वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३० प्रशस्तपादभाष्यम् के संसर्ग, ये तीन प्रकार के हैं । 'विषय' का एक चौथा प्रकार भी है जो निर्विकल्पक ज्ञान में भासित होता है । 'घटवद्भूतलम्' इस ज्ञान में मुख्यतः घट विशेषण है और भूतल विशेष्य है एवं संसर्ग वह संयोग है, जिसके कारण भूतल में घट का रहना सम्भव होता है । वैसे तो इसी ज्ञान में घट में घटत्व भी भासित होता है । अतः घटत्व भी विशेषण है और घट भी विशेष्य है एवं इन दोनों का समवाय भी संसर्ग है । इसी प्रकार भूतल में भूतलत्व और संयोग में संयोगत्व के भान होने के कारण भूतलत्व संयोगत्वादि और भी विशेषण हैं एवं घट, भूतलादि और भी विशेष्य हैं । किन्तु ये गौण हैं । विशेषण को ही 'प्रकार' कहते हैं । ज्ञान के इन विषयों में ज्ञानीय 'विषयता' नाम का एक धर्म है, जो विषयों के प्रकारविशेष्यादि के विभेदों के कारण (१) प्रकारता, (२) विशेष्यता और (३) संसर्गता भेद से तीन प्रकार का है । निर्विकल्पक ज्ञान के चौथे प्रकार के विषयों में रहनेवाली इन तीनों विषयताओं से भिन्न एक चौथी विषयता भी है । उक्त प्रकारता ही उस स्थिति में प्रायशः विधेयता कहलाती है, जिसमें कि उसका आश्रय पहले ज्ञात न हो । विशेष्यता ही स्थिति विशेष में उद्देश्यता कहलाती है । ऊपर जिस संसर्ग की चर्चा की गयी है वह विभिन्न दो व्यक्तियों में क्रमशः विशेष्यविशेषणभाव का सम्पादक वस्तु विशेष रूप है, 'दण्डी पुरुषः' इत्यादि स्थलों में चूँकि दण्ड का संयोग संसर्ग या सम्बन्ध पुरुष में है, इसीलिए दण्ड विशेषण है और पुरुष विशेष्य है । सम्बन्ध (१) साक्षात् और (२) परम्परा भेद से दो प्रकार का है । साक्षात् सम्बन्ध संयोग समवाय स्वरूपादि भेद से अनेक प्रकार के हैं । जिस सम्बन्ध के निर्माण में दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता हो, उसे परम्परा सम्बन्ध कहते हैं । यह अनन्त प्रकार का हो सकता है । इसकी कोई संख्या निर्णित नहीं हो सकती । यह सम्बन्ध ऐसे दो वस्तुओं का भी हो सकता है, जिन्हें साधारण सम्बन्ध से कभी परस्पर सम्बद्ध होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती । (१) वृत्तिनियामक और (२) वृत्तिता का अनियामक भेद से सम्बन्ध दो प्रकार का है । जिस सम्बन्ध से आधार-आधेयभाव की प्रतीति हो, उसे 'वृत्तिता का नियामक' सम्बन्ध कहते हैं । ये संयोग समवायादि नियमित प्रकार के ही हैं । जिससे दो सम्बन्धियों में केवल सम्बद्ध मात्र होने की प्रतीति हो, उसे वृत्तिता का अनियामक सम्बन्ध कहते हैं । जिस ज्ञान के विशेष्य में विशेषण की सत्ता वस्तुतः रहे, उसी ज्ञान को 'प्रमा' कहते हैं । यथार्थ चाँदी में जो 'इदं रजतम्' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है, वह 'प्रमा' ज्ञान है; क्योंकि ज्ञान का विशेष्य या उद्देश्य है चाँदी (रजत), उसमें रजतत्व रूप विशेषण की या प्रकार की वस्तुतः सत्ता है, अतः उक्त ज्ञान 'प्रमा' है । किस वस्तु में किस वस्तु की यथार्थ सत्ता है ? इस प्रश्न का यह समाधान है कि