भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २३९ प्रशस्तपादभाष्यम् संयोगविभागवेगाः कर्मजाः । शब्दोत्तरविभागौ विभागजौ । परत्वापरत्वद्वित्वद्विपृथक्त्वदयो बुद्धयपेक्षाः । संयोग, विभाग और वेग ये तीन गुण क्रिया से उत्पन्न होते हैं ! शब्द और उत्तर (विभागज) विभाग ये दोनों विभाग से उत्पन्न होते हैं । परत्व, अपरत्व, द्वित्व, द्विपृथक्त्व प्रभृति बुद्धिसापेक्ष हैं । न्यायकन्दली उत्तरसंयोगः संयोगजः संयोगोऽभिमतः । नैमित्तिकद्रवत्वं वह्निसंयोगजम् । परत्वापरत्वे दिक्कालपिण्डसंयोगजे । पार्थिवपरमाणुरूपरसगन्धस्पर्शा वह्निसंयोगजा इति विवेकः । संयोगविभागवेगाः कर्मजाः । आद्यौ संयोगविभागौ कर्मजौ । शब्दोत्तरविभागौ विभागजौ । आद्यः शब्दो विभागादपि जायते, उत्तरो विभागो विभागादेव जायत इति विवेकः । परत्वापरत्वद्वित्वद्विपृथक्त्वदयो बुद्धयपेक्षाः । एषामुत्पत्तौ निमित्तकारणं बुद्धिः । आदिशब्दात् त्रित्वत्रिपृथक्त्वादिपरिग्रहः । संयोग ही यहाँ 'उत्तरसंयोग' शब्द से इष्ट है । वह्नि के संयोग से नैमित्तिक द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । द्रव्यों के साथ दिशा एवं काल के संयोग से परत्व एवं अपरत्व की उत्पत्ति होती है । पार्थिव परमाणुओं के रूप, रस, गन्ध और स्पर्श ये सभी (विशेष प्रकार के) वह्निसंयोग रूप पाक से उत्पन्न होते हैं (अतः संयोगज होते हुए भी अपाकज नहीं हैं) । संयोग, विभाग और वेग ये तीनों क्रिया से उत्पन्न होते हैं । पहला संयोग और पहला विभाग ये दोनों ही क्रिया से उत्पन्न होते हैं (द्वितीय संयोग की उत्पत्ति संयोग से एवं द्वितीय विभाग की उत्पत्ति विभाग से ही होती है) । शब्द और उत्तर विभाग दोनों ही विभाग से उत्पन्न होते हैं । यह ध्यान रखना चाहिए कि (इनमें) प्रथम शब्द विभाग से भी उत्पन्न होता है, किन्तु उत्तर विभाग केवल विभाग से ही उत्पन्न होता है । परत्व, अपरत्व, द्वित्व, द्विपृथक्त्वदि 'बुद्धिसापेक्ष' हैं, अर्थात् इन सबों की उत्पत्ति में बुद्धि निमित्तकारण है ! 'आदि' पद से त्रित्व एवं त्रिपृथक्त्व प्रभृति को समझना चाहिए ।