भारतकोश
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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

भूमिका ४३ स्नेह जो केवल जल का ही विशेषगुण हो उसे 'स्नेह' कहते हैं । स्नेह के ही कारण आटा प्रभृति पिसे हुए द्रव्यों की गोल आकृति बन सकती है । घृतादि जिन पार्थिव द्रव्यों से उक्त आकृतियाँ बनती हैं, वहाँ भी घृतादि में जल सम्बन्ध के कारण ही वैसा होता है । संस्कार 'संस्कार' नाम का भी एक गुण है, जिसके (१) वेग, (२) भावना और (३) स्थितिस्थापक ये तीन भेद हैं । (१) वेग नामक संस्कार क्रिया से उत्पन्न होता है और पृथिवी, जल, तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों में रहता है । (२) 'भावना' नाम का संस्कार आत्मा में रहता है । इसी के बल से स्वयं तीसरे क्षण में ही विनष्ट हो जाने पर भी पूर्वानुभव स्मृति को उत्पन्न करता है । (३) स्थिति- स्थापक संस्कार के कारण ही बाँस प्रभृति द्रव्यों के अग्रभाग को बलात् नीचे से ले आकर छोड़ देने बाद वे फिर अपनी पहले की स्थिति में आ जाते हैं । धर्म जीव के उस गुण को धर्म कहते हैं, जिससे उसे सुख मिलता है, इसी का दूसरा नाम पुण्य है । 'किन क्रियाओं से धर्म की उत्पत्ति होती है ?' इसको श्रुति, स्मृति ही समझा सकते हैं । तदनुसार श्रुत्यादि प्रमाणों के द्वारा निर्दिष्ट क्रियाओं से उत्पन्न गुण ही 'धर्म' है, इस प्रकार 'विहितकर्मजन्यो धर्मः' धर्म का यह लक्षण किया जाता है । अधर्म अधर्म भी जीव का ही विशेष प्रकार का गुण है । जिससे जीवों को दुःख मिलता है । शास्त्रों में निषिद्ध जीवहत्यादि क्रियाओं से इसकी उत्पत्ति होती है । शब्द श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होनेवाले गुण को ही शब्द कहते हैं । यह संयोग, विभाग और शब्द से उत्पन्न होता है । दण्ड और भेरी के संयोग से शब्द की उत्पत्ति होती है एवं बाँस प्रभृति के विभाग से भी शब्द की उत्पत्ति होती है; किन्तु संयोग और विभाग से उत्पन्न शब्दव्यक्ति का श्रवण सम्भव नहीं है; क्योंकि प्रत्यक्ष के लिए विषय के साथ इन्द्रिय का सम्बन्ध आवश्यक है । शब्द रूप विषय का ग्राहक श्रवणेन्द्रिय है । यह आकाश रूप है । आकाश अमूर्त होने के कारण कहीं जा नहीं सकता । अतः शब्द की उत्पत्ति जिस देशावच्छिन्न आकाश में होती है, वहाँ

४४ प्रशस्तपादभाष्यम् श्रवणेन्द्रिय जा नहीं सकता; किन्तु उस शब्द का प्रत्यक्ष तो होता है । इसलिए यह कल्पना करनी पड़ती है कि संयोग या विभाग से जिस शब्दव्यक्ति की उत्पत्ति होती है, उसी शब्द से उसी शब्द के सदृश दूसरे शब्द की उत्पत्ति अनन्तर प्रदेश में होती है । इस प्रकार एक शब्द से दूसरे शब्द की उत्पत्ति और दूसरे शब्द से तीसरे शब्द की उत्पत्ति की धारा जल की तरङ्गों की तरह चलती है । उस धारा के अन्तर्गत जब किसी की उत्पत्ति कर्णवाले आकाश प्रदेश में होती है, तो उस शब्द का प्रत्यक्ष होता है । अतः संयोग और विभाग की तरह शब्द से भी शब्द की उत्पत्ति माननी पड़ती है । कर्म सभी प्रकार के चलने को या गतियों को 'कर्म' कहते हैं । ऊपर की तरफ उछालने की क्रिया को उत्क्षेपण एवं नीचे की तरफ गिराने की क्रिया को 'अपक्षेपण' कहते हैं । समेटने की क्रिया को 'आकुञ्चन' और सामने बाहर की तरफ फैलाने की क्रिया को प्रसारण कहते हैं । शेष सभी क्रियाओं का 'गमन' कहते हैं । क्रियाओं का ऐसा विशद एवं सूक्ष्म वर्णन और किसी दर्शन में नहीं है । उसे इस मूल ग्रन्थ में देखा जा सकता है । सामान्य सभी व्यक्तियों के कुछ असाधारण धर्म होते हैं, जो उसी व्यक्ति में रहते हैं । इसके द्वारा ही जगत् की और सभी वस्तुओं से उस व्यक्ति को अलग रूप में समझा जाता है । इसी प्रकार कुछ ऐसे भी धर्म हैं, जिनके कारण पदार्थ व्यक्तिशः भिन्न होते हुए भी एक आकार की प्रतीति के विषय होते हैं । जैसे सभी घट- व्यक्तियाँ अलग-अलग हैं; किन्तु 'अयं घटः' इस एक ही प्रकार से सब की प्रतीति होती है । विभिन्न व्यक्तियों की इस एक आकार की प्रतीति का कोई प्रयोजक अवश्य है । उस प्रयोजक को ही 'सामान्य' कहते हैं । अतः जो समान आकृत्यादिवाले विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति का कारण हो वही 'सामान्य' है । इसे जाति भी कहते हैं । बौद्धों का इस प्रसङ्ग में कहना है कि कोई भी व्यक्ति केवल अपने से भिन्न और सभी व्यक्तियों से विभिन्न रूप में ही प्रतीत होता है । अतः घटव्यक्ति में घटों से भिन्न पटादि सभी व्यक्तियों का जो भेद है, वही विभिन्न घटों में "यह घट है" इस प्रकार की प्रतीति से भासित होता है; क्योंकि सभी घटों में घट से भिन्न और सभी पदार्थों का भेद समान रूप से विद्यमान है । इस समानविषयक प्रतीति का सम्पादक है यह तद्भिन्नभिन्नत्व या अपोह, इससे ही उक्त विभिन्न व्यक्तियों में समान

भूमिका ४५ आकार की प्रतीतियों का सम्पादन होता है । इसके लिए अलग जाति नाम के भाव पदार्थ की कल्पना अनावश्यक है । विशेष 'विशेष' नाम का भी एक पदार्थ वैशेषिक लोग मानते हैं । इसे केवल वैशेषिक लोग ही मानते हैं । इसको मानने में वे इस युक्ति का प्रयोग करते हैं कि जिस प्रकार घट-पटादि दृश्य पदार्थों में परस्पर भेद मानते हैं, उसी प्रकार उनके उत्पादक परमाणुओं में और आकाश-कालादि विभु पदार्थों में भी भेद मानना होगा; किन्तु घट-पटादि सावयव पदार्थों में परस्पर भेद के नियामक उनके अवयवों के भेद हैं । अर्थात् घट पट से भिन्न इसलिए हैं कि घट के उत्पादक कपाल और पट के उत्पादक तन्तु परस्पर भिन्न हैं । जिनके उत्पादक अवयव परस्पर भिन्न जाति के होते हैं, वे सभी द्रव्य भी परस्पर भिन्न जाति के ही होते हैं; किन्तु निरवयव परमाणु और आकाशादि के तो अवयव नहीं हैं । अवयवों के भेद से उनमें परस्पर भेद का नियम नहीं किया जा सकता । अतः निरवयव द्रव्यों में परस्पर भेद का नियामक कोई पदार्थ मानना पड़ेगा । इसी पदार्थ का नाम 'विशेष' है । अर्थात् जो अपने-अपने आश्रयीभूत द्रव्य को अपने से भिन्न सभी वस्तुओं से 'विशेष' रूप में या भिन्न रूप में समझावें वही 'विशेष' है । यह प्रत्येक निरवयव द्रव्य में अलग-अलग है, फलतः अनन्त है । किन्तु इस प्रसङ्ग में यह समझना शेष रहता है कि एक परमाणु में एक विशेष है, दूसरे परमाणु में दूसरा विशेष है । अतः एक परमाणु से दूसरा परमाणु भिन्न है । फलतः दोनों परमाणुओं में रहनेवाले दोनों विशेषों के परस्पर भेद ही दोनों परमाणु में परस्पर भेद के प्रयोजक हैं । किन्तु इन दोनों विशेषों में परस्पर भेद है ? इसका ही कौन नियामक है ? इस प्रसङ्ग में वैशेषिकों का कहना है कि ये विशेष 'स्वतः व्यावृत्त' हैं, इनमें परस्पर भेद के लिए किसी दूसरे नियामक की आवश्यकता नहीं है । इस 'स्वतोव्यावृत्ति' वाली दुर्बलता के कारण ही नव्यवैशेषिकों ने 'विशेष' पदार्थ को अस्वीकार कर दिया है । उन लोगों का कहना है कि अगर परमाणु प्रभृति निरवयव द्रव्यों में रहनेवाले विशेषों को स्वतः व्यावृत्त मानते हैं, तो फिर परमाणु प्रभृति सभी निरवयव द्रव्यों को ही स्वतोव्यावृत्त क्यों नहीं मान लेते ? इसमें क्या लाभ है कि निरवयव पदार्थों में परस्पर भेद के लिए उनमें स्वतोव्यावृत्त स्वभाववाले विशेषों की कल्पना की जाय ?

४६ प्रशस्तपादभाष्यम् समवाय समवाय नाम का एक षष्ठ पदार्थ भी महर्षि ने माना है । संयोग की तरह समवाय भी सम्बन्धरूप है; क्योंकि यह भी विशेष्यविशेषणभाव का नियामक है । संयोग सम्बन्ध से समवाय सम्बन्ध में यह अन्तर है कि यह अपने आधार और आधेय इन दोनों में से एक के विनष्ट होने तक बना रहता है । संयोग में यह बात नहीं है । यह अपने आधार और आधेय दोनों के बने रहने पर भी विनष्ट हो जाता है । आधार या आधेय के सत्ता-पर्यन्त समवाय का रहना ही वस्तुतः समवाय की नित्यता है । यद्यपि आकाशादि की तरह समवाय की नित्यता का भी उपपादन किया गया है । विशेष्यविशेषणभाव का नियामक ही सम्बन्ध है । 'घटवद्भूतलम्' इत्यादि स्थल में घट का संयोग भूतल में है, अतः घट विशेषण है । एवं भूतल विशेष्य इसलिए है कि भूतलानुयोगिक संयोग घट में है । इसी प्रकार महर्षि कणाद ने समवाय का लक्षण करते हुए लिखा है कि 'इहेदमिति यतः कार्यकारणयोः सम्बन्धः स समवायः' (७।२।२६) । 'इह कुण्डे दधि', 'इह कुण्डे बदराणि' इत्यादि प्रतीतियों में जिस प्रकार कुण्ड और दही एवं कुण्ड और बेर इन विशेष्य और विशेषणों को छोड़कर दोनों के संयोग सम्बन्ध भी विषय होते हैं, उसी प्रकार 'इह तन्तुषु पटः', 'इह वीरणेषु कटः', 'इह द्रव्ये द्रव्यगुणकर्माणि', 'इह गवि गोत्वम्', 'इहात्मनि ज्ञानम्', 'इहाकाशे शब्दः' इत्यादि प्रतीतियों में भी तन्तु आधारों और पट प्रभृति आधेयों से अतिरिक्त कोई सम्बन्ध अवश्य ही भासित होता है; क्योंकि कोई भी विशिष्ट- बुद्धि विशेष्य और विशेषण के सम्बन्ध के बिना उत्पन्न ही नहीं हो सकती । 'इह तन्तुषु पटः' इत्यादि प्रतीतियों का नियामक यह सम्बन्ध संयोग हो नहीं सकता; क्योंकि संयोग तो अन्यतरकर्मज होगा, अथवा उभयकर्मज होगा किं वा संयोगज होगा । प्रकृत में तन्तु प्रभृति में पट प्रभृति के सम्बन्ध की उत्पत्ति उक्त कर्मादि से नहीं होती है । दूसरी बात यह है कि जिन दो वस्तुओं का संयोग होता है, उन दोनों का विभाग भी अवश्य होता है; किन्तु तन्तु प्रभृति का घटादि के साथ कभी विभाग नहीं होता । जब तक पट की सत्ता रहेगी, तब तक वह तन्तु के साथ सम्बद्ध ही रहेगा । अतः संयोग से भिन्न समवाय नाम का भी सम्बन्धात्मक एक स्वतन्त्र पदार्थ वैशेषिक लोग मानते हैं । वैशेषिक सम्प्रदाय से भिन्न नैयायिक और मीमांसक (प्रभाकर) भी इसे मानते हैं; किन्तु इसके स्वरूप में कुछ मतभेद है । जैसे कि वैशेषिकगण इसे अतीन्द्रिय और नित्य मानते हैं; किन्तु नैयायिक इसे नित्य मानते हुए भी प्रत्यक्षवेद्य मानते हैं; प्रभाकर इसकी नित्यता को ही अस्वीकार करते हैं । वेदान्ती और सांख्यदर्शन के अनुयायी इसके कट्टर विरोधी हैं ।

भूमिका ४७ सभी सम्बन्धों के प्रतियोगी और अनुयोगी होते हैं । तदनुसार इसके भी प्रतियोगी और अनुयोगी हैं । द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इसके प्रतियोगी हैं एवं द्रव्य, गुण और कर्म ये तीन ही इसके अनुयोगी हैं । अर्थात् कथित द्रव्यादि पाँच पदार्थ ही समवाय सम्बन्ध से रहते हैं और द्रव्य, गुण और कर्म में ही रहते हैं । संयोग सम्बन्ध को दृष्टान्त मानकर इसकी सिद्धि की गयी है । संयोग अपने अनुयोगियों और प्रतियोगियों में समवाय सम्बन्ध से रहकर ही विशिष्ट बुद्धि का सम्पादन करता है । अतः समवाय को अगर विशिष्टबुद्धि के नियामक रूप से स्वीकार करते हैं, तो यह भी निर्णय करना होगा कि वह अपने प्रतियोगी और अनुयोगी में किस सम्बन्ध से रहकर उक्त विशिष्टबुद्धियों का सम्पादन करेगा ? समवायवादियों के ऊपर इसके विरोधी इसी प्रश्न के द्वारा अपना चरम प्रहार करते हैं । विरोधियों का अभिप्राय है कि अगर समवाय के रहने के लिए किसी दूसरे सम्बन्ध की कल्पना करेंगे तो फिर उस सम्बन्ध के रहने के लिए भी दूसरे सम्बन्ध की कल्पना आवश्यक होगी, जिसका पर्यवसान अनवस्था में होगा । यदि स्वरूप सम्बन्ध से उसके प्रतियोगी और अनुयोगी में समवाय की सत्ता मानेंगे, तो फिर द्रव्यादि जिन पाँच पदार्थों का समवाय सम्बन्ध मान रहे हैं, उनका स्वरूप सम्बन्ध ही क्यों नहीं मान लेते ? इस आक्षेप का उत्तर समवायवादी वैशेषिकादि इस प्रकार देते हैं कि घटादि द्रव्यों में रूपादि गुण या क्रियादि का अगर स्वरूप सम्बन्ध से ही रहना मानें, तो फिर यह निर्णय करना कठिन होगा कि ये सम्बन्ध किसके स्वरूप हैं ? क्योंकि घटादि भी अनन्त हैं और उनमें रहनेवाले गुण एवं क्रियादि भी अनन्त हैं । सम्बन्ध को अनन्त पदार्थ स्वरूप मानना सम्भव नहीं है । हम लोग अगर इसके लिए अलग समवाय नाम का सम्बन्ध मान लेते हैं, तो फिर इस प्रकार की कोई भी आपत्ति नहीं रह जाती है; क्योंकि वह अपने सभी प्रतियोगियों और अनुयोगियों में एक ही है और स्वाभिन्न स्वरूप सम्बन्ध से ही है । एवं समवाय में रहनेवाला सम्बन्ध भी चूँकि समवाय रूप ही है, अतः आगे विभिन्न सम्बन्ध की कल्पना की धारा ही रुक जाती है । अतः इस पक्ष में न अनवस्था दोष है और न कल्पना का गौरवदोष है । अतः समवाय का मानना आवश्यक है । अभाव अभाव पदार्थ को महर्षि कणाद के द्वारा उनके सूत्रों से स्वीकृत मानकर मैं उसका विवरण दे रहा हूँ । इस प्रकरण के अन्त में 'अभाव पदार्थ भी महर्षि कणाद को अभीष्ट था' इसकी उपपत्ति यथामति दे दी है ।

४८ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रथमतः अभाव के (१) अन्योन्याभाव और (२) संसर्गाभाव ये दो भेद हैं । तादात्म्य नाम का एक सम्बन्ध है, जिसके द्वारा इस सम्बन्ध के प्रतियोगी का अभेद उसके अनुयोगी में प्रतीत होता है । जैसे कि 'नरः सुन्दरः' इस बुद्धि में भासित होनेवाले तादात्म्य सम्बन्ध के द्वारा 'नर' और 'सुन्दर' में अभेद प्रतीत होता है । जिस अभाव की प्रतियोगिता इस तादात्म्य सम्बन्ध से नियमित हो या अविच्छिन्न हो, उस प्रतियोगिता के आश्रयीभूत वस्तु का अभाव ही अन्योन्याभाव है । इस अभिप्राय से ही 'तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽभावोऽन्योन्या- भावः' अन्योन्याभाव का यह लक्षण प्रसिद्ध है । अन्योन्याभाव का ही दूसरा नाम 'भेद' है । 'अन्योन्यस्मिन् अन्योन्यस्याभावः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो अभाव जिस अनुयोगी में रहे, अगर उस अनुयोगी का अभाव भी प्रथमोक्त अभाव के प्रतियोगी में रहे तो वह अभाव 'अन्योन्याभाव' है । जैसे कि 'घटो न' इस आकार का अन्योन्याभाव पट में है । यतः अनुयोगीभूत इस पट का भी अन्योन्या- भाव घट में है । अन्योन्याभाव के बोधक वाक्य में उसके प्रतियोगी के बोधक पद और अनुयोगी के बोधक पद दोनों ही प्रथमान्त होते हैं, जैसे कि 'घटो न पटः' । किन्तु संसर्गाभाव के अभिलापक वाक्य में प्रतियोगि के बोधक पद तो प्रथमान्त होते हैं; किन्तु अनुयोगी के बोधक पद प्रायः सप्तम्यन्त होते हैं, जैसे कि 'भूतले घटो नास्ति' । अन्योन्याभाव को छोड़कर और सभी अभाव संसर्गाभाव कहलाते हैं । संसर्गा- भाव के द्वारा अनुयोगी में प्रतियोगी के संसर्ग का ही प्रतिषेध होता है । 'भूतले घटो नास्ति' यहाँ पर यद्यपि भूतल में घट के निषेध का ही व्यवहार होता है; किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर वह प्रतिषेध भूतल में घटसंयोग का ही प्रतिषेध प्रतिपन्न होता है; क्योंकि भूतल में यतः घट का संयोग है, अतः भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट की सत्ता है । सुतरां भूतल में घट संयोग की सत्ता ही घटसत्ता का नियामक है । अतः भूतल में घट संयोग की असत्ता ही घट की असत्ता की प्रयोजिका होगी । (१) प्रागभाव, (२) प्रध्वंसाभाव और (३) अत्यन्ताभाव भेद से संसर्गाभाव तीन प्रकार का है । कार्य की उत्पत्ति से पहले उपादानकारण में कार्य के जिस अभाव का व्यवहार होता है वह 'प्रागभाव' है । जैसे कि तन्तु में पट का अभाव, दूध में दही का अभाव इत्यादि । यह यद्यपि अनादि है; किन्तु इसका विनाश होता है; क्योंकि पट की उत्पत्ति के बाद तन्तु में पुनः इस अभाव की प्रतीति नहीं होती है ।

भूमिका ४९ मुद्गरादि के प्रहार से घटादि के नाश को ही प्रध्वंस या ध्वंस कहते हैं। इसकी उत्पत्ति तो होती है; किन्तु विनाश नहीं होता। ध्वंस का विनाश मानने पर फूटे हुए घड़े की पुनः उत्पत्ति माननी पड़ेगी; क्योंकि घटादि के ध्वंस घटादि के उत्पत्ति स्वरूप ही हो सकता है। अतः ध्वंस सादि होने पर भी अनन्त है। संसर्गाभावों में जो अभाव नित्य हो उसे ही 'अत्यन्ताभाव' कहते हैं। अत्यन्ताभाव की न उत्पत्ति होती है, न उसका विनाश ही होता है, जैसे कि वायु में रूपादि का अभाव अत्यन्ताभाव है, भूतल में घटाभाव भी अत्यन्ताभाव ही है। इस प्रसङ्ग में यह प्रश्न उठता है कि अत्यन्ताभाव यदि नित्य है तो वह अपने आश्रयों में बराबर रहेगा। अतः भूतल में घट की सत्त्वदशा में भी घटाभाव की प्रमा-प्रतीति होनी चाहिए; किन्तु भूतल में घट की स्थिति-दशा में घटाभाव की प्रतीति को प्रमा नहीं स्वीकार किया जा सकता। इसके दो उत्तर दिये जाते हैं- (१) कुछ लोगों का कहना है कि अत्यन्ताभाव नित्य और अनित्य भेद से दोनों प्रकार का है। वायु में रहनेवाला रूप का अत्यन्ताभाव नित्य है। एवं भूतलादि में रहनेवाला घटाभाव अनित्य है; क्योंकि भूतल में घट के न रहने पर वह उत्पन्न होता है, पुनः घट के आ जाने पर वह घटाभाव नष्ट हो जाता है। अतः उस समय भूतल में घटाभाव नहीं है। (२) कुछ लोगों का कहना है कि सभी अत्यन्ताभाव नित्य हैं। अगर ऐसी बात न हो, भूतल में घट के आ जाने पर घटात्यन्ताभाव का नाश मान लिया जाय तो उस समय अन्यत्र भी घटात्यन्ताभाव की सत्ता न रह पायेगी। जिससे भूतल की तरह और सभी आश्रयों में भी जहाँ कि उस समय घट की सत्ता नहीं है- घटाभाव की प्रतीति प्रमा न हो सकेगी। अतः सभी अत्यन्ताभाव नित्य ही हैं। भूतल में घट की स्थिति दशा में जो घटाभाव की प्रतीति-प्रमा नहीं होती है, उसका कारण है उस समय भूतल में घटाभाव के सम्बन्ध का न रहना। सम्बन्ध के रहने से ही सम्बद्ध वस्तुओं की सत्ता होती है। भूतल में घट का संयोग है, अतः संयोग सम्बन्ध से भूतल में घट है। तन्तुओं में पट का समवाय सम्बन्ध है, अतः समवाय सम्बन्ध से तन्तुओं में पट की सत्ता है। भूतल में घटाभाव की सत्ता का प्रयोजक स्वरूप सम्बन्ध केवल साधारण भूतल स्वरूप नहीं है; किन्तु घट का असमानकालिक जो भूतल, तत्स्वरूप है। जिस समय भूतल में घट की सत्ता रहती है, उस समय का भूतल घट का समानकालिक है, असमानकालिक नहीं। अतः समय भूतल में घटाभाव की सत्ता का उपयुक्त स्वरूप-सम्बन्ध नहीं है। सुतराम् उस समय अन्यत्र घटाभाव की सत्ता रहते हुए भी भूतल में घटाभाव की सत्ता नहीं है। अतः उस समय भूतल में होनेवाली घटाभाव की प्रतीति प्रमा नहीं होती है।

५० प्रशस्तपादभाष्यम् सुतराम् किसी भी अत्यन्ताभाव को अनित्य मानने की आवश्यकता नहीं है । सभी अत्यन्ताभाव उत्पत्ति और विनाश से रहित हैं, अतः पूर्णरूप से नित्य हैं । अभाव के प्रसङ्ग में नव्य नैयायिकों ने इतना अधिक विचार किया है कि उसके कुछ अंशों को भी जाने बिना अभाव का ज्ञान अधूरा ही रहेगा । अतः तदनुसार मैं अभाव को प्रकृत रूप से समझने के लिए उससे सम्बद्ध कुछ विषयों का परिचय देना आवश्यक समझता हूँ । जिस प्रकार संयोगादि सभी सम्बन्धों का एक प्रतियोगी और एक अनुयोगी होता है, उसी प्रकार सभी अभावों के भी प्रतियोगी और अनुयोगी होते हैं । प्रतियोगी शब्द यहाँ प्रतिपक्षी का बोधक है । अतः जो अभाव जिसका विरोधी अर्थात् प्रतिपक्ष होगा वही उसका प्रतियोगी होगा । फलतः अभाव जिस वस्तु का होगा, वही वस्तु उस अभाव का प्रतियोगी होगा । जैसे कि 'घट का अभाव' पट का अभाव, रूप का अभाव इत्यादि रीति से जिसके सम्बन्ध से युक्त होकर जिस अभाव की प्रतीति होती है, वही उस अभाव का प्रतियोगी होता है । जैसे कि जहाँ पर घटाभाव रहेगा, वहाँ घट नहीं रहेगा, अतः घटाभाव घट का विरोधी है । एवं घट का अभाव ही घटाभाव है, अतः घटाभाव का प्रतियोगी घट है एवं पटाभाव का प्रतियोगी पट है, रूपाभाव का प्रतियोगी रूप है । जो अभाव जिस आश्रयीभूत वस्तु में रहेगा, वही वस्तु उस अभाव का अनुयोगी होगा । जैसे कि वायु रूपाभाव का अनुयोगी है, घटादि जड़ पदार्थ ज्ञानाभाव के अनुयोगी हैं । कथित प्रतियोगी में रहनेवाला धर्म ही प्रतियोगित्व या प्रतियोगिता है एवं कथित अनुयोगी में रहनेवाला धर्म ही अनुयोगिता है । इस प्रसङ्ग में यह विशेष रूप से विचारणीय है कि एक स्थान में एक सम्बन्ध से विद्यमान वस्तु का भी दूसरे सम्बन्ध से उसी स्थान में अभाव रहता है । जैसे कि भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहने पर भी समवाय सम्बन्ध से भूतल में घट का अभाव रहता है । इसी प्रकार एक स्थान में एक रूप से एक वस्तु की सत्ता रहने पर भी दूसरे रूप से उसी वस्तु का अभाव उसी आश्रय में रहता है । जैसे कि किसी गृह में पटत्व रूप से शुक्ल पट के रहने पर भी नीलपट रूप विशेष रूप से पट नहीं रहता, अतः उक्त शुक्लपट के आश्रय गृह में 'नीलपटत्वेन पटो नास्ति' यह (विशेष रूप से सामान्याभाव) अभाव रहता है; क्योंकि शुक्ल पट की सत्ता गृह में है, इससे नीलपट की सत्ता गृह में नहीं रह जाती । एवं वही पट जब घर से बाहर रहता है, उस समय उसमें बहिर्वृत्तित्व रूप धर्म रहता है । इस बहिर्वृत्तित्व रूप से पट कभी भी घट में नहीं रह सकता । अतः घट में पट की

भूमिका ५१ सत्त्व-दशा में पटत्वेन पट के रहते हुए भी बहिर्वृत्तित्वेन पट का अभाव रहता है । एवं जिस समय घट में पट तो है, किन्तु घट नहीं है, उस समय केवल घट के रहने पर भी घट-पट दोनों नहीं हैं । अतः पटत्वेन पट की सत्ता घट में रहने पर भी घटपटोभयत्वेन पट की सत्ता नहीं है; क्योंकि ऐसा तो नहीं कह सकते कि घट है इसलिए घट और पट दोनों ही हैं । अतः उभयाभाव के एक प्रतियोगी के रहने पर भी उभयत्वेन उसी प्रतियोगी का अभाव रहता है । इसको ही 'एकसत्त्वेऽपि द्वयं नास्ति' इस वाक्य के द्वारा व्यवहार करते हैं । इस प्रकार सम्बन्ध के द्वारा और धर्म के द्वारा अभावों में वैलक्षण्य होता है । किन्तु प्रतियोगिता के द्वारा ही अभावों में वैलक्षण्य आ सकता है । अतः यह कहा जाता है कि अभाव की प्रतियोगितायें किसी सम्बन्ध से एवं किसी धर्म से नियमित (अविच्छिन्न) होती हैं । जो प्रतियोगिता जिस सम्बन्ध से एवं जिस धर्म से अविच्छिन्न (नियमित) होगी, वही सम्बन्ध और वही धर्म उस प्रतियोगिता का अवच्छेदक होगा । जैसे कि 'समवायेन घटो नास्ति' इस अभाव की प्रतियोगिता समवाय सम्बन्ध और घटत्व धर्म से अवच्छिन्न है । अतः उक्त अभाव का प्रतियोगितावच्छेदक सम्बन्ध समवाय है और प्रतियोगितावच्छेदक धर्म घटत्व है । तदनुसार नवीन नैयायिक 'समवायेन घटो नास्ति' इस वाक्य का अर्थ करते हैं- "समवायसम्बन्धावच्छिन्नघटत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावोऽस्ति" । सम्बन्ध को अभाव का प्रतियोगितावच्छेदक मानने में यह युक्ति है कि सामान्यतः किसी भी वस्तु का अभाव कहीं भी नहीं है । अन्ततः कालिक सम्बन्ध से सभी वस्तुएँ सभी जगह वर्तमान हैं । अतः जब भी किसी वस्तु का अभाव कहीं व्यवहृत होता है, तो उसके मध्य में कोई विशेष प्रकार का सम्बन्ध कार्य करता रहता है । सम्बन्ध का यह कार्य प्रतियोगिता में वैलक्षण्य सम्पादन के द्वारा ही हो सकता है और किसी प्रकार नहीं । जिस सम्बन्ध से जो वस्तु जहाँ नहीं है, वही सम्बन्ध उस अभाव की प्रतियोगिता में और अभाव की प्रतियोगिताओं से वैलक्षण्य का सम्पादन करता है । अतः वही सम्बन्ध उस अभाव की प्रतियोगिता का 'अवच्छेदक' है । एवं वह प्रतियोगिता उस सम्बन्ध से अवच्छिन्ना होती है । जैसे कि भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहते हुए 'समवायेन घटो नास्ति' इस प्रकार का जो अभाव रहता है, उस अभाव की प्रतियोगिता में समवाय सम्बन्ध ही (संयोगसम्बन्धावच्छिन्नघटनिष्ठप्रतियोगिता की अपेक्षा) वैलक्षण्य का सम्पादन करता है । अगर समवाय सम्बन्ध उक्त प्रतियोगिता में वैलक्षण्य का प्रयोजक न हो, तो फिर घटनिष्ठ सभी प्रतियोगिताएँ समान रह जायेंगी । जिससे जिस प्रकार भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहते हुए 'संयोगेन घटो नास्ति' यह प्रतीति

५२ प्रशस्तपादभाष्यम् नहीं होती है, उसी प्रकार 'समवायेन घटो नास्ति' यह प्रतीति भी न हो सकेगी । अतः 'समवायेन घटो नास्ति' इस अभाव की प्रतियोगिता में और प्रतियोगि- ताओं से वैलक्षण्य का सम्पादक समवाय सम्बन्ध को मानना पड़ेगा । सम्बन्धों में प्रतियोगिताओं का यह 'विशेषकत्व' ही सम्बन्ध का प्रतियोगितावच्छेदकत्व है । धर्म को प्रतियोगिता का नियामक (अवच्छेदक) मानने में यह युक्ति है कि किस अभाव की प्रतियोगिता कहाँ-कहाँ है? एवं कहाँ नहीं ? इसके लिए प्रतियोगिता का कोई ऐसा नियामक (अवच्छेदक) धर्म मानना पड़ेगा, जो सभी प्रतियोगियों में रहे एवं अप्रतियोगिभूत वस्तुओं में न रहे । इसी नियामक धर्म को प्रतियोगिता का 'अवच्छेदक धर्म' कहते हैं, जो इस नियामक के द्वारा नियमित होता है, वह उस धर्म से 'अवच्छिन्न' होता है । जैसे कि घटाभाव की प्रतियोगिता कहाँ-कहाँ है ? एवं कहाँ-कहाँ नहीं ? इस प्रश्न का यही उत्तर है कि घटत्व धर्म जहाँ कहीं भी है, उन सभी स्थानों में अर्थात् सभी घटों में घटाभाव की प्रतियोगिता है । एवं जिन सब स्थानों में घटत्व नहीं है, अर्थात् घट से भिन्न पटादि सभी वस्तुओं में वह प्रतियोगिता नहीं है । अतः घटत्व ही घटाभाव की प्रतियोगिता की स्थिति का नियामक है । एवं घटाभाव की प्रतियोगिता घटत्व से नियम्य है । वस्तुतः नियामकत्व ही अवच्छेदकत्व है और नियम्यत्व ही अवच्छिन्नत्व है । इस दृष्टि से यद्यपि 'अवच्छेदक' पद के स्थान में 'नियामक' पद का और 'अवच्छिन्न' पद के स्थान में नियम्य' पद का भी प्रयोग किया जा सकता है; किन्तु 'अवच्छेदक' पद ही उक्त अर्थ में परम्परा से प्रयुक्त है, अतः उसके स्थान में दूसरे पदों की प्रयुक्ति से झटिति बोध में बाधा पहुँचेगी और अप्रयुक्तत्व दोष प्रयोक्ता के ऊपर आ पड़ेगा । सप्तपदार्थी इधर वैशेषिकदर्शन के मूर्द्धन्य प्रकरण ग्रन्थों के प्रभाव से विद्वानों की यह धारणा चली आ रही है कि महर्षि कणाद और उनके अनुयायी द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव इन सात पदार्थों की सत्ता मानते थे । किन्तु महर्षि कणाद ने "धर्मप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्यानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम्" (अ. १। आ. १। सू. ४) इस पदार्थोद्देश्य सूत्र में पदार्थ का उल्लेख नहीं किया है । एवं वैशेषिक दर्शन के सब से प्रामाणिक भाष्यकार प्रशस्तपाद ने भी अभाव पदार्थ का उल्लेख नहीं किया है । एवं विपक्षियों की- धर्मं व्याख्यातुकामस्य षट्पदार्थोपवर्णनम् । सागरं गन्तुकामस्य हिमवद्गमनोपमम् ॥

सूत्रों में निम्नलिखित पाँच सूत्र ऐसे हैं, जिनसे अभाव पदार्थ का स्वातन्त्र्य और

भूमिका ५३ अर्थात् "धर्म की व्याख्या के लिए प्रवृत्त पुरुष के द्वारा छः पदार्थों का वर्णन (वैसा ही अयुक्त है जैसा कि समुद्र की ओर जानेवाले पुरुष के लिए हिमालय पर जाना अयुक्त है)"। इत्यादि उक्तियों से भी इस धारणा को बल मिला है कि महर्षि कणाद द्रव्यादि छः भावपदार्थों को ही मूलतः मानते थे । पीछे आकर उपपत्ति की दृष्टि से आवश्यक समझकर आचार्यों ने 'अभाव' की भी वैशेषिक दर्शन के द्वारा अभिमत स्वतन्त्र पदार्थों में गणना कर ली और तब से ही वैशेषिकदर्शन को सप्तपदार्थवादी माना जाने लगा । अतएव किरणावलीकार उदयनाचार्य, न्यायकन्दलीकार श्रीधर भट्ट, न्यायलीलावतीकार वल्लभाचार्य प्रभृति वैशेषिकदर्शन के सभी प्रमुख आचार्यों को इसकी उपपत्ति देनी पड़ी है कि "पदार्थोद्देश" सूत्र में अभाव पदार्थ की अनुक्ति से उसका महर्षि कणाद के द्वारा अस्वीकृति का समर्थन नहीं किया जा सकता; किन्तु महर्षि कणाद के द्वारा निर्मित सूत्रों में निम्नलिखित पाँच सूत्र ऐसे हैं, जिनसे अभाव पदार्थ का स्वातन्त्र्य और उसके प्रागभावादि चार भेदों का स्पष्टतः उल्लेख है । एवं ये पाँच सूत्र उन सभी सूत्र- व्याख्याताओं के द्वारा स्वीकृत हैं जो अभी तक उपलब्ध हैं । कणाद-सूत्र की अभी तक तीन प्राचीन स्वतन्त्र टीकाएँ उपलब्ध हैं- (१) अनेकशः प्रकाशित शङ्करमिश्र कृत उपस्कार टीका, (२) मिथिला विद्यापीठ के द्वारा प्रकाशित अज्ञातनामा किसी दाक्षिणात्य विद्वान् की टीका एवं (३) बड़ौदा से प्रकाशित चन्द्रानन्द पण्डित कृत टीका । इन सभी टीकाकारों के द्वारा ये पाँच सूत्र स्वीकृत हैं और इनकी व्याख्या भी प्रायः उक्त सभी टीकाओं में एक-सी है । पं. जय- नारायण तर्कपञ्चानन की विवृति और चन्द्रकान्त तर्कालङ्कार के भाष्य- ये दो वैशेषिक सूत्र की अर्वाचीन टीकाएँ हैं । इन दोनों में भी उक्त पाँच सूत्र हैं । इन उपपत्तियों से अपने निर्णय पर पहुँचने के बाद मैंने चौखम्बा सीरीज से प्रकाशित शङ्करमिश्र कृत 'कणादरहस्य' के अन्त में चन्द्रकान्त तर्कालङ्कार महाशय कृत वैशेषिक-दर्शनभाष्य की एक आलोचना छपी देखी है, आलोचक का नाम उसमें नहीं है, इस आलोचना के अन्त में स्वतन्त्र रूप से इन पाँच सूत्रों का उल्लेख किया गया है और व्याख्या लिखी गयी है । और उन्होंने लिखा है कि 'अभाव की कणाद के द्वारा अस्वीकृति का जो आक्षेप किया जाता है, उसके निराकरण के लिए ही मैंने इन.सूत्रों की व्याख्या की है' । अतः इन पाँच सूत्रों की प्रामाणिकता में कोई सन्देह नहीं है । ये सूत्र हैं- (१) क्रियागुणव्यपदेशाभावात् (९।१।१)। उत्पत्ति से पहले (घटादि कार्य) असत् हैं; क्योंकि उस समय उनमें क्रियाओं का और गुणों का व्यवहार नहीं होता ।

सूत्र हैं ही नहीं । अतः इस सूत्र का प्रामाण्य ही सन्दिग्ध है । अतः सन्दिग्ध

५४ प्रशस्तपादभाष्यम् (२) सदसत् (९।१।२) । पहले से विद्यमान भी घटादि कार्य नाश के बाद असत् हैं; (क्योंकि नाश के बाद भी उनमें गुणक्रियादि का व्यवहार नहीं होता) । (३) असतः क्रियागुणव्यपदेशाभावादर्थान्तरम् । अविद्यमान पदार्थों में यतः गुणक्रियादि का व्यवहार नहीं होता है, अतः अभाव पदार्थ द्रव्यादि भावपदार्थों से भिन्न पदार्थ है । (४) सच्चासत् (९।१।४) सत् अर्थात् विद्यमान घटादि का भी प्रतिषेध होता है (यह प्रतिषेध ही अन्योन्याभाव है) । (५) यच्चान्यदसत्तत्सदसत् (९।१।५) । कथित तीनों प्रकार के अभावों से भिन्न अभाव भी हैं (यही अत्यन्ताभाव है) । इनमें तीसरे सूत्र से अभाव को द्रव्यादि छः पदार्थों से भिन्न ठहराया गया है और शेष चार सूत्रों में से पहला प्रागभाव का, दूसरा ध्वंस का, चौथा अन्योन्याभाव का एवं पाँचवाँ अत्यन्ताभाव का ज्ञापक है । अतः इन सूत्रों के द्वारा अभाव का द्रव्यादि छः पदार्थों से स्वातन्त्र्य है और उसके प्रागभावादि चारों भेद सुव्यवस्थ हैं । सुतराम् उद्देश्य सूत्र में अभाव पदार्थ का पृथक् रूप से उल्लेख न रहने के कारण सूत्रकार के ऊपर न्यूनता का ही आक्षेप कथञ्चित् हो सकता है । इससे अभाव के प्रसङ्ग में उनकी असम्मति नहीं मानी जा सकती । उपसंहार सूत्रों के अनुसार भी उपक्रम सूत्र में ह्रास-वृद्धि अनेक स्थानों में देखी जाती है । दूसरी बात यह है कि मिथिला विद्यापीठ से और बड़ौदा से जो वैशेषिकसूत्र छपे हैं, उन दोनों में ही "द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानाम्" इत्यादि उद्देश्य- सूत्र हैं ही नहीं । अतः इस सूत्र का प्रामाण्य ही सन्दिग्ध है । अतः सन्दिग्ध प्रामाण्यवाले सूत्र के द्वारा किसी निश्चित परिणाम पर नहीं पहुँचा जा सकता । वैशेषिकदर्शन के प्रसङ्ग में षट्पदार्थ-प्रतिपादक और जितने भी वाक्य हैं, वे सभी कथित वैशेषिक सूत्रों से दुर्बल ही हैं । अतः प्रवादों के बल पर अभाव की वैशेषिकशास्त्रीय स्वीकृति काटी नहीं जा सकती है । इन सभी उपपत्तियों के अनुसार मेरी सम्मति में अभाव पदार्थ भी महर्षि- कणाद के द्वारा स्वीकृत है । इस पुस्तक के पाठ के प्रसङ्ग में मैंने साधारणतः मुद्रित न्यायकन्दली का ही अनुसरण किया है; किन्तु जहाँ कहीं मुझे ऐसे पाठ मिले, जिनसे प्रकृत अर्थ का बोध ही संभव नहीं था, उनको यथामति संशोधन करके तदनुसार ही अनुवाद किया है; किन्तु मूल में यथावत् प्रायः मुद्रित पुस्तक के पाठ को ही रहने दिया है । नीचे टिप्पणी में उपपत्ति सहित उन पाठभेदों का उल्लेख कर दिया है । विद्वान् लोग इस पर अवश्य दृष्टिपात करें ।

भूमिका ५५ अनुवाद में मैंने अर्थ को स्पष्ट करने के अभिप्राय से कुछ अधिक शब्दों के प्रयोग का स्वातन्त्र्य ग्रहण किया है । इतने बड़े आकार के ग्रन्थ में न्यूनता के अतिरिक्त भ्रम और प्रमाद की पूरी सम्भावना है । अतः विद्वानों से क्षमा-याचना पूर्वक प्रार्थना है कि ऐसे स्थलों से मुझे अवश्य अवगत करावें । जिससे अगर इसका पुनः संस्करण संभव हुआ तो उन अवगतियों से लाभ उठाया जा सके । तद्विद्वांसोऽनुगृह्णन्तु चित्तश्रोत्रैः प्रसादिभिः । सन्तः प्रणयिवाक्यानि गृह्णन्ति ह्यनसूयवः ॥ आचार्य कुमारिल भट्ट के इस श्लोक के साथ मैं इस भूमिका को समाप्त करता हूँ । दुर्गाधर झा अनुसन्धान-सहायक वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी

पादनाय यत्र तत्र यथासम्भवं कियत्प्रयासस्तरसो कृतोऽपि।

संशोधकनिवेदनम्

[प्रथमसंस्करणस्य] श्रीमद्भिर्गवेषणालयनिदेशकैः डॉ० भागीरथप्रसादत्रिपाठि-(वागीशः शास्त्री) महा- भागैराज्ञप्तेन मया न्यायकन्दलीटीकायुतस्यास्य प्रशस्तपादभाष्यग्रन्थस्य यथाशक्यं यथा- शीघ्रं च पुनर्मुद्रणक्षमं संशोधनं विहितम्। यद्यप्यत्र न्यायकन्दल्यां तत्सहकृत-हिन्दीभाषानुवादे चानुच्छेदादिव्यवस्था नास्ति समीचीना, अतः पाठकानां सौविध्याय आपेक्षिकानुच्छेदादिविधेरवश्यम्भावादपि ग्रन्थस्य मुद्रणप्रकाशनशैघ्यविधिसम्भवात् पुनः पूर्वसदृश एवायं ग्रन्थः संस्कृतः; तथापि समेषां भाष्य-कन्दली-भाषानुवादानां प्रतीकानुसारं पृष्ठबन्धने ऐकरूप्या- पादनाय यत्र तत्र यथासम्भवं कियत्प्रयासस्तरसो कृतोऽपि। ग्रन्थेऽस्मिन् संशोधनविधिकर्मणा सप्ततिपृष्ठे (पृ. ७०) 'प्रशस्तपादभाष्यम्' इत्यस्योपरि अथ द्रव्यपदार्थनिरूपण् इति नूतनं शीर्षकं विधाय 'पृथिवी-प्रकरणम्' इत्युपशीर्षकात् पूर्वं स्वल्पस्थानभावाद् द्रव्येषु-इतिकर्तव्यस्थाने केवलं 'द्रव्ये' इति पदं योजितम्। तथैव गुणपदार्थनिरूपण-प्रकरणे पञ्चाशदुत्तर-द्विशततमपृष्ठतः (पृ. २५०) ग्रन्थोपरिशीर्षकात् पूर्वं गुणेषु-इतिकर्तव्यस्थाने केवलं 'गुणे' इति पदं योजितम्। एकचत्वारिंशदुत्तर-सप्तशततमपृष्ठे (पृ. ७४१) उपरि मुद्रितं 'प्रशस्त- पादभाष्यम्' पदं मुद्रिताद् अथ सामान्यपदार्थनिरूपणम् शीर्षकादधः कृतम्। तथैव पञ्चषष्ट्युत्तरसप्तशतपृष्ठे (पृ. ७६५) मुद्रितं 'प्रशस्तपादभाष्यम्' पदं मुद्रिताद् अथ विशेषपदार्थनिरूपणम् शीर्षकात्, तथा त्र्यधिकसप्तत्युत्तर-सप्तशततमपृष्ठे (पृ. ७७३) मुद्रिताद् अथ समवायपदार्थनिरूपणम् शीर्षकाच्चाधः कृतम्। प्रतीकानुसारं च केषाञ्चित् प्रशस्तपादभाष्यांशानां न्यायकन्दल्यांशानां च पृष्ठ- परिवर्तनम् - यथा सप्तपञ्चाशदुत्तर-षट्शततमपृष्ठे (पृ. ६५७) मुद्रितः 'स्थितिस्थापकस्तु... घनावयवसन्नि....' भाष्यांशोऽष्टपञ्चाशदुत्तर-षट्शततमपृष्ठे (पृ. ६५८) कृतः, तद्धिन्दीभाषानुवादोऽपि तत्रैव विहितः। नवपञ्चाशदुत्तर-षट्शततमपृष्ठे (पृ. ६५९) मुद्रितः 'धर्मः पुरुषगुणः....... विशुद्धाभिसन्धिजः' भाष्यांशः षष्ट्युत्तर-षट्शततमपृष्ठे (पृ. ६६०) परिवर्तितः। तथात्रस्थः (पृ. ६६०) 'समवेतमसमवायिकारणं स स्थितिस्थापकः' इत्यादि- कन्दल्यंशो नवपञ्चाशदुत्तर-षट्शततमपृष्ठे (पृ. ६५९) कन्दल्यंशे निवेशितः। पञ्चषष्ट्युत्तर-षट्शततमपृष्ठे (पृ. ६६५) 'तत्र समान्यानि.....विशिष्टदेवता- भक्तिरुपवासोऽप्रसादश्च' इति भाष्यांशः सर्वत्रैव भाषानुवादेन सह षट्षष्ट्युत्तर-षट्- शततमपृष्ठे (पृ. ६६६) कृतोऽर्थसंवादात्। तथात्रस्थः (पृ. ६६६) 'ब्राह्मण- क्षत्रियवैश्यानाम्......संस्काराः' भाष्यांशः सप्तषष्ट्युत्तर-षट्शततमपृष्ठे (पृ. ६६७) परिवर्तितः।

संशोधननिवेदनम् ५७ एवमेव सप्तषष्ट्युत्तर-षट्शततमपृष्ठे (पृ. ६६७) मुद्रितः 'क्षत्रियस्य सम्यक्... स्वकीयाश्च संस्काराः' भाष्यांशोऽष्टषष्ट्युत्तर-षट्शततमपृष्ठे (पृ. ६६८) मुद्रितः 'शूद्रस्य पूर्ववर्णपारतन्त्र्यम् अभ्यञ्नादिवर्जनं च' भाष्यांशो नवषष्ट्युत्तर- - षट्शततमपृष्ठे (पृ. ६६९) विहितः । तथा च नवषष्ट्युत्तरषट्शततमपृष्ठे (पृ. ६६९) मुद्रितः 'विद्याव्रतस्नात- कस्य......महायज्ञानां' भाष्यांशः सर्वैरेव भाषानुवादेन सह सप्तत्युत्तरषट्शत- तमपृष्ठे (पृ. ६७०), एवमेव एकसप्तत्युत्तर-षट्शततमपृष्ठस्थः (पृ. ६७१) 'ब्रह्म- चारिणो गृहस्थस्य वा ....वानप्रस्थस्य' भाष्यांशस्तथा द्व्यधिकसप्तत्युत्तरषट्शतत- मपृष्ठस्थः (पृ. ६७२) 'वनस्थस्य धर्मसाधनं कथयति ....हुतशेषभोजनम्' कन्द- ल्यंशश्च सर्वत्रैव द्व्यधिकसप्तत्युत्तर-षट्शततमपृष्ठे (पृ. ६७२) परिवर्तितः । इत्थमेव सप्तनवत्युत्तर-षट्शततमपृष्ठे (पृ. ६९७) शिवस्तवबोधकस्य 'जगदङ्कूर- बीजाय चन्द्रार्धार्धेन्दुमौलय' इति कन्दलीस्थश्लोकस्य स्पष्टार्थावगमको हिन्दी- भाषानुवादो वाक्येनैकेनाङ्कितः । एकचत्वारिंशदुत्तर-सप्तशततमपृष्ठे (पृ. ७४१) 'यजन्ति जगदुत्पत्तिस्थितिसंहृति- हेतवः तन्निषेधार्थमाह-' इति कन्दल्यंशादधोलिखितः 'मणियों का चोर की तरफ जाना ....कर्मनिरूपण समाप्त हुआ' इति हिन्दीभाषानुवादांशस्तत्रैव पृष्ठे 'च प्रक्षोभणं चलनम् ......कर्मपदार्थः समाप्तः' इति कन्दल्यांशदत्तसङ्ख्यतया परिवर्तितः । तथैव पञ्चषष्ट्युत्तर-सप्तशततमपृष्ठे (पृ. ७६५) 'चतुर्युगचतुर्विद्या ......उत्पाद- विना-' इति कन्दल्यंशस्तत्रैव पृष्ठे 'अप्रत्यक्ष व्यक्तियों में भी प्रवृत्ति...... सामान्य- निरूपण समाप्त हुआ' इति हिन्दीभाषानुवादांशादधो न्यायकन्दलीति लिखित्वा परिवर्तितः । प्रकृतग्रन्थे मूलं प्रशस्तपादभाष्यं तद् दुरवग्राह्यार्थावबोधिका न्यायकन्दलीति टीका च भूतपूर्वानुसन्धानसहायकैः श्रीदुर्गाधरझा-महोदयैरपि तदुभयभाष्यटीकयोः सम्यग्- र्थविबोधाय्यातिसरलहिन्दीभाषानुवादेनालङ्कृता । अत्र प्राचीनपरम्परया चूंकि-अगर- मगर-प्रभृतियावनभाषामिश्रितशब्दानां प्रयोगो बाहुल्येन कृतो विद्यते, इतः पूर्वं तेषामेव मिश्रितभाषाशब्दानां हिन्दीभाषाप्राशस्त्यात् । अतः क्वचन तत्तत्स्थलेषु यतः-यदि-किन्तु-प्रभृतिशब्दानां प्रयोगप्रयासः कृतो वर्तते । ईदृक्प्रशस्तग्रन्थविषयविशेषे सहयोगिनस्तथा ग्रन्थमुद्रणकालमध्ये ममातर्किता- स्वस्थतायां प्रायो मासद्वयं यावदीक्ष्यपत्र-संशोधनकर्मदत्तावधानाश्चेमे पं. श्रीरामगोविन्द- शुक्लमहोदयास्तेऽवश्यं धन्यवादर्हाः । तथैव ग्रन्थस्यास्य प्रशस्तप्रकाशनकर्मणि शैघ्योत्पादनाय प्रकाशनाधिकारि-डॉ. हरिश्चन्द्रमणित्रिपाठिमहोदयाश्चापि सततं साधुवादर्हाः सन्तीति निवेद्यते । वसन्त-पञ्चमी २०३४ वैक्रमाब्दे उमाशङ्करत्रिपाठी १२-२-७८ खैस्ताब्दे अनुसन्धानसहायकः सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालयः

विषयानुक्रमणिका विषयाः पृष्ठाङ्काः अकारणगुणकथनम् (भाष्ये) .... .... २४७ अकारणगुणपूर्वकगुणकथनम् (भाष्ये) .... .... २३८ अजसंयोगमतखण्डनम् (भाष्ये) .... .... ३५९ अतीतस्य समवायिकारणत्वे मतविशेषः (न्या. क. टीकायाम्) .... .... २८३ अतीन्द्रियगुणकथनम् (भा.) .... .... २३६ अधर्मनिरूपणम् अधर्मसाधनकथनं च (भा.) .... .... ६७७ अनध्यवसायनिरूपणम् (भा.) .... .... ४३४ अनुमाननिरूपणम् (भा.) .... .... ४७६ अनुमाननिर्णयकथनम् (टी.) .... .... ४२४ अनुसन्धाननिरूपणम् (भा.) .... .... ६०६ अनुसन्धानोदाहरणम् (भा.) .... .... ६१० अनेकाश्रितगुणकथनम् (भा.) .... .... २३० अन्तःकरणग्राह्यगुणकथनम् (भा.) .... .... २३२ अपक्षेपणनिरूपणम् (भा.) .... .... ७०० अपदेशलक्षणम् अपदेशोदाहरणं च (भा.) .... .... ५७५ मोक्षो ज्ञानपूर्वकाद्धर्मात् (भा.) .... .... ६७९ अपां सांसिद्धिकद्रवत्ववत्त्वे विप्रतिपत्तिखण्डनम् (भा.) .... .... ६४२ अपेक्षाबुद्धिनाशात् परत्वापरत्वविनाशस्योदाहरणम् (भा.) .... .... ३९९ अप्रत्ययकर्मकथनम् (भा.) .... .... ७२५ अभावप्रमाणस्यानुमानेऽन्तर्भावकथनम् (भा.) .... .... ५४२ अभावस्य पदार्थत्वसाधनम् (टी.) .... .... ५५२ अमूर्त्तगुणकथनम् (भा.) .... .... २२९ अयावद्द्रव्यभाविगुणकथनम् (भा.) .... .... २४९ अर्थापत्तेरनुमानेऽन्तर्भावकथनम् (भा.) .... .... ५३४ अवयवनिरूपणम् (भा.) .... .... ५६५ अवयविगुरुत्वभावखण्डनम् (टी.) .... .... ६४१ अविदुषां प्रवर्त्तकधर्माधर्मकार्यकथनम् (भा.) .... .... ६७८

विषयानुक्रमणिका ५९ अविद्याभेदनिरूपणम् (भा.) .... .... ४११ अविनाभावपदार्थनियामककथने सौगतमतम् (टी.) .... .... ४९२ अविनाभावस्मरणस्यानुमानाङ्गत्वप्रदर्शनम् (भा.) .... .... ४९१ अव्याप्यवृत्तिगुणकथनम् (भा.) .... .... २४७ असत्कार्यव्यवस्थापनम् (टी.) .... .... ३४२ असत्कार्यवादे विप्रतिपत्तिपूर्वकं सत्कार्यवादकथनम् (टी.) .... .... ३३९ असमवायिकारणगुणकथनम् (भा.) .... .... २४४ असमानजात्यारम्भकगुणकथनम् (भा.) .... .... २४० आकाशकालदिगात्मनां साधर्म्यकथनम् (भा.) .... .... ५८ आकाशनिरूपणम् (भा.) .... .... १४३ आकाशात्मनां साधर्म्यकथनम् (भा.) .... .... ६५ आकाशे प्रमाणम् (भा.) .... .... १४४ आकुञ्चननिरूपणम् (भा.) .... .... ७०० आत्मनित्यत्वेऽनिर्मोक्षाभावप्रकारः (टी.) .... .... २१५ आत्मनिरूपणम् आत्मसिद्धौ प्रमाणानि च (भा.) .... .... १६७ आत्मनः क्षणिकत्ववादनिरासः (टी.) .... .... १७५ आत्मसमवेतानां प्रत्यक्षे कारणकथनम् (भा.) .... .... ४६३ आत्मस्वरूपनिरूपणम् (टी.) .... .... ६९० आत्मैकत्ववादनिरासः (टी.) .... .... २१० आर्षज्ञाननिरूपणम् (भा.) .... .... ६२७ आश्रमिणां धर्महेतुनिरूपणम् (भा.) .... .... ६६८ आश्रयनाशाद् द्वित्वादिनाशः (भा.) .... .... २८६ आश्रयव्यापिगुणकथनम् (भा.) .... .... २९४ इच्छानिरूपणम् (भा.) .... .... ६३४ इन्द्रियकथनम् (भा.) .... .... ४४२ इन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वव्यवस्थापनम् (टी.) .... .... ६० ईश्वरस्याष्टगुणाधिकरणत्वम् (टी.) .... .... १४२ ईश्वरस्यैकानेकत्वविचारः (टी.) .... .... १४१ ईश्वरस्य क्लृप्तद्रव्यान्तर्गतत्वम् (टी.) .... .... २६ ईश्वरस्य नित्यमुक्तत्वकथनम्, ईश्वरस्य षड्गुणाश्रयत्वमतं च (टी.) .... १४२ ईश्वरे प्रमाणोपन्यासः (टी.) .... .... १३३ उत्क्षेपणनिरूपणं कर्मविभागश्च (भा.) .... .... ६९९ उत्क्षेपणादौ गमनव्यवहारस्य भाक्त्वकथनम् उद्देशादिलक्षणम् (टी.) .... ६९

६० प्रशस्तपादभाष्यम् उपमानस्य शब्देऽन्तर्भावकथनम् (भा.) .... .... ५३० उभयकारणताश्रयगुणकथनम् (भा.) .... .... २४६ एकादिप्रत्ययस्य रूपादिविषयत्वमतखण्डनम् (टी.) .... .... २६८ एकैकवृत्तिगुणकथनम् (भा.) .... .... २३० एकैकेन्द्रियग्राह्यगुणकथनम् (भा.) .... .... २३१ ऐतिह्यस्यानुमानेऽन्तर्भावकथनम् (भा.) .... .... ५५८ कणादशब्दार्थकथनम् (टी.) .... .... ४ कर्मजगुणकथनम् (भा.) .... .... २३९ कर्मणां जातिव्यञ्जकत्वव्यवस्थापने शङ्कासमाधिः (भा.) .... .... ७१ कर्मनिरूपणम् (भा.) .... .... ६९७ कर्मप्रत्यक्षे विप्रतिपत्तिनिराकरणम् (टी.) .... .... ४४० कामादीनामिच्छायामन्तर्भावकथनम् (भा.) .... .... ६३५ कारणगुणपूर्वकगुणकथनम् (भा.) .... .... २३६ कारणत्वञ्चान्यत्र पारिमाण्डल्यादिभ्यः (भा.) .... .... ४७ कारणवतां कार्यत्यानित्यत्वे (भा.) .... .... ४६ कालकृतपरत्वापरत्वोत्पत्तिकथनम् (भा.) .... .... ३९७ कालनिरूपणम्, सर्वकार्याणामुत्पत्तिस्थितिविनाशहेतुत्वम्, क्षणादिव्यवहारहेतुः, तद्गुणकथनम् (भा.) .... .... १५५ कृतदारविद्याव्रतस्नातकानां धर्महेतुनिरूपणम् (भा.) .... .... ६६९ क्रियाहेतुगुणकथनम् (भा.) .... .... २४४ क्रोधादीनां द्वेषान्तर्भावकथनम् (भा.) .... .... ६३७ गन्धनिरूपणम् (भा.) .... .... २५५ गमनस्य कर्मत्वापर्यायकथनम् (भा.) .... .... ७०९ गमनस्य कर्मत्वपर्यायत्वे विशेषसंज्ञाया गमनग्रहणस्य फलम् (भा.) .... ७१० गमननिरूपणम् (भा.) .... .... ७०० गन्धशून्यत्वं सलिलादीनाम् (टी.) .... .... ७४ गुणनिरूपणारम्भः, तेषां निर्गुणत्वं निष्क्रियत्वम् (भा.)... .... २२७ गुणविभागो रूपरसादिभेदेन (भा.) .... .... २६ गुणस्य निर्गुणत्वे निष्क्रियत्वे युक्तिः (टी.) .... .... २२८ गुणादीनां पञ्चानां निर्गुणत्वनिष्क्रियत्वे (भा.) .... .... ४३ गुरुत्वनिरूपणम् (भा.) .... .... ६४० गुरुत्वस्य त्वगिन्द्रियग्राह्यतावादिमतखण्डनम् (टी.) .... .... ६४० ग्रन्थकारवंशवर्णनादिकम् (टी.) .... .... ७८७

विषयानुक्रमणिका ६१ ग्रन्थोपसंहारः (भा.) .... .... ७८६ घ्राणस्य पार्थिवत्वे प्रमाणम् (टी.) .... .... ८८ घ्राणे प्रमाणकथनम् (टी.) .... .... ८८ चक्षुषस्तैजसत्वकथनम् (टी.) .... .... ९९ चित्ररूपयुक्तिकथनम् (टी.) .... .... ७५ चेष्टाया अनुमानेऽन्तर्भावकथनम् (भा.) .... .... ५२९ जलनिरूपणम्, तद्गुणकथनम्, तस्य द्वैविध्यम्, अनित्यस्य त्रैविध्यम् (भा.) .... ९० जलस्य शुक्लरूपादिमत्त्वे युक्तिः (टी.) .... .... ९२ जले द्रवत्वात् कर्मोत्पत्तिः (भा.) .... .... ७२८ ज्ञाततावादनिराकरणम् (टी.) .... .... २२३ ज्ञानपूर्वकाद्धर्मादपवर्गकथनम् (भा.) .... .... ६८९ ज्ञानस्य आत्मसमवेतत्वव्यवस्थापनम् (टी.) .... .... २३५ ज्ञानस्य विषयसंवेदनानुमेयत्वमतखण्डनम् (टी.) .... .... २३४ ज्ञानस्य शरीराद्याश्रयत्वनिरासः (भा.) .... .... १७१ तमसो भावरूपत्वम् (टी.) .... .... २६ तमसो द्रव्यान्तरत्वयुक्तिखण्डनम् (टी.) .... .... २१ तर्कज्ञानस्य चतुर्विधाविद्यायामन्तर्भावविचारः (टी.) .... .... ४१५ तेजसो नैमित्तिकद्रवत्ववत्त्वे युक्तिः (टी.) .... .... ६७ तेजोनिरूपणम्, तद्गुणकथनम्, तस्य द्वैविध्यम्, अनित्यस्य त्रैविध्यम् (भा.) .... ९७ त्रिपुटीप्रत्यक्षतामतनिराकरणम् (टी.) .... .... २२१ त्र्यणुककारणनिरूपणम् (टी.) .... .... ८० त्वगिन्द्रियस्य वायुत्वम् (टी.) .... .... ११२ दिक्कालयोः सर्वोत्पत्तिनिमित्तत्वसाधनम् (टी. ) .... .... ६६ दिक्कालयोः साधर्म्यकथनम् (भा.) .... .... ६५ दिङ्निरूपणम्, तद्गुणकथनम्, तस्याः प्राच्यादिभेदाः (भा.) .... १६२ दीर्घत्वमहत्त्वयोर्ह्रस्वत्वाणुत्वयोश्च विशेषकथनम् (भा.) .... ३३० दुःखनिरूपणम् (भा.) .... .... ६३३ द्रवत्वनिरूपणम्, द्रवत्वविभागादिश्च (भा.) .... .... ६४१ द्रव्यत्वादीनामपरसामान्यत्व-विशेषसामान्यत्वकथनम् (भा.) .... ७४६ द्रव्यनाशजपरत्वापरत्वनाशोदाहरणम् (भा.) .... ...... ४०३ द्रव्यविभागः पृथिव्यादिभेदेन (भा.) .... .... २० द्रव्यसंयोगनाशजपरत्वापरत्वनाशोदाहरणम् (भा.) .... .... ४०६ द्रव्यातिरिक्तसंख्यासाधनम् (टी.) .... .... २७०

६२ प्रशस्तपादभाष्यम् द्रव्यादिपदार्थोद्देशक्रमनियमे युक्तिः (टी.) .... १७ द्रव्यादीनां त्रयाणां सत्तावत्त्वे बाधकनिरासः (टी.) .... ४४ द्रव्यादीनां त्रयाणां सत्तावत्त्वं सामान्यविशेषवत्त्वं स्वसमय्यार्थशब्दाभिधेयत्वं धर्माधर्मकर्तृत्वम् (भा.) .... ४४ द्रव्यादीनां पञ्चानामनेकत्वं समवायित्वं च (भा.) .... ४२ द्रव्योपेक्षाबुद्धिविनाशजपरत्वापरत्वनाशोदाहरणम् (भा.).... .... ४०४ द्रव्याश्रितत्वमन्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः नित्यद्रव्याणामनाश्रितत्वं च (भा.).... .... ४८ द्वित्वसद्भावे विप्रतिपन्नानां तार्किकानां मतखण्डनम् (टी.) .... २९५ द्वित्वसामान्यज्ञाने प्रमाणम् (टी.) .... २७६ द्वित्वादेरपेक्षाबुद्धिनाशनाश्यत्वे क्षणनियमः (भा.) .... २७२ द्वित्वादेर्बुद्धिजन्यत्वे युक्तिः (टी.) .... २७५ द्वीन्द्रियग्राह्यगुणकथनम् (भा.) .... २३२ द्वेषनिरूपणम् (भा.) .... ६३७ द्वयणुककारणनिरूपणम् (टी.) .... ७९ धर्मनिरूपणम् (भा.) .... ६५९ धर्मविनाशप्रकारः (टी.) .... ६६४ धर्मस्य निःश्रेयसहेतुत्वकथनम् (भा.) .... १८ धर्मस्वीकारे युक्तिप्रदर्शनम् (टी.) .... ६६० ध्वन्यात्मकशब्दोत्पत्तिविधिः (भा.) .... ६९५ निदर्शननिरूपणं तद्विभागः (भा.) .... ५९८ निदर्शनाभासनिरूपणम् (भा.) .... ५९९ निमित्तकारणगुणकथनम् (भा.) .... २४६ निर्णयनिरूपणं निर्णयविभागश्च (भा.) .... ६२२ निष्क्रमणत्वप्रवेशनत्वयोः कर्मान्तरत्वखण्डनम् (भा.) .... ७०४ नैमित्तिकद्रवत्वोत्पत्तिप्रकारः (भा.) .... ६४४ पञ्चानां कर्मणां गमनत्वकथनम् (भा.) .... ७०१ पदानामर्थबोधकत्वप्रकारकथनम् (टी.) .... ५६१ पदार्थानां सामान्यविशेषलक्षणानि (टी.) .... ४० परत्रारम्भकाणां गुणानां कथनम् (भा.) .... २४२ परत्वापरत्वनिरूपणम् (भा.) .... ३९३ परत्वापरत्वविनाशकारणनिर्वचनम् (भा.) .... ३९९ परमह्रस्वत्वपरमदीर्घत्वपरिमाणस्वीकर्तृमतम् (टी.) .... ३२१ परमाणुपरिमाणस्य कारणतामतखण्डनम् (टी.) .... ३२८