वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ४३ स्नेह जो केवल जल का ही विशेषगुण हो उसे 'स्नेह' कहते हैं । स्नेह के ही कारण आटा प्रभृति पिसे हुए द्रव्यों की गोल आकृति बन सकती है । घृतादि जिन पार्थिव द्रव्यों से उक्त आकृतियाँ बनती हैं, वहाँ भी घृतादि में जल सम्बन्ध के कारण ही वैसा होता है । संस्कार 'संस्कार' नाम का भी एक गुण है, जिसके (१) वेग, (२) भावना और (३) स्थितिस्थापक ये तीन भेद हैं । (१) वेग नामक संस्कार क्रिया से उत्पन्न होता है और पृथिवी, जल, तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों में रहता है । (२) 'भावना' नाम का संस्कार आत्मा में रहता है । इसी के बल से स्वयं तीसरे क्षण में ही विनष्ट हो जाने पर भी पूर्वानुभव स्मृति को उत्पन्न करता है । (३) स्थिति- स्थापक संस्कार के कारण ही बाँस प्रभृति द्रव्यों के अग्रभाग को बलात् नीचे से ले आकर छोड़ देने बाद वे फिर अपनी पहले की स्थिति में आ जाते हैं । धर्म जीव के उस गुण को धर्म कहते हैं, जिससे उसे सुख मिलता है, इसी का दूसरा नाम पुण्य है । 'किन क्रियाओं से धर्म की उत्पत्ति होती है ?' इसको श्रुति, स्मृति ही समझा सकते हैं । तदनुसार श्रुत्यादि प्रमाणों के द्वारा निर्दिष्ट क्रियाओं से उत्पन्न गुण ही 'धर्म' है, इस प्रकार 'विहितकर्मजन्यो धर्मः' धर्म का यह लक्षण किया जाता है । अधर्म अधर्म भी जीव का ही विशेष प्रकार का गुण है । जिससे जीवों को दुःख मिलता है । शास्त्रों में निषिद्ध जीवहत्यादि क्रियाओं से इसकी उत्पत्ति होती है । शब्द श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होनेवाले गुण को ही शब्द कहते हैं । यह संयोग, विभाग और शब्द से उत्पन्न होता है । दण्ड और भेरी के संयोग से शब्द की उत्पत्ति होती है एवं बाँस प्रभृति के विभाग से भी शब्द की उत्पत्ति होती है; किन्तु संयोग और विभाग से उत्पन्न शब्दव्यक्ति का श्रवण सम्भव नहीं है; क्योंकि प्रत्यक्ष के लिए विषय के साथ इन्द्रिय का सम्बन्ध आवश्यक है । शब्द रूप विषय का ग्राहक श्रवणेन्द्रिय है । यह आकाश रूप है । आकाश अमूर्त होने के कारण कहीं जा नहीं सकता । अतः शब्द की उत्पत्ति जिस देशावच्छिन्न आकाश में होती है, वहाँ