भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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भूमिका २१ इस न्याय में पर्यवसित हुई है । जब तक सूत लाल न हों तब तक कपड़े लाल नहीं होते । श्याम कपालों से श्याम घट ही उत्पन्न होते हैं; किन्तु श्याम कपाल से उत्पन्न श्याम घट ही आग में पकने पर लाल हो जाता है । अतः प्रत्यक्ष दृष्ट रक्त घट की उत्पत्ति उक्त न्याय से रक्त कपालों से ही माननी पड़ेगी । फलतः कपालों का रक्त रूप ही घट में दीखनेवाले रक्त रूप का असमवायिकारण है । रक्त रूप की उत्पत्ति की यह प्रणाली घट के उत्पादक त्र्यसरेणु तक अबाधित गति से चलेगी । उक्त रीति के अनुसार घट के उत्पादक द्व्यणुक में रहनेवाले रक्त रूप की उत्पत्ति द्व्यणुक के उत्पादक दोनों परमाणुओं में रहनेवाले रक्त रूप से होगी; किन्तु प्रश्न यह है कि उन परमाणुओं में रक्त रूप आया कहाँ से ? क्योंकि श्याम घट के उत्पादक परमाणु ही इस रक्त घट के भी उत्पादक हैं । उन परमाणुओं में श्याम रूप का अनुमान घट की श्यामता से निराबाध है । अतः यही एक कल्पना . अवशिष्ट रह जाती है कि अग्नि के विशेष प्रकार के संयोग (पाक) से उन परमाणुओं की श्यामता नष्ट हो जाती है और उनमें रक्त रूप की उत्पत्ति होती है; किन्तु घट के बन जाने पर घट के उत्पादक परमाणुओं की स्वतन्त्र सत्ता है कहाँ ? वे तो अपने कार्य द्व्यणुकों को अपने में समेट कर अपनी स्वतन्त्रता खो चुके हैं । अतः द्व्यणुकों में समवेतत्व सम्बन्ध से विद्यमान परमाणुओं में रहनेवाले श्याम रूप का नाश पाक से नहीं हो सकता । अतः उन परमाणुओं में रक्त रूप की उत्पत्ति की सम्भावना ही नहीं है । अतः यह कल्पना करनी पड़ती है कि जिन अवयवियों की परम्परा से श्याम घट का निर्माण हुआ था, द्व्यणुकपर्यन्त के वे सभी अवयवी अग्नि के संयोग से विनष्ट हो जाते हैं । नित्य होने के कारण परमाणु विनष्ट नहीं होते । इस प्रकार उक्त श्याम घट के आरम्भक सभी परमाणुओं के अलग हो जाने पर उनमें से प्रत्येक परमाणु में पाक से श्याम रूप का नाश हो जाता है और पाक से ही उनमें रक्त रूप की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार पहले के रस, गन्ध और स्पर्श भी नष्ट हो जाते हैं और उनमें दूसरे रसादि की उत्पत्ति होती है । इन दूसरे रूप, रस, गन्ध और स्पर्श से युक्त परमाणुओं के द्वारा पुनः द्व्यणुकादि के क्रम से दूसरे पक्व घट की उत्पत्ति होती है । उसमें कथित कारणगुण क्रम से ही रक्तरूपादि की उत्पत्ति होती है । इस पके हुए घट में 'यही वह घट है जिसे पकने के लिए दिया गया था' इस प्रकार की जो प्रत्यभिज्ञा होती है, उसका कारण पके हुए और बिना पके हुए दोनों घटों का ऐक्य नहीं है । ऐक्य न रहने पर भी सादृश्य के कारण प्रत्यभिज्ञा होती है । जैसे कि 'सेयं दीपज्वाला' इत्यादि स्थलों में होती है । वैशेषिकों का यह सिद्धान्त 'पिलुपाकवाद' के नाम से प्रख्यात हैं । 'पिलु' परमाणुओं का ही दूसरा नाम है । किन्तु नैयायिक लोग इस बात को नहीं मानते । उन लोगों का कहना है कि पका हुआ घट और बिना पका हुआ घट-दोनों एक ही हैं । इस ऐक्य से ही