भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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भूमिका ३१ जिस विशेष्य में विशेषण के सम्बन्ध की सत्ता रहे, उसी विशेष्य में विशेषण की यथार्थ सत्ता है । प्रकृत उदाहरण के रजत रूप विशेष्य में रजतत्व जाति का समवाय सम्बन्ध है, अतः रजतत्व की सत्ता रजत में है । शुक्तिका में जो 'इदं रजतम्' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है, वह 'प्रमा' इसलिए नहीं है कि इस ज्ञान के विशेष्य शुक्तिका में रजतत्व का समवाय नहीं है । अतः शुक्तिका में रजतत्व का ज्ञान प्रमा न होकर 'अप्रमा' है । फलतः प्रमा के विपरीत अर्थात् जिस ज्ञान के विशेष्य में विशेषण की सत्ता न रहे, उस ज्ञान को ही 'अप्रमा' या अविद्या या भ्रम कहते हैं । अयथार्थ ज्ञान के भेदादि इस ग्रन्थ में विस्तृत रूप से वर्णित हैं । कथित प्रमाज्ञान या यथार्थज्ञान के दो भेद हैं-(१) प्रत्यक्ष और (२) अनुमिति । शब्दादिजन्य जितने भी प्रमाज्ञान हैं वे सभी प्रायः अनुमिति में ही अन्तर्भूत हैं । फलतः प्रमाकरण भी, अर्थात् प्रमाण भी (१) प्रत्यक्ष और (३) अनुमान भेद से दो ही प्रकार के हैं । शब्दादि जितने भी प्रकार के प्रमाज्ञान हैं, वे सभी इन्हीं दोनों में से किसी करण से उत्पन्न होते हैं । प्रत्यक्ष शब्द 'प्रति' शब्द और 'अक्ष' शब्द से 'प्रतिगतम् अक्षि' या अक्ष्यक्षि प्रति वर्त्ततं इन दोनों व्युत्पत्तियों के द्वारा निष्पन्न होता है । प्रकृत में अर्थ के साथ सम्बद्ध इन्द्रिय ही प्रत्यक्ष शब्द से अभीष्ट है । अर्थात् विषय के साथ सम्बद्ध इन्द्रिय ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । इस प्रमाण के द्वारा उत्पन्न यथार्थ ज्ञान ही 'प्रत्यक्ष' रूप प्रमिति है । फलतः इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से जो यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो, वह है प्रत्यक्ष-प्रमिति और इस प्रमिति का कारण ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । प्रत्यक्ष के प्रसङ्ग में और विशद विवेचन इस ग्रन्थ में देखना चाहिए । 'अनु'पूर्वक 'मा' धातु से अनुमान शब्द बना है । 'अनु' शब्द का अर्थ है पश्चात् । 'पश्चात्' शब्द अपने अर्थबोध के लिए किसी और अवधि की आकांक्षा रखता है । प्रकृत में वह अवधि है 'लिङ्गपरामर्श', अर्थात् लिङ्गपरामर्श के पश्चात् ही जो ज्ञान उत्पन्न हो उसे 'अनुमिति' कहते हैं । इसी दृष्टि से 'परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः' इस प्रकार के अनुमिति के लक्षण मिलते हैं । व्याप्तिज्ञान और पक्षधर्मताज्ञान इन दोनों से परामर्श उत्पन्न होता है । हेतु के आश्रय में साध्य नियमित रूप से रहना ही व्याप्ति है । पक्ष में हेतु का रहना ही पक्षधर्मता है । 'साध्यव्याप्यो हेतुः' यही व्याप्तिज्ञान का आकार है और 'हेतुमान् पक्षः' यह पक्षधर्मताज्ञान का आकार है । अतः मिलकर इन दोनों से उत्पन्न परामर्श का स्वभावतः 'साध्यव्याप्यहेतुमान् पक्षः' यह आकार होता है । इस परामर्श को ही 'तृतीयलिङ्गपरमर्श' भी कहते हैं । इस दृष्टि से पक्षधर्मता-ज्ञान हेतु का प्रथम ज्ञान है और व्याप्तिविशिष्टहेतु का ज्ञान हेतु का दूसरा ज्ञान है, व्याप्ति और पक्षधर्मता