भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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२२ प्रशस्तपादभाष्यम् 'सोऽयं घटः' इत्यादि प्रत्यभिज्ञायें होती हैं । सम्भव होने पर किसी प्रतीति का गौणार्थक मानना उचित नहीं है । अतः उक्त प्रत्यभिज्ञा वस्तुतः ऐक्यमूलक ही है, सादृश्यमूलक नहीं । तदनुसार सम्पूर्ण घट रूप अवयवी में ही पाक होता है, भट्टी में डाले गये घट का छिद्र से देखने पर प्रत्यक्ष भी होता है । अतः उक्त स्थल में घट का विनाश मानना प्रत्यक्षविरुद्ध भी है । उक्त प्रत्यभिज्ञा से विरुद्ध होने के कारण 'कारणगुणाः कार्यगुणानारभन्ते' इस नियम को पाकज रूपादि से अतिरिक्त विषय के लिए सङ्कुचित करना पड़ेगा । प्रत्येक अवयवी अनन्त छिद्रों से युक्त है, अतः उन छिद्रों के द्वारा अतितीक्ष्ण तेज भीतर प्रविष्ट होकर अवयवी को बाहर और भीतर पका देता है । अतः अनुभव से विरुद्ध कच्चे घट का विनाश और पके घट की उत्पत्ति मानने की कोई आवश्यकता नहीं है । संख्या 'यह एक है, ये दो हैं, ये तीन हैं' इत्यादि व्यवहार जिस गुण से उत्पन्न हों, वही 'संख्या' है । यह एकत्व और द्वित्वादि से लेकर परार्द्धपर्यन्त अनन्त प्रकार की है । इनमें एकत्व संख्या की नित्यता और अनित्यता उसके आश्रय की नित्यता और अनित्यता के अनुसार होती है, घट अनित्य है, अतः उसमें रहनेवाली एकत्व संख्या भी अनित्य है, आकाश नित्य है, अतः उसमें रहनेवाली एकत्व संख्या भी नित्य है; किन्तु द्वित्वादि सभी संख्यायें अनित्य ही हैं, चाहे उनके आश्रय नित्य हों या अनित्य; क्योंकि इन संख्याओं के व्यवहार करनेवाले पुरुषों की बुद्धि से इसकी उत्पत्ति होती है । जिस घट में पट को साथ लेकर कोई पुरुष द्वित्व का व्यवहार करता है, उसी घट में पट और दण्ड को साथ लेकर कोई तीसरा पुरुष त्रित्व का व्यवहार भी करता है । द्वित्व को दृष्टान्त रूप में लेकर समझने में सरलता होगी । जब किसी पुरुष को दो घटों में से प्रत्येक में 'यह एक है, यह एक है' इस प्रकार की बुद्धि उत्पन्न होती है, तभी दो एकत्वों की उक्त बुद्धि से उक्त दोनों घटों में द्वित्व संख्या की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार अनेक एकत्व-विषयक बुद्धि की 'अपेक्षा' द्वित्व की उत्पत्ति में है, अतः उक्त बुद्धि को 'अपेक्षाबुद्धि' कहते हैं । सभी बुद्धियाँ क्षणिक हैं, अतः अपेक्षाबुद्धि क्षणिक ही है । अतः उनसे उत्पन्न होनेवाली द्वित्वादि सभी संख्यायें अनित्य हैं । पहले कह चुके हैं कि एक क्षण में उत्पत्ति, द्वितीय क्षण में स्थिति और तृतीय क्षण में जिस वस्तु का नाश हो, उसे ही वैशेषिक लोग 'क्षणिक' कहते हैं; किन्तु अपेक्षाबुद्धि का क्षणिकत्व उक्त क्षणिकत्व से थोड़ा-सा भिन्न है । अपेक्षाबुद्धि की एक क्षण में उत्पत्ति, उसके बाद दो क्षणों तक उसकी स्थिति और चौथे क्षण में विनाश मानना होगा, अतः अपेक्षाबुद्धि का क्षणिकत्व चतुर्थ क्षण में नष्ट होना