वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०९ प्रशस्तपादभाष्यम् बुद्धितोऽपेक्षाबुद्धिविनाशः, विभागाच्च दिक्पिण्डसंयोगविनाश इत्येकः कालः । ततः संयोगविनाशात् परत्वस्य विनाशः। त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां युगपद्विनाशादपि कथम् ? यदापेक्षाबुद्धिरुत्पद्यते, तदा पिण्डावयवे कर्म, ततो यस्मिन्नेव काले कर्मणाऽवयवान्तराद्विभागः क्रियतेऽपेक्षाबुद्धेः परत्वस्य चोत्पत्तिस्तस्मिन्नेव काले पिण्डेऽपि कर्म, ततोऽवयवविभागात् पिण्डारम्भकसंयोग- (७) (प्र.) समवायिकारण (परत्वादि के आधारभूत द्रव्य) असमवायि- कारण (दिक्प्रदेशसंयोग) और निमित्तकारण (अपेक्षाबुद्धि) इन तीनों के नाश से परत्वादि गुणों का नाश (कहाँ और) किस स्थिति में होता है ? (उ.) जहाँ जिस समय अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति होती है, उसी समय (परत्वादि के समवायिकारण) पिण्ड के अवयव में क्रिया उत्पन्न होती है । इसके बाद जिस समय उक्त क्रिया से (एक अवयव का) दूसरे अवयव से विभाग उत्पन्न होता है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि और परत्वादि गुण इन दोनों की उत्पत्ति होती है । एवं पिण्ड (अवयवि) में भी क्रिया उसी समय उत्पन्न होती है । इसके बाद अवयवों के उक्त विभाग से पिण्ड के न्यायकन्दली समवायि चासमवायि च निमित्तं च समवाय्यसमवायिनिमित्तानि, तानि च कारणानि चेति समवाय्यसमवायि निमित्तकारणानि द्रव्यसंयोगापेक्षाज्ञानानि, तेषां त्रयाणां युगपद्विनाशात् कथं परत्वस्य विनाश इति प्रश्ने कृते प्रत्युत्तरमाह - यदेति । इत्येतत् सर्वं युगपद्भवति कारण- यौगपद्यात्, ततश्च त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां विनाशात् परत्वस्य विनाश इति । परत्वस्य विनाश इत्युपलक्षणमिदम् । अपरत्वस्याप्ययमेव विनाशक्रमो दर्शयितव्यः । संयोग रूप असमवायिकरण, एवं अपेक्षाबुद्धिरूप निमित्तकारण, इन तीनों कारणों के एक ही समय विनाश के कारण परत्व का विनाश किस प्रकार होता है ? इसी प्रश्न के उत्तर में 'यदा' इत्यादि भाष्य सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् जब एक ही समय उक्त तीनों कारणों के विनाश कारणसमूह एकत्र हो जाते हैं, तो फिर तीनों का एक ही समय विनाश हो जाता है । इसके बाद परत्व के तीनों कारणों के विनाश से परत्व का विनाश हो जाता है । इस प्रकरण में 'परत्वविनाश' शब्द उपलक्षणमात्र है (नियामक नहीं), अतः इसी से अपरत्व नाश का भी यही क्रम जानना चाहिए ।