भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 11

भूमिका ७ अतः प्रशस्तपाद प्रभृति आचार्यों ने एवं उनके अनुयायी उदयनादि आचार्यों ने ईश्वर साधन के प्रसङ्ग में अपनी चरम प्रतिभा का परिचय दिया है । एवं इस दर्शन में ईश्वर को सिद्ध मानकर उपपादन किया है । शङ्कर मिश्र प्रभृति सूत्र के टीकाकारों ने सूत्र के द्वारा ही ईश्वरसिद्धि का भी प्रयास किया है । उन लोगों का कहना है कि किसी विषय का स्पष्ट उल्लेख न होने पर भी उसके अन्य उपपादनों से उस विषय में उस व्यक्ति की अनुमति का पता चल जाता है । जैसे व्याकरणशास्त्र में योगविभागादि के द्वारा सूत्र में अनुद्दिष्ट विधानों का भी आपेक्ष होता है । इसी प्रकार प्रकृत में 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' (१/१/३), 'संज्ञाकर्म- त्वमस्मद्विशिष्टानां लिङ्गम्' (२/१/१८) 'प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्संज्ञाकर्मणः' (२/१/१९) इत्यादि सूत्रों के द्वारा आनुषङ्गिक रूप में ईश्वरसिद्धि का प्रयास शङ्कर मिश्र आदि टीकाकारों के द्वारा किया गया है । धर्म और वैशेषिकदर्शन वैशेषिकदर्शन का आरम्भ 'धर्मव्याख्या' की प्रतिज्ञा से हुआ है । उसके दूसरे सूत्र के द्वारा अवसरप्राप्त धर्म का लक्षण कहा गया है और तीसरे सूत्र के द्वारा धर्म के कारणीभूत यागादि के प्रतिपादक वेदों में प्रामाण्य का प्रतिपादन हुआ है । 'धर्मविशेषप्रसूतात्' इत्यादि चौथे सूत्र के द्वारा यह उपपादन किया गया है कि द्रव्यादि छः पदार्थों के साधर्म्य एवं वैधर्म्य सहित तत्त्वज्ञान के द्वारा ही निःश्रेयस का लाभ होता है । उक्त तत्त्वज्ञान निवृत्तिलक्षण विशेष प्रकार के धर्म से उत्पन्न होता है । फलतः निःश्रेयस के लिये धर्म अत्यन्त आवश्यक है, अतः उसका निरूपण भी आवश्यक है, जिसके लिए इस शास्त्र का आरम्भ उचित है । फिर इसके बाद धर्म के सम्बन्ध में विशेष चर्चा नहीं दीख पड़ती है । क्रम के अनुसार और पदार्थों की तरह धर्म का भी निरूपण किया गया है । पदार्थों के निरूपण से ग्रन्थ की समाप्ति हो जाती है । इस प्रसङ्ग में कुछ लोगों का आक्षेप है कि धर्म निरूपण के लिए प्रवृत्त शास्त्र में धर्म की इतनी सी चर्चा हो और उससे असम्बद्ध द्रव्यादि पदार्थों का इतना विस्तृत वर्णन हो, यह कुछ ठीक नहीं जँचता । इसी आक्षेप की प्रतिध्वनि 'धर्मं व्याख्यातुकामस्य षट्पदार्थोपवर्णनम् । सागरं गन्तुकामस्य हिमवद्गमनोपमम्' ।। इत्यादि वचनों से होती है । इस प्रसङ्ग में वैशेषिक सिद्धान्त के अनुयायियों का यह कहना है कि इस शास्त्र में जिस धर्म की व्याख्या की प्रतिज्ञा की गयी है वह पूर्वमीमांसा के प्रतिज्ञासूत्र में कथित धर्म से भिन्न है । मीमांसकों ने धर्म शब्द से यागादि क्रियायों को लिया है । ये क्रियायें केवल वेदों के द्वारा ही प्रमित हो सकती हैं । फलतः