत्यादि क्रिया भी विशेष प्रेरणा के विना केवल साधारण प्रेरणा से होजाती है ॥ १२ ॥ प्रश्न जब कि मनुष्य सो जाता है वा मर जाता है वा अन्य कारण से अचेत होजाता है, तब भी कभी २ उस के हाथ पांव हिल जाते हैं, तब प्रयत्न के विना भी हाथ पांव के हिलने में क्या कारण होता है ? उत्तर- १८५-यत्नाभावे प्रसुप्तस्य चलनम् ॥ १३ ॥ १८६-तृणे कर्म वायुसंयोगात् ॥ १४ ॥ (प्रसुप्तस्य) सोये हुए वा अचेत हुए के (यत्नाभावे) प्रयत्न न होने पर (चलनम्) हाथ पांव का हिलना (तृणे) तिनके में (कर्म) हिलने की क्रिया (वायुसंयोगात्) वायु के संयोग से होती है ॥ अचेत अवस्था में पड़े हुए मनुष्य के हाथ पांव हिलने में अथवा तृण आदि के हिलने में जो क्रिया होती है, उस का कारण वायु का संयोग है ॥ १३-१४ ॥ प्रश्न-चुम्बक पत्थर आदि के साथ लोहे की सुई आदि के चलने में क्या कारण है ? उत्तर- १८७-मणिगमनं सूच्यभिसर्पणमदृष्टकारणम् ॥ १५ ॥ (मणिगमनम्) कोई २ तृण विशेष जो तृणकान्तमणि की ओर चलता है और (सूच्यभिसर्पणम्) चुम्बकमणि की ओर सुई चलती है सो (अदृष्ट कारणम्) अदृष्टकारण वाली है ॥ इसी सूत्र के भाष्य में शङ्कर मिश्रादिकों ने कैसी मोटी भूल की है कि जो अदृष्ट शब्द का अर्थ पाप पुण्य कर दिया है। भला चुम्बक पत्थर के अभिमुख लोह शङ्कु वा सुई के चलने में सुई ने क्या पाप वा पुण्य किया है ? वास्तव में यहां अदृष्ट शब्द का अर्थ प्रारब्ध पाप पुण्य कर्म नहीं किन्तु तृणकान्तमणि और चुम्बक मणि में स्थित अदृष्ट (विना देखी) आकर्षणशक्ति कारण है ॥१५॥ तथा- १८८-इषावयुगपत् संयोगविशेषाः कर्मान्यत्वे हेतुः ॥ १६ ॥ (इषौ) धनुष् के रोदे से भिन्न हुए बाण में (अयुगपत्) अनेक समयों में (संयोगविशेषाः) भिन्न २ संयोग (कर्मान्यत्वे) कर्म के अन्य होने में (हेतुः) कारण बन जाते हैं ॥ १३

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९८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद धनुष के रोदे से छूटे हुए बाण से उस बाण के गिरने तक बीच में अनेक कर्म होते हैं, उनका हेतु क्या है ? उत्तर- अनेक समयों में होने वाले अनेक संयोग उन अन्य अनेक कर्मों का कारण होते हैं। कल्पना करो कि किसी धनुर्धरी ने धनुष में बाण लगाकर और बलपूर्वक आकर्णान्त खींच कर एक बाण चलाया और वह बाण रोदे से छूटकर इतने बल से आगे बढ़ा कि आधे कोस पर भूमि पर गिरेगा। बीच में कहीं वृक्षों की पत्तियों में को और कहीं लघुकाय पक्षियों में को होकर बाण निकला चलागया तो बाण के छोड़ने में प्रथम कारण धनुर्धारी के आत्मा, मन, हाथ और धनुष की प्रत्यञ्चा; ये चार कारण हैं, परन्तु बीच में आने वाले वृक्षों की पत्तियों में छिद्र होना और पक्षियों के देहों का बिन्धना इत्यादि अनेक कर्मों का कारण बीच में होने वाले अनेक संयोग हैं ॥ १६ ॥ प्रश्न-किस २ कारण से बाण के गिरने तक बाण में अनेक कर्म उत्पन्न होते हैं ? उत्तर- १९९-नोदनादाद्यमिषोः कर्म, तत्कर्मकारिताच्च संस्कारादुत्तरं तथोत्तरमुत्तरं च ॥ १७ ॥ ( नोदनात् ) प्रेरणा से ( इषोः ) बाण का ( आद्यम् ) पहला ( कर्म ) काम आरम्भ होता है ( च ) और ( तत्कर्मकारितात् ) उस कर्म के कर्त्ता पने से (संस्कारात् ) संस्कार वश ( उत्तरम् ) अगला ( तथा ) इसी प्रकार ( उत्तरम् ) अगला ( च ) और ( उत्तरम् ) अगला [ कर्म उत्पन्न होता है ] ॥ जब बाण को प्रेरणा से छोड़ते हैं तब बाण के चलने में प्रेरणा कारण होती है, फिर बाण का चलना और वृक्षादि की पत्तियों का संयोग उन के बिन्धने का कारण होता है, इसी प्रकार आगे २ होने वाले कर्मों का कारण उन के पिछले २ कर्म होते हैं ॥ १७ ॥ परन्तु- २००-संस्काराभावे गुरुत्वात् पतनम् ॥ १८ ॥ ( संस्काराभावे ) संस्कार के न रहने पर ( गुरुत्वात् ) भारी होने से ( पतनम् ) पतन हो जाता है ॥ जब बाण में धनुर्धारी की प्रेरणा का बलसंस्कार समाप्त हो जाता है तब बाण अपने बोझ से आप गिर पड़ता है अर्थात् पृथिवी की आकर्षण शक्ति से पृथिवी की ओर खिंच जाता है ॥ १८ ॥ जिस प्रकार लोक में हर एक कर्म किसी प्रयत्न का परिणाम होता है वही बात प्रसङ्गवश इस आह्निक में अच्छे प्रकार से वर्णित की गई है ॥ इति पञ्चमाध्याये प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥

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पञ्चमोऽध्याय २ आह्निक ९५

पञ्चमोऽध्याय २ आह्निक ९५ ओ३म् अथ द्वितीयमाह्निकम् आत्मा के अधिष्ठातृत्व में शरीर के अवयवों और उस से सम्बन्ध पाये हुए मूसल आदि साधन विशेषों में प्रयत्नादि कारण से उत्क्षेपणादि कर्मों का लक्षण और परीक्षा समाप्त हुई । इस अगले आह्निक में पृथिवी आदि द्रव्यों में प्रेरणादि से उत्पन्न होने वाले गमन आदि कर्म की परीक्षा के लिये प्रथम यह वर्णन करते हैं कि पृथिवी में अपने आप उत्पन्न होने वाला कर्म (भूकम्प आदि) किस प्रकार होता है— २०१-नोदनाभिघातात्संयुक्तसंयोगाच्च पृथिव्यां कर्म ॥ १ ॥ (नोदनाभिघातात्) प्रेरणा की चोट से (च) और (संयुक्तसंयोगात्) संयुक्त पदार्थों के साथ संयोग से (पृथिव्याम्) पृथिवी में (कर्म) गमन और भूकम्पादि क्रिया होती है ॥ पृथिवी में ऐसे द्रव्यों का संयोग विशेष है, जिन से उस का सूर्य के साथ आकर्षण हो और वह गति क्रिया से युक्त होकर आगे को चले और सूर्य की ओर आकर्षण के बल से उस की गति स्वयं अपनी परिक्रमा का कारण आप ही बने और उस की गति से जो हिलोर और रगड़ उत्पन्न हो उस से अपूर्व स्थानों में अपूर्व द्रव्यों का संयोग हो और उन संयुक्त द्रव्यों के संयोग से उस का फटना वा हिलना वा कांपना इत्यादि क्रिया उत्पन्न होवें॥१॥ पृथिवी के अपनी और सूर्य की परिक्रमा करने रूप क्रिया का कारण बतलाते हैं:— २०२-तद्विशेषेणादृष्टकारितम् ॥ २ ॥ (तद्विशेषेण) पृथिवीस्थ पृथिवी की विशेषता से (तत्) वह गति क्रिया (अदृष्टकारितम्) अदृष्ट आकर्षणशक्ति से कराई हुई है ॥ २ ॥ पृथिवी की क्रिया परीक्षित हो चुकी। अब जल की क्रिया की परीक्षा करेंगे, उस का आरम्भ करते हैं:— २०३-अपां संयोगाभावे गुरुत्वात् पतनम् ॥ ३ ॥ (अपाम्) जलों के (गुरुत्वात्) भारी होने से (संयोगाभावे) संयोग न रहने पर (पतनम्) गिरना होता है ॥

१०० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद अर्थात् ऊपर से छोड़ा हुवा जल, धारक पदार्थ के संयोग बिना भारी होने से पृथिवी की आकर्षणशक्ति से पृथिवी पर गिर पड़ता है ॥ ३ ॥ २०४-द्रवत्वात् स्यन्दनम् ॥ ४ ॥ ( द्रवत्वात् ) गीला और पतला होने से ( स्यन्दनम् ) नीचान में को बहाव होता है ॥ ४ ॥ प्रश्न-यदि गीला और पतला होने से जल नीचे को बहता है तो फिर समुद्र का जल मेघ में पहुंचने के लिये ऊपर कैसे चढ़ता है ? वह तो सदा नीचे ही को बहना चाहिये ? उत्तर- २०५-नाड्यवायुसंयोगादारोहणम् ॥ ५ ॥ ( नाड्यवायुसंयोगात् ) सूर्यकिरण और वायु के संयोग से [ जलों का ] ( आरोहणम् ) ऊपर को चढ़ाव होता है ॥ इस सूत्र से यह भी ध्वनि निकलती है कि यदि किसी नाड़ी ( नली ) में गर्मी भरी जावे और वह वायु को ऊपर को फेंके और फिर नीचे नली रिक्त होजावे तो अपने से छुए हुए पानी को ऊपर को खींचेगी ॥ ५ ॥ प्रश्न-सूर्य की किरण और वायु का संयोग के सिवाय कभी २ बिना सूर्य की किरणों के भी पानी ऊपर को चढ़ता देखा जाता है, जैसे फ़ौवारे में । सो क्यों ? उत्तर- २०६-नोदनापीडनात् संयुक्तसंयोगाच्च ॥ ६ ॥ ( नोदनापीडनात् ) धक्के और दबाव से ( च ) और ( संयुक्तसंयोगात् ) संयुक्त पदार्थ के संयोग से [ भी पानी ऊपर को उठता है ] ॥ २०७-वृक्षाभिसर्पणमित्यदृष्टकारितम् ॥ ७ ॥ ( इति ) यह ( अदृष्टकारितम् ) अदृष्ट वृक्षस्थ जीव शक्ति का कराया हुवा काम है कि ( वृक्षाभिसर्पणम् ) वृक्ष की ओर पानी का खिंच जाना ॥ वृक्ष की जड़ में दिया हुवा पानी जो ऊपर को वृक्ष के पत्र और शाखाओं में पहुंच जाता है, उस का कारण वह अदृष्ट शक्ति है जो जीवित वृक्ष में परमात्मा ने छिपी हुई रक्खी है ॥ ७ ॥ और- २०८-अपां संघातो विलयनञ्च तेजःसंयोगात् ॥ ८ ॥ ( अपाम् ) जल का ( संघातः ) जमाव ( च ) और ( विलयनम् ) गलकर पतला होजाना ( तेजःसंयोगात् ) तेज के संयोग से होता है ॥

आकाश से जमे हुए पानी के ओले वर्षने में अथवा बर्फ़ जमाने की कलों में पानी के जमजाने में कारण दिव्य तेज का संयोग है और फिर बर्फ़ से वा ओले से गलकर पानी होजाने का कारण लौकिक गर्मी का संयोग है ॥८॥ २०९-तत्र विस्फूर्जथुलिङ्गम् ॥ ९ ॥ ( तत्र ) उस मेघमण्डल में ठहरे हुए जलों के जमाव में ( विस्फूर्जथुः ) बिजली की चमक और कड़क ( लिङ्गम् ) तेज की पहचान है ॥ यदि मेघ में दिव्यतेज का संयोग न होता तौ बिजली की चमक और कड़क न पाई जाती । पाई जाती है, इस से जाना जाता है कि मेघस्थ जलों में दिव्यतेज बिजली का संयोग है, जो जल के पतला रहने के कारण लौकिक गर्मी को बल से बाहर फेंक देता है और जल को जमा देता है, जिस से सघन जल के संयोग से पाषाणतुल्य कठिन शिला सी बन जाती हैं और वे ही टूट २ कर ओले के रूप में वर्षती हैं । यही कारण बर्फ़ की कलों में है । फिर जब बिजली का प्रभाव बर्फ़ में से निकलता जाता है और उस के स्थान में लौकिक गर्म वायु घुसता जाता है तब बर्फ़ पिघल कर फिर पतला पानी हो जाता है ॥ ९ ॥ तथा- २१०-वैदिकञ्च ॥ १० ॥ ( च ) और ( वैदिकम् ) वेद का भी यही सिद्धान्त है ॥ “ गर्भोऽस्योषधीनां गर्भोवनस्पतीनाम् । गर्भोविश्वस्य भूतस्याग्ने गर्भो अपामसि ” ॥ ( यजुः १२-३७ ) अर्थ-अग्नि ओषधियों का गर्भ है, वनस्पतियों का गर्भ है, सब भूत मात्र का गर्भ है ( और ) “ जलों का गर्भ= भीतर रहने वाला है ” ॥ इसी प्रकार- “गर्भोयो अपां गर्भोवनानां गर्भश्च स्थातां गर्भश्चरथाम् । अद्रौ चिदस्मा अन्तर्दुरोणे विशां न विश्वो अमृतः स्वाधीः” ॥ ( ऋ० १ । ७० । २ ) अर्थ-जो जलों के गर्भ में रहता है, वनस्थ वनस्पतियों के गर्भ में रहता है और स्थावर जङ्गम के गर्भ में रहता है और पहाड़ों के नीचे दुर्गम छिपे