भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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४१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे बुद्धि- प्रशस्तपादभाष्यम् विनाशः पिण्डकर्मणा च दिक्पिण्डविभागः क्रियते, सामान्यबुद्धेश्चोत्पत्ति- रित्येकः कालः । ततः संयोगविनाशात् पिण्डविनाशः, विभागाच्च दिक्पिण्ड- संयोगविनाशः, सामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनाश इत्येतत् सर्वं युगपत् त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां विनाशात् परत्वस्य विनाश इति ॥ बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानं प्रत्यय इति पर्यायाः । सा चानेकप्रकारा, अर्थानन्त्यात् प्रत्यर्थनियतत्वाच्च । उत्पादक संयोग का विनाश, और अवयवी (पिण्ड) की क्रिया, उसका पूर्वदिक्प्रदेश के साथ विभाग और सामान्य विषयक बुद्धि की उत्पत्ति, इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद उक्त संयोग के विनाश से पिण्ड का विनाश एवं पूर्वदिशा और पिण्ड के विभाग से इन दोनों के संयोग का नाश, एवं सामान्य ज्ञान से अपेक्षाबुद्धि का नाश होता है । इस प्रकार एक ही समय समवायिकारण (परत्वादि के आधारभूत पिण्डद्रव्य), असमवायिकारण (उक्त पिण्ड का पूर्वादि दिक्प्रदेशों के साथ संयोग) और निमित्तकारण (अपेक्षाबुद्धि) इन तीनों के विनाश से (भी) परत्वादि गुणों का विनाश होता है । बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान और प्रत्यय (ये सभी) शब्द अभिधावृत्ति के द्वारा एक ही अर्थ के बोधक हैं । यह अनेक (अनन्त) प्रकार की है, क्योंकि इसके विषय अनन्त हैं और यह प्रत्येक विषय में स्वतन्त्र रूप से (भी) अवश्य ही सम्बद्ध है । न्यायकन्दली बुद्धिजे परत्वापरत्वे इति समर्थिते । अथ केयं बुद्धिरित्याह-बुद्धिरित्यादि । प्रधानस्य विकारो महदाख्यमन्तःकरणं चित्तपर्यायबुद्धिः । बुद्धी- यह समर्थन कर चुके हैं कि परत्व और अपरत्व दोनों ही बुद्धि से उत्पन्न होते हैं । किन्तु 'यह बुद्धि कौन-सी वस्तु है ?' (इस स्वाभाविक प्रश्न का उत्तर) 'बुद्धिः' इत्यादि पङ्क्ति से देते हैं । सांख्याचार्यों का कहना है कि प्रकृति (प्रधान) का महत् नाम का विकाररूप अन्तःकरण ही 'बुद्धि' है, जिसे 'चित्त' भी कहते हैं। इस बुद्धि की वह विषयाकार की