वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंओ३म् अथ पञ्चमोऽध्यायः तत्र प्रथममाह्निकम् द्रव्यों की परीक्षा हो चुकी, आगे गुणों की परीक्षा करनी है, उस में गुणों की परीक्षा से पहले कर्मों की परीक्षा करना चाहते हुए पञ्चमाध्याय का आरम्भ करते हुवे वैशेषिकाचार्य मुनिवर कणाद ग्रन्थ पढ़नेवालों के उपकारार्थ प्रथम उत्क्षेपण नाम कर्म के विषय में कहते हैं कि- १८३-आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्यां हस्ते कर्म ॥ १ ॥ ( आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्याम् ) मन सहित आत्मा के संयोग और प्रयत्न से ( हस्ते ) हाथ में ( कर्म ) उठाने वा उछलने की क्रिया होती है ॥ जब कि कोई पुरुष यज्ञ वा वेदपाठ आदि कर्मों में हाथ उठाना चाहता है तब उस के आत्मा में एक प्रकार का प्रयत्न उत्पन्न होता है, उस प्रयत्न से मन और आत्मा हाथ से संयोग करते हैं और तब हाथ में उठाने वा उछलने का कर्म प्रकट होता है ॥ आशय यह है कि यद्यपि आत्मा अणु और सूक्ष्म है तथा हृदय में रहता है इस लिये आत्मा का संयोग हाथ के साथ साक्षात् नहीं हो सक्ता तथापि मन जो कि आत्मा और हाथ के बीच में है, वह एक ओर से आत्मा के प्रयत्न को ग्रहण करलेता है और दूसरी ओर हाथ से छूकर आत्मा से लिये हुए प्रयत्न को हाथ से लगा देता है तब उस प्रयत्न से प्रेरा हुवा हाथ उठने वा उछलने का काम करने लगता है ॥ १ ॥ हाथ का उठना कहकर आगे मूसल का उठना कहते हैं- १८४-तथा हस्तसंयोगाच्च मुशले कर्म ॥ २ ॥ ( तथा ) इसी प्रकार ( हस्तसंयोगात् ) हाथ के संयोग से ( च ) और भारी होने से ( मुशले ) मूसल में ( कर्म ) क्रिया होती है ॥ जिस प्रकार आत्मा की प्रेरणा से मन में प्रयत्न होता है और मन के संयोग से हाथ में, इसी प्रकार मूसल के बोझ से मूसल में उत्क्षेपणकर्म होता है ॥ २ ॥