वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ प्रशस्तपादभाष्यम् वैशेषिकसूत्र की दोनों पुस्तकों के छपने के बाद एक बात और सामने आयी है । उन दोनों ही पुस्तकों में "धर्मविशेषप्रसूतात्" (१/१/३) इत्यादि उपक्रम सूत्र नहीं है । किन्तु धर्मनिरूपण की प्रतिज्ञा और लक्षण लिखने के बाद हठात् 'पृथिव्यापस्तेजोवायुः' (१/१/५) इस सूत्र के द्वारा पदार्थों के विभाग से जो असङ्गति की आपत्ति आती है, उसका उन दोनों टीकाकारों ने अपनी अपनी टीका में जिस युक्ति से समर्थन किया है, वह युक्ति 'धर्मविशेषप्रसूतात्' इत्यादि सूत्र के द्वारा कही हुई युक्तियों से अधिक भिन्न नहीं है । इस प्रसङ्ग में दो ही बातें संभव जान पड़ती हैं-(१) जिन लोगों ने 'धर्मविशेषप्रसूतात्' इत्यादि को सूत्र नहीं माना है, उन लोगों के हाथ में जो सूत्रावली आई उसके मूल लेखक से प्रमादवश उक्त सूत्र छूट गया हो और उसके बाद से उसी सूत्रावली का प्रचार उस क्षेत्र में हो गया हो । अथवा (२) धर्मव्याख्या की प्रतिज्ञा और लक्षण कहने के बाद हठात् पदार्थ-निरूपण करने से जो असंगति आती है, उसकी पूर्ति किसी विद्वान् ने अपनी सूत्रपाठ की पुस्तक में "धर्मविशेषप्रसूतात्" इत्यादि शब्दों के द्वारा टिप्पणी रूप में कर दी हो । आगे उस पुस्तक के आधार पर लिखनेवाले किसी दूसरे लेखक ने भ्रमवश उस टिप्पणी को सूत्र समझकर पृथक् सूत्र के रूप में लिख दिया हो । भ्रम और प्रमाद इन दोनों की संभावनाओं में से प्रकृत में किस संभावना की कल्पना में लाघव और स्वारस्य है, इसे पण्डितगण विचार कर देखें । वैशेषिकदर्शन और ईश्वर सभी जानते हैं कि न्याय और वैशेषिकदर्शन के आचार्यों ने ईश्वर साधन के प्रसङ्ग में बहुत कुछ लिखा है । किन्तु वैशेषिक दर्शन के कणादरचित सूत्र में ईश्वर शब्द का स्पष्ट उल्लेख न रहन के कारण एवं स्पष्ट रूप से ईश्वर-साधन का कोई प्रकरण न रहने के कारण कुछ विद्वानों का कहना है कि कणाद के समय से लेकर प्रशस्तपाद से पहले तक वैशेषिकदर्शन में ईश्वर स्वीकृत नहीं थे । अतः मूलतः यह दर्शन ईश्वरपरक नहीं है । वैशेषिकदर्शन को ईश्वर-परक माननेवालों की दृष्टि इस प्रसङ्ग में कुछ भिन्न प्रकार की है । उनका कहना है कि किसी वस्तु का स्पष्ट उल्लेख न करना ही उस वस्तु के अभाव का साधक नहीं हो सकता, किसी वस्तु को अस्वीकृत करना है तो फिर उसके लिए उस प्रसङ्ग में केवल मौन साधन से ही काम नहीं चल सकता । उसके लिए उस वस्तु की सत्ता के विरुद्ध युक्तियों का स्पष्ट रूप से निर्देश आवश्यक है; क्योंकि किसी वस्तु की अनुक्ति ही उसकी विरुद्धोक्ति नहीं हो सकती । अनुक्ति और विरुद्धोक्ति में बहुत अन्तर है ।