भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१३ प्रशस्तपादभाष्यम् परत्वमपरत्वं च परापराभिधानप्रत्ययनिमित्तम् । तत्तु द्विविधं दिक्कृतं कालकृतं च । तत्र दिक्कृतं दिग्विशेषप्रत्ययकम् । 'यह इससे पर (दूर अथवा ज्येष्ठ) है', 'यह इससे अपर (समीप अथवा कनिष्ठ) है' इन शब्दों के प्रयोगों और इन आकार के ज्ञानों का (असाधारण) कारण ही (क्रमशः) परत्व और अपरत्व है । १. दिक्कृत (दिशामूलक) और २. कालकृत (कालमूल) भेद से वे दोनों ही दो-दो प्रकार के हैं । इनमें दिक्कृत (परत्व और अपरत्व) दिशाओं की न्यायकन्दली वीरणविभागाच्च तन्तुवीरणसंयोगस्याकाशवीरणसंयोगस्य च विनाशः, ततोऽशुसंयोग- विनाशात् तन्तुविनाशो वीरणस्य चोत्तरसंयोगोऽत उत्तरसंयोगाश्रयविनाशाभ्यां तन्तु- वीरणविभागस्य विनाश इति प्रक्रिया । परत्वमपरत्वं च परापराभिधानप्रत्ययनिमित्तमिति । परमित्यभिधानस्य प्रत्ययस्य च निमित्तं परत्वम् । अपरमित्यभिधानप्रत्यययोर्निमित्तमपरत्वमिति कार्येण सत्तां प्रतिपादयति । यद्यप्याकाशं कण्ठाद्याकाशसंयोगादिकं च परापराभिधानयोः कारणं भवति, यद्यप्यात्ममनःसंयोगादिकं च परापरप्रतीतिकारणं स्यात्, तथापि निमित्तान्तरसिद्धिः, विशिष्टप्रत्ययस्य कारणविशेष- इसके बाद दोनों अंशुओं के विभाग से दोनों अंशुओं के (तन्तु के उत्पादक) संयोग का विनाश होता है । एवं वीरण के विभाग से तन्तु और वीरण के संयोग का एवं आकाश और वीरण के संयोग का भी विनाश होता है । इसके बाद दोनों अंशुओं के संयोग के विनाश से तन्तु का विनाश होता है एवं वीरण और उत्तरदेश, इन दोनों के संयोग की उत्पत्ति होती है । अतः उत्तरदेशसंयोग और आश्रय के विनाश इन दोनों से तन्तु और वीरण के विभाग का विनाश होता है । 'परत्वमपरत्वञ्च परापराभिधानप्रत्ययनिमित्तम्' इस सन्दर्भ के द्वारा यह उपपादन किया गया है कि 'यह इससे पर है' इत्यादि आकार के ज्ञान और शब्द .के प्रयोग इन दोनों का कारणीभूत गुण ही 'परत्व' है एवं 'यह इससे अपर है' इस आकार के ज्ञान और शब्द के प्रयोग, इन दोनों का कारणीभूत गुण ही 'अपरत्व' है । इस प्रकार कार्य से कारण के प्रतिपादन की रीति से परत्व और अपरत्व की सत्ता दिखलायी गयी है । यद्यपि 'यह पर है' एवं 'यह अपर है' इत्यादि शब्दों के प्रयोगों के आकाश, कण्ठ एवं आकाश के संयोगादि भी कारण हैं एवं उक्त आकार की प्रतीतियों के आत्मा एवं मन के संयोगादि भी कारण हैं, फिर भी (ये सब सामान्य कारण हैं, उन विशिष्ट