वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४ प्रशस्तपादभाष्यम् श्रवणेन्द्रिय जा नहीं सकता; किन्तु उस शब्द का प्रत्यक्ष तो होता है । इसलिए यह कल्पना करनी पड़ती है कि संयोग या विभाग से जिस शब्दव्यक्ति की उत्पत्ति होती है, उसी शब्द से उसी शब्द के सदृश दूसरे शब्द की उत्पत्ति अनन्तर प्रदेश में होती है । इस प्रकार एक शब्द से दूसरे शब्द की उत्पत्ति और दूसरे शब्द से तीसरे शब्द की उत्पत्ति की धारा जल की तरङ्गों की तरह चलती है । उस धारा के अन्तर्गत जब किसी की उत्पत्ति कर्णवाले आकाश प्रदेश में होती है, तो उस शब्द का प्रत्यक्ष होता है । अतः संयोग और विभाग की तरह शब्द से भी शब्द की उत्पत्ति माननी पड़ती है । कर्म सभी प्रकार के चलने को या गतियों को 'कर्म' कहते हैं । ऊपर की तरफ उछालने की क्रिया को उत्क्षेपण एवं नीचे की तरफ गिराने की क्रिया को 'अपक्षेपण' कहते हैं । समेटने की क्रिया को 'आकुञ्चन' और सामने बाहर की तरफ फैलाने की क्रिया को प्रसारण कहते हैं । शेष सभी क्रियाओं का 'गमन' कहते हैं । क्रियाओं का ऐसा विशद एवं सूक्ष्म वर्णन और किसी दर्शन में नहीं है । उसे इस मूल ग्रन्थ में देखा जा सकता है । सामान्य सभी व्यक्तियों के कुछ असाधारण धर्म होते हैं, जो उसी व्यक्ति में रहते हैं । इसके द्वारा ही जगत् की और सभी वस्तुओं से उस व्यक्ति को अलग रूप में समझा जाता है । इसी प्रकार कुछ ऐसे भी धर्म हैं, जिनके कारण पदार्थ व्यक्तिशः भिन्न होते हुए भी एक आकार की प्रतीति के विषय होते हैं । जैसे सभी घट- व्यक्तियाँ अलग-अलग हैं; किन्तु 'अयं घटः' इस एक ही प्रकार से सब की प्रतीति होती है । विभिन्न व्यक्तियों की इस एक आकार की प्रतीति का कोई प्रयोजक अवश्य है । उस प्रयोजक को ही 'सामान्य' कहते हैं । अतः जो समान आकृत्यादिवाले विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति का कारण हो वही 'सामान्य' है । इसे जाति भी कहते हैं । बौद्धों का इस प्रसङ्ग में कहना है कि कोई भी व्यक्ति केवल अपने से भिन्न और सभी व्यक्तियों से विभिन्न रूप में ही प्रतीत होता है । अतः घटव्यक्ति में घटों से भिन्न पटादि सभी व्यक्तियों का जो भेद है, वही विभिन्न घटों में "यह घट है" इस प्रकार की प्रतीति से भासित होता है; क्योंकि सभी घटों में घट से भिन्न और सभी पदार्थों का भेद समान रूप से विद्यमान है । इस समानविषयक प्रतीति का सम्पादक है यह तद्भिन्नभिन्नत्व या अपोह, इससे ही उक्त विभिन्न व्यक्तियों में समान