वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ३५ में हेतु का रहना ही व्यभिचार है। यह व्यभिचार अर्थात् साध्याधिकरण और साध्याभावाधिकरण दोनों में समान रूप से रहना जिस हेतु का हो, वही 'सव्यभिचार' है। साध्य के साथ नियत सम्बन्ध ही हेतु की व्याप्ति है। इस व्याप्ति के बल से ही हेतु साध्य का ज्ञापक होता है। जो हेतु उक्त प्रकार से सव्यभिचार या अनैकान्तिक होगा वह कभी कथित रीति से व्याप्तियुक्त नहीं हो सकता। अतः व्यभिचारयुक्त हेतु 'सव्यभिचार' नाम का हेत्वाभास है, हेतु नहीं। किन्तु बाद में सूक्ष्म निरूपण से यह निष्पन्न हुआ कि व्याप्ति का उक्त स्वरूप ठीक नहीं है; किन्तु हेतु के नियत सम्बन्ध से युक्त साध्य के साथ सपक्षों में हेतु का रहना ही हेतु की व्याप्ति है। इस प्रकार व्याप्तिशरीर के दो अंश माने गये, एक तो साध्य में हेतु का नियत सम्बन्ध अर्थात् व्यापकत्व, दूसरा हेतु के व्यापकीभूत साध्य का सपक्षों में हेतु के साथ रहना अर्थात् सामानाधिकरण्य। इस स्थिति में साध्य में हेतु के व्यापकत्ववाला जो अंश है, उसका विरोध परोक्ष रूप से ही सही, कथित व्यभिचार करेगा; क्योंकि जो हेतु साध्य और साध्याभाव दोनों के साथ रहेगा, उस हेतु की व्यापकता उस साध्य में नहीं जा सकती। व्यापक होने के लिए यह आवश्यक है कि व्याप्य के अधिकरण में व्यापक का अभाव न रहे। कथित व्यभिचारी हेतु के आश्रय में तो साध्य का अभाव रहता है। अतः साध्य कभी भी व्यभिचारी हेतु का व्यापक नहीं हो सकता। इस प्रकार व्याप्ति के उक्त स्वरूप मानने के पक्ष में भी कथित व्यभिचार दोष से युक्त हेतु अवश्य ही सव्यभिचार हेत्वाभास होगा। किन्तु उक्त व्याप्तिशरीर का एक अंश और है 'व्यापकीभूत साध्य का हेतु के साथ सपक्षों में रहना'। इस अंश को विघटित करनेवाला दोष भी अगर हेतु में रहेगा तो भी वह 'व्यभिचार' दोष से ही युक्त होने के कारण 'सव्यभिचार' हेत्वाभास होगा; क्योंकि सामान्यतः व्याप्ति का विघटन ही व्यभिचार होता है। व्याप्ति के उक्त द्वितीय अंश का विघटन दो प्रकारों से सम्भव है। जिस स्थल में कोई सपक्ष या विपक्ष नहीं है, वहाँ साध्य का हेतु के साथ सपक्ष में रहना सम्भव नहीं होगा; क्योंकि वहाँ कोई सपक्ष ही नहीं है। एवं जहाँ संसार के सभी पदार्थ-पक्ष होंगे, वहाँ भी सपक्ष का मिलना सम्भव नहीं होगा। अतः ऐसे स्थलों में भी हेतु के साथ साध्य का सामानाधिकरण्य सपक्ष में सम्भव नहीं होगा। पहले का उदाहरण है 'शब्दो नित्यः शब्दत्वात्'। यहाँ शब्दत्व हेतु केवल शब्द में ही है। शब्द ही पक्ष है। पक्ष में साध्य अनिर्णीत रहता है। सपक्ष में साध्य और हेतु दोनों को पहले से निश्चित रहना चाहिए। नित्यत्व निर्णीत है आकाशादि में, वहाँ शब्दत्व हेतु नहीं है। शब्दत्व निर्णीत है शब्द में, वहाँ नित्यत्व रूप साध्य ही