भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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२४० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् रूपरसगन्धानुष्णस्पर्शशब्दपरिमाणैकत्वैकपृथक्त्वस्नेहाः समानजात्या- रम्भकाः । सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाह्यासमानजात्यारम्भकाः । रूप, रस, गन्ध, उष्ण से भिन्न सभी स्पर्श, शब्द, परिमाण, एकत्व, एकपृथक्त्व और स्नेह ये नौ गुण अपने-अपने समानजातीय गुणों के ही उत्पादक हैं । सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न ये पाँच गुण अपने से भिन्नजातीय वस्तुओं के उत्पादक हैं । न्यायकन्दली रूपादयः स्नेहान्ताः समानजात्यारम्भकाः । कारणरूपात् कार्यरूपं रसाद्रसो गन्धाद् गन्धः, स्पर्शात् स्पर्शः, स्नेहात् स्नेहो महत्त्वान्महत्त्वमित्यादि योज्यम् । शब्दस्तु स्वाश्रय एव शब्दान्तरारम्भकः । अत्र कारणत्वमात्रं विवक्षितम्, न त्वसमवायिकारणत्वम्, अन्यथा विजातीयानां पाकजानां निमित्तकारणस्योष्णस्पर्शव्यवच्छेदोऽसङ्गतार्थः स्यात् । नन्वेवं तर्हि कथं रूपादीनां ज्ञानकारणत्वम् ? न, तद्व्यतिरेकेण समानजातीयारम्भकत्वस्याभि- प्रेतत्वात् । सुखादयोऽसमानजात्यारम्भकाः । सुखमिच्छायाः कारणं दुःखं द्वेषस्य इच्छाद्वेषौ प्रयत्नस्य सोऽपि कर्मणः । पुत्रसुखं पितरि सुखं जनयति, रूप से लेकर स्नेहपर्यन्त नौ गुण समानजातीय गुणों के उत्पादक हैं । कारणों में रहनेवाले रूप से कार्य में रूप की उत्पत्ति होती है । कारण में रहनेवाले रस से कार्य में रस की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले गन्ध से कार्य में गन्ध की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले स्पर्श से कार्य में स्पर्श की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले स्नेह से कार्य में स्नेह की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले महत्परिमाण से कार्य में महत्परिमाण की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार के वाक्यों की कल्पना करनी चाहिए । शब्द अपने आश्रय में ही दूसरे शब्द को उत्पन्न करता है । यहाँ 'आरम्भकत्व' शब्द से सामान्यतः कारणत्व ही विवक्षित है, (प्रकरणप्राप्त) असमवायिकारणत्व नहीं; क्योंकि ऐसा न मानने पर उष्ण स्पर्श को प्रकृत लक्ष्यबोधक वाक्य में छोड़ देना असङ्गत होगा, चूँकि उष्ण स्पर्श भी अपने विजातीय पाकजरूपादि गुणों का निमित्तकारण तो है ही । (उष्ण स्पर्श भी अपने सजातीय उष्ण स्पर्श का असमवायिकारण है) । (प्र.) फिर रूपादि अपने ज्ञान के प्रति कैसे कारण होते हैं ? (उ.) प्रकृत में समानजातीय गुणों में ज्ञान से भिन्न गुणों की ही गणना करनी चाहिए । अतः ज्ञान से भिन्न अपने सजातीय गुणों की उत्पादकता ही प्रकृत में विवक्षित है ।

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