वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ प्रशस्तपादभाष्यम् युक्त नहीं है । अतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त न होने के कारण यह सिद्धि अनुमिति की प्रतिबन्धक कोई दूसरी सिद्धि है, जिसमें सिषाधयिषा का सम्बन्ध नहीं है । उसका यहाँ अभाव है, अतः पक्षतारूप कारण के रहने से अनुमिति होगी । (३) जहाँ सिद्धि नहीं वहाँ सिषाधयिषा रहे या न रहे-दोनों ही स्थितियों में अनुमिति होगी ही; क्योंकि यहाँ कोई भी सिद्धि नहीं है, अतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि भी नहीं है । सुतरां सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि का अभाव भी अवश्य है । अतः अनुमिति होगी । विस्तृत ज्ञान के लिए अध्यापकों का साहाय्य अपेक्षित है । हेत्वाभास किसी भी विषय के तत्व को अनुमान के द्वारा समझने के लिए जिस प्रकार हेतुवों को समझना आवश्यक है, उसी प्रकार जो हेतु नहीं हैं, किन्तु हेतु की तरह दीखते हैं, उन हेत्वाभासों को भी समझना आवश्यक है । अगर ऐसा न मानें तो हेतुवों और हेत्वाभासों के सम्मिश्रण से कदाचित् अतत्व भी तत्व की तरह प्रतिभात अन्त में अभीष्ट प्रवृत्ति को विफल कर देंगे और अनभीष्ट स्थिति में भी डाल देंगे । अतः हेतुवों की तरह विशेष रूप से आचार्यों ने हेत्वाभासों का भी निरूपण किया है । 'हेत्वाभास' शब्द दो व्युत्पत्तियों से निष्पन्न होता है-(१) हेतोराभासा हेत्वाभासाः और (२) हेतुवदाभासन्ते इति हेत्वाभासाः । इनमें पहली व्युत्पत्ति के अनुसार हेत्वाभास शब्द का अर्थ होता है 'हेतु का दोष' । महर्षि गौतम ने हेत्वाभासों को (१) सव्यभिचार, (२) विरुद्ध, (३) प्रकरणसम, (४) साध्यसम और (५) कालात्ययापदिष्ट भेद से पाँच प्रकारों का माना है और सव्यभिचार हेत्वाभास को समझाने के लिए 'अनैकान्तिकः सव्यभिचारः' इस सूत्र की रचना की है । जो हेतु साध्य या साध्याभाव इन दोनों में से किसी एक के साथ नियमित रूप से सम्बद्ध न हो, वही हेतु 'अनैकान्तिक' है । अर्थात् जो हेतु साध्य और साध्याभाव दोनों के साथ रहे, केवल साध्य के ही साथ न रहे, वही हेतु 'अनैकान्तिक' है । सव्यभिचारशब्द के अर्थ की आलोचना से भी इसी अर्थ की पुष्टि होती है । 'व्यभिचारेण सहितः सव्यभिचारः' इस व्युत्पत्ति से सव्यभिचार शब्द बना है । 'व्यभिचार' शब्द 'वि' 'अभि' और 'चार' इन तीन शब्दों से बना है । इनमें 'वि' शब्द विरुद्धार्थक है और 'अभि' शब्द उभयार्थक है । 'चार' शब्द सम्बन्ध का बोधक है । इसके अनुसार परस्पर विरोधी दो वस्तुओं के साथ अर्थात् साध्य और साध्याभाव के साथ किसी आश्रय