वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
भूमिका २३ है । अगर ऐसा न मानें, अपेक्षाबुद्धि का भी और बुद्धियों की तरह तीसरे ही क्षण में विनाश मानें ? तो उससे उत्पन्न होनेवाले द्वित्व का सविकल्पक प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा; क्योंकि वर्त्तमान विषयों का ही प्रत्यक्ष होता है । प्रत्यक्ष के प्रति विषय कारण हैं । तदनुसार द्वित्वविषयक प्रत्यक्ष के प्रति भी द्वित्व कारण है । अगर द्वित्व के कारणीभूत उक्त अपेक्षाबुद्धि की सत्ता तीन क्षणों तक न मानें तो द्वित्व- जनित उक्त प्रत्यक्ष अनुपपन्न हो जाएगा । द्वित्व प्रत्यक्ष की रीति यह है कि द्वित्व के आश्रयीभूत दोनों व्यक्तियों में अलग-अलग 'अयमेकः, अयमेकः' इत्यादि आकार की अपेक्षाबुद्धि उत्पन्न होती है । इस अपेक्षाबुद्धि से द्वित्व की उत्पत्ति होती है, फिर द्वित्व में विशेषणीभूत द्वित्वत्वविषयक निर्विकल्पक प्रत्यक्ष होता है । इसके बाद द्वित्व का विशिष्टप्रत्यक्ष होता है । उसके बाद के क्षण में द्वित्व का विनाश होता है; क्योंकि विशिष्टज्ञान के लिए पहले विशेषण का ज्ञान आवश्यक है, अतः द्वित्वत्वविशिष्ट द्वित्व के प्रत्यक्ष के लिए द्वित्वत्व का निर्विकल्पक ज्ञान मानना आवश्यक है । अगर उक्त अपेक्षाबुद्धि की और साधारण ज्ञानों की तरह दूसरे क्षण तक ही स्थिति मानें, तो द्वित्व की उत्पत्ति के आगे के क्षण में ही अपेक्षाबुद्धि का विनाश हो जाएगा; अतः जिस क्षण में द्वित्वत्व का निर्विकल्पक प्रत्यक्ष कहा गया है, उसी क्षण में अपेक्षाबुद्धि का विनाश होगा । फिर उसके आगे के क्षण में द्वित्व के सविकल्पक प्रत्यक्ष की अपेक्षा द्वित्व का ही नाश हो जाएगा; क्योंकि अपेक्षाबुद्धि का विनाश ही द्वित्व का विनाशक है । फिर द्वित्व विनाश के बाद द्वित्व का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता; क्योंकि प्रत्यक्ष के अव्यवहित पूर्वक्षण में विषय का रहना आवश्यक है । अतः अपेक्षाबुद्धि का विनाश और बुद्धियों की तरह तीसरे क्षण में न मानकर उत्पत्ति के चौथे क्षण में मानना पड़ता है । परिमाण लम्बा और चौड़ा एवं भारी और हल्का ये व्यवहार जिस गुण के कारण हों, उस गुण को 'परिमाण' कहते हैं । दोनों में पहले से लम्बाई-चौड़ाई का बोध होता है और दूसरे से भारीपन और हल्कापन का बोध होता है । इनमें पहला भी दो प्रकार का है, एक दीर्घ और दूसरा ह्रस्व । दूसरे प्रकार का वह परिमाण है, जिससे द्रव्य का भारीपन और हल्कापन प्रतीत हो । यह भी अणु और महत् भेद से दो प्रकार का है । इसकी भी नित्यता और अनित्यता अपने आश्रय की नित्यता और अनित्यता के अधीन है । अर्थात् नित्य द्रव्य में रहनेवाला परिमाण नित्य है और अनित्य द्रव्य में रहनेवाला परिमाण अनित्य है । अनित्य परिमाण तीन कारणों से उत्पन्न होता है- (१) अवयवों के परिमाण से, (२) अवयवों की संख्या से और (३) (अवयवों के प्रशिथिलसंयोगरूप) प्रचय से । दोनों कलापों के
२४ प्रशस्तपादभाष्यम् परिमाण से घट में परिमाण की उत्पत्ति होती है; किन्तु उसी परिमाण के तीन कपालों से जिस घट की उत्पत्ति होगी, उस घट का परिमाण दो कपालों से उत्पन्न घट के परिमाण से भिन्न होगा। इस विलक्षण परिमाण का कारण तीनों कपालों का परिमाण नहीं हो सकता; क्योंकि इन तीनों कपालों का परिमाण भी पहले घट के उत्पादक दोनों कपालों के समान ही है। अतः उक्त तीन कपालों से उत्पन्न घट में जो उक्त दोनों कपालों से उत्पन्न घट के परिमाण से विलक्षण परिमाण उपलब्ध होता है, उसका कारण कपालों की त्रित्व संख्या ही है। अतः संख्या भी परिमाण का कारण है। इस प्रकार संख्या में स्वीकृत परिमाण की कारणता के अनुसार ही अणु परिमाणों में किसी भी वस्तु की कारणता का अस्वीकार करना वैशेषिकों के लिए संभव होता है। वैशेषिकों के सिद्धान्त के अनुसार अणुपरिमाण किसी के भी कारण नहीं हैं। परमाणुओं के परिमाण और द्व्यणुकों के परिमाण ही अणुपरिमाण हैं। ये अगर कारण होंगे तो परमाणु के परिमाण द्व्यणुकों के परिमाण के कारण होंगे और द्व्यणुकों के परिमाण त्र्यसरेणु के परिमाण के कारण होंगे; किन्तु सो संभव नहीं है; क्योंकि परिमाणों में यह नियम देखा जाता है कि वे अपने समान जाति के अपने से उत्कृष्ट परिमाण को ही उत्पन्न करते हैं। कपालों में महत् परिमाण हैं, उसके परिमाणों से घट का जो परिमाण उत्पन्न होता है, वह कपाल परिमाण से महत्तर होता है। अर्थात् कपाल परिमाण में रहनेवाली महत्त्व जाति भी उसमें है और कपाल परिमाण से वह बड़ा भी है। इस नियम के अनुसार परमाणुओं के परिमाणों से द्व्यणुकों के परिमाणों की उत्पत्ति मानने से द्व्यणुक के परिमाणों में अणुत्व-जाति के साथ-साथ परमाणुओं के परिमाण से न्यूनता भी माननी पड़ेगी; क्योंकि जिस प्रकार महत्परिमाण से उत्पन्न होनेवाले परिमाण महत्तर होते हैं, उसी प्रकार अणुपरिमाण से उत्पन्न होनेवाले परिमाण अणुतर होंगे। इसी प्रकार द्व्यणुकों में रहनेवाले अणुपरिमाणों से अगर त्र्यसरेणु परिमाण की उत्पत्ति मानें तो वह द्व्यणुक के परिमाण से छोटा होगा। फलतः त्र्यसरेणु का प्रत्यक्ष न हो सकेगा। जिससे आगे की प्रत्यक्ष धारा ही रुक जाएगी। जो जगत् के अप्रत्यक्ष में परिणत हो जाएगी। तस्मात् द्व्यणुक परिमाण के उत्पादक दोनों परमाणुओं की द्वित्व संख्या ही है एवं तीन द्व्यणुकों से उत्पन्न होनेवाले त्र्यसरेणु के परिमाण का उसके उपादानभूत तीनों द्व्यणुकों की त्रित्व संख्या ही कारण है। घटादि के विशेष प्रकार के परिमाणों के लिए भी संख्या की अपेक्षा का उपपादन कर चुके हैं। अतः जन्य अणुपरिमाणों के लिए वह कोई नवीन कल्पना भी नहीं है। 'प्रचय' भी परिमाण का कारण है। इसी से सेर भर लोहे की लम्बाई-चौड़ाई और सेर भर रूई की लम्बाई-चौड़ाई में अन्तर उपलब्ध होता है। यह अन्तर अवयवों के परिमाण या अवयवों की संख्या से उपपन्न नहीं हो सकते। कथित
भूमिका २५ लौहखण्ड और तुलखण्डों के अवयवों की संख्या और परिमाण समान हैं । अतः उक्त अन्तर की उपपत्ति के लिए यही कल्पना करनी चाहिए कि लोहे के अवयवों के संयोग संघटित हैं और रूई के अवयवों के संयोग शिथिल (ढीले) हैं । अवयवों के इस शिथिल संयोग को ही 'प्रचय' कहते हैं । पृथक्त्व 'घट पट से पृथक् है' (अयम्स्मात् पृथक्) इस आकार की प्रतीति जिस गुण से हो, उसे 'पृथक्त्व' कहते हैं । यह भिन्न द्रव्यों में एक, दो या इनसे अधिक द्रव्यों को अवधि मानकर शेष द्रव्यों में रहता है । इस प्रकार यह भेद या अन्योन्याभाव-सा ही दीखता है; किन्तु अन्योन्याभाव की प्रतीति का 'घटभिन्नः पटः' इत्यादि प्रकार के होते हैं, अतः भेद से पृथक्त्व भिन्न है । अर्थात् भेद की प्रतीति के अभिलापक वाक्य में प्रयुक्त प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों के लिए प्रथमान्त पद का ही प्रयोग होता है; किन्तु पृथक्त्व की प्रतीति के लिए उनमें से अवधिभूत एक अर्थ का पञ्चम्यन्त पद से उपादान किया जाता है । संयोग असम्बद्ध दो द्रव्यों के परस्पर सम्बन्ध को ही 'संयोग' कहते हैं । यह तीन प्रकार का है-(१) दोनों सम्बन्धियों में से एकमात्र की क्रिया से उत्पन्न । जैसे पहाड़ और पक्षी का संयोग केवल पक्षी की क्रिया से उत्पन्न होता है । (२) दोनों सम्बन्धियों की क्रिया से उत्पन्न, जैसे लड़ते हुए दो पहलवानों का संयोग । (३) तीसरा संयोग संयोग से ही उत्पन्न होता है । जैसे हाथ और पुस्तक के संयोग से शरीर और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है । वैशेषिकों के सिद्धान्त में अवयव और अवयवी परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं । अतः शरीर रूप अवयवी और हाथ-पैर प्रभृति अवयव परस्पर भिन्न हैं । अतः जिस प्रकार घट की क्रिया से भूतल और पट का संयोग उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार हाथ की क्रिया से शरीर और पुस्तक का संयोग भी उत्पन्न नहीं हो सकता; किन्तु शरीर में क्रिया के न रहने पर भी हाथ की क्रिया से पुस्तक के साथ जो हाथ और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है, उसके बाद शरीर के साथ पुस्तक के संयोग की प्रतीति होती है । प्रतीति का अपलाप नहीं किया जा सकता । अतः शरीर और पुस्तक में भी संयोग मानना पड़ेगा; किन्तु यह संयोग अगर क्रिया से उत्पन्न होगा तो पुस्तक की क्रिया या शरीर की क्रिया या फिर उन्हीं दोनों की क्रिया से उत्पन्न होगा; किन्तु न शरीर में और न पुस्तक में ही क्रिया है । अतः प्रकृत में शरीर और पुस्तक के संयोग का कारण क्रिया को नहीं माना जा सकता; किन्तु असमवायिकारण तो क्रिया या गुण इन दोनों में से ही कोई होगा । प्रकृत में क्रिया
२६ प्रशस्तपादभाष्यम् असमवायिकारण नहीं हो सकती, अतः उसके असमवायिकारण होने की बात ही नहीं उठती । सुतरां प्रकृत में हाथ और शरीर इन दोनों के लिए गुण रूप किसी असमवायिकारण की कल्पना आवश्यक है । यह गुण उक्त संयोग से अव्यवहित पूर्वक्षण में नियत रूप से रहनेवो हाथ और पुस्तक के संयोग को छोड़कर दूसरा नहीं हो सकता । अतः हाथ और पुस्तक की क्रिया से उत्पन्न संयोग से ही शरीर और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है । सुतरां संयोगजसंयोग का मानना आवश्यक है । (१) नोदन और (२) अभिघात संयोग के ये दो और प्रकार भी हैं । जिस संयोग से शब्द की उत्पत्ति न हो उसे 'नोदन' कहते हैं । एवं इसके विपरीत जिस संयोग से शब्द की उत्पत्ति हो उसे 'अभिघात' कहते हैं । विभाग संयोग को विनष्ट करनेवाले गुण का नाम 'विभाग' है । संयोग की तरह यह भी (१) एक क्रिया से उत्पन्न, (२) दो क्रियाओं से उत्पन्न और (३) विभाग से उत्पन्न भेद से तीन प्रकार का है । पर्वत से पक्षी का विभाग केवल पक्षी में रहनेवाली क्रिया से ही उत्पन्न होता है । परस्पर गुथे हुए दो पहलवानों का विभाग दोनों पहलवानों में से प्रत्येक में रहनेवाली अलग-अलग दो क्रियाओं से उत्पन्न होता है । संयोगजसंयोग की तरह 'विभागजविभाग' का भी मानना आवश्यक है; क्योंकि किसी व्यक्ति के हाथ का संयोग अगर किसी वृक्ष के साथ था और हाथ की क्रिया से उस संयोग के छूट जाने पर वृक्ष से हाथ का विभाग हो जाता है । हाथ और वृक्ष के इस विभाग के उत्पन्न होने पर वृक्ष से शरीर के विभाग की भी प्रतीति होती है । शरीर और वृक्ष का विभाग अगर क्रिया से उत्पन्न होगा तो फिर शरीर को क्रिया से या वृक्ष की क्रिया से अथवा दोनों की क्रिया से ही उत्पन्न हो सकता है । प्रकृत में क्रिया केवल हाथ में ही है, पूरे शरीर में नहीं । वृक्ष में तो है ही नहीं । हाथ अवयव है शरीर अवयवी, अतः दोनों भिन्न हैं । सुतरां घट की क्रिया से जैसे कि पट और दण्ड का विभाग उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार हाथ की क्रिया से शरीर और वृक्ष का भी विभाग नहीं उत्पन्न हो सकता । अतः हाथ और वृक्ष का विभाग हो शरीर और वृक्ष के विभाग का कारण है । अतः विभागजविभाग का मानना आवश्यक है । इसी हेतु से विभाग को संयोगध्वंस रूप न मानकर स्वतन्त्र गुणरूप भाव पदार्थ मानना पड़ता है । अगर ऐसा न मानें अर्थात् विभाग को संयोगध्वंस रूप ही मानें तो हाथ और तरु के विभाग के बाद जो शरीर और तरु के विभाग की प्रतीति होती है, वह नहीं हो सकेगी; क्योंकि शरीर और तरु का विभाग शरीर और तरु के संयोग का ही
भूमिका २७ विनाश रूप होगा । शरीर में क्रिया है नहीं, क्रिया है हाथ में । हाथ की क्रिया से शरीर के संयोग का विनाश कैसे होगा ? हाथ की क्रिया से जिस संयोग-विनाश की उत्पत्ति होगी वह तो हाथ में ही रहेगी, शरीर में नहीं । अतः विभाग संयोग का अभावरूप नहीं है; किन्तु गुणरूप भाव ही है । विभाग को भावरूप मान लेने से प्रतीतियों की उपपत्ति दिखलायी जा चुकी है । विभागजविभाग भी दो प्रकार का है-(१) कारणमात्रजन्य और (२) समवायि- कारणविभागजन्य । जिस विभाग की उक्त होगी, उस विभाग के समवायि- कारणीभूत द्रव्यों के ही विभाग से जो विभाग उत्पन्न हो उसे 'कारण- मात्रविभागजन्य विभाग' कहते हैं । घट-नाश से लेकर उसके उत्पादक कर्मनाश पर्यन्त के पर्यालोचन से यहाँ की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी । उसका यह क्रम है कि . पहले घट के अवयव रूप दोनों कपालों में क्रिया (हलचल) की उत्पत्ति होती है । फिर घट के उत्पादक दोनों कपालों में विभाग उत्पन्न होता है । कपालों के इस विभाग से घट के उत्पादक कपालों के संयोग का नाश होता है । चूँकि कपालों का संयोग घट का असमवायिकारण है, अतः इसके नाश से घट का नाश होता है । तब तक कपालों में क्रिया रहती ही है । घट-नाश के बाद कर्म से युक्त उन कपालों का संयोग पहले के जिस देश के आकाश के साथ था, उस देश से कपालों का विभाग उत्पन्न होता है । आकाश के साथ कपालों के इस विभाग का असमवायिकारण पहले कहा गया दोनों कपालों का क्रियाजनित विभाग ही है । पूर्व देशों के आकाश से एक-दूसरे से विभक्त दोनों कपालों का यह विभाग ही "कारणमात्रविभागजन्य विभागजविभाग" है; क्योंकि इस विभाग के समवायि- कारण दोनों कपाल और पूर्वदेशों का आकाश है । अतः दोनों कपाल भी इस विभाग के समवायिकारण हैं । अतः प्रकृत विभाग के समवायिकारणीभूत केवल दोनों कपालों के विभाग से ही वह उत्पन्न होता है, किन्हीं और द्रव्यों के विभाग से नहीं । इसके बाद विभागजविभाग से कपालों का जिस पूर्वदेश के साथ पहले संयोग था, उस संयोग का नाश होता है । फिर दूसरे देशों के आकाश (उत्तरदेश) के साथ इन विभक्त कपालों का संयोग होता है । कपालों की उस क्रिया का नाश होता है, जिससे दोनों कपालों का विभाग उत्पन्न हुआ था । इस प्रसङ्ग में इन दो विषयों को भी समझना आवश्यक है-(१) जिस क्रिया से कपालों का परस्पर विभाग उत्पन्न होता है, उस क्रिया से ही विभक्त कपालों के पूर्वदेश के आकाश के साथ कथित विभाग की उत्पत्ति क्यों नहीं मानते ? क्योंकि क्रिया में विभाग की हेतुता स्वीकृत है । एवं क्रिया की सत्ता इस विभाग के कई
२८ प्रशस्तपादभाष्यम् क्षणों बाद तक रहती है । फिर विभाग में विभाग की हेतुता की नयी कल्पना क्यों की जाती है ? दूसरी बात यह है कि अगर उक्त दूसरे विभाग की उत्पत्ति विभाग से ही मान भी लें तो यह पहला विभाग दूसरे विभाग का असमवायिकारण ही होगा । असमवायिकारण का संचलन हो जाने पर कार्य की उत्पत्ति में कोई बाधा नहीं रह जाती है । फिर अवयवों के विभाग के बाद ही अवयवी के नाश से पूर्व ही उक्त दूसरे देश के साथ अवयवों का (विभागज) विभाग क्यों नहीं उत्पन्न हो जाता ? इसके लिए घट के उत्पादक संयोग का विनाश और घट का विनाश इन दो कार्यों के लिए अपेक्षित दो क्षणों का विलम्ब सहने की क्या आवश्यकता है ? इन दोनों में प्रथम प्रश्न का यह समाधान है कि अगर उक्त दूसरे विभाग को भी क्रियाजन्य मानें तो कमल खिलने की अपेक्षा विनष्ट ही हो जाएँगे; क्योंकि संयोग दो प्रकार के हैं । एक संयोग से अवयवी की उत्पत्ति होती है, जैसे दोनों कपालों का कथित संयोग । इसे 'आरम्भक' संयोग कहते हैं, क्योंकि यह संयोग घटरूप अवयवी द्रव्य का 'आरम्भक' अर्थात् 'उत्पादक' है । दूसरा संयोग है अनारम्भक संयोग, जैसे विभक्त कपालों का दूसरे देश के आकाश के साथ संयोग । इससे किसी द्रव्य की उत्पत्ति नहीं होती है । अतः इसे 'अनारम्भक' संयोग कहते हैं । फलतः वे दोनों संयोग परस्पर विरोधी हैं, अतः एक क्रियारूप कारण से उन दोनों की उत्पत्ति नहीं हो सकती । अगर इसे मानने का हठ करें तो फूलते हुए कमल के विनाश की उक्त आपत्ति होगी; क्योंकि कमल के पत्रों का ऊपर की ओर जो परस्पर संयोग है, यह कमल का उत्पादक संयोग नहीं है । उस संयोग को नष्ट करनेवाला विभाग ही कमल का फूलना है । जो सूर्य-किरणों के संयोग से उत्पन्न होनेवाली पत्रों की क्रिया से होता है । कमल के पत्रों का ही नीचे की ओर डण्डी के ऊपर अंश में भी परस्पर संयोग है । जो कमल का उत्पादक संयोग है । इस संयोग का विनाश उन रविकिरणों के उक्त क्रियाजनित विभाग से नहीं होता है । यदि आग्रहवश ऐसा मानें तो कमल का विनाश मानना पड़ेगा; क्योंकि अवयवों का विशेष प्रकार संयोग ही अवयवी का उत्पादक है एवं उक्त संयोग का विनाश ही अवयवी का विनाशक है । तस्मात् अवयवियों के उत्पादक संयोग के विनाशक विभाग और उक्त संयोग के अविनाशक विभाग दोनों की उत्पत्ति एक क्रिया से नहीं हो सकती । अतः प्रकृत में कपालों के संयोग को नष्ट करनेवाले विभाग की उत्पत्ति क्रिया से मानते हैं और उन्हीं विभक्त कपालों के पूर्वदेशसंयोग के विनाशक विभाग की उत्पत्ति कपालों के उक्त विभाग से मानते हैं । अतः विभागजविभाग का मानना आवश्यक है ।
भूमिका २९ दूसरे प्रश्न का यह समाधान है कि कथित आरम्भकर संयोग के विरोधी विभाग से युक्त अवयवों का दूसरे आकाशादि देशों के साथ तब तक संयोग नहीं हो सकता जब तक कि अवयवी विनष्ट नहीं हो जाता । अतः क्रिया से विभाग, विभाग से पूर्व (आरम्भक) संयोग का नाश, संयोग के इस नाश से घट का नाश जब हो जाएगा तभी घट के उत्पादक उक्त विभक्त कपालों का दूसरे देशों के साथ संयोग उत्पन्न हो सकता है । अतः उक्त रीति माननी पड़ती है । परत्व और अपरत्व परत्व और अपरत्व ये दोनों ही दैशिक और कालिक भेद से दो-दो प्रकार के हैं । एक वस्तु से दूसरी वस्तु की दूरी दैशिक परत्व है और एक वस्तु का दूसरे वस्तु से समीप होना दैशिक अपरत्व है । ये दोनों ही आपेक्षिक हैं, अतः अपेक्षाबुद्धि ही इनकी कारण है और तीसरी अवधि की भी अपेक्षा होती है । जैसे कि पटना से काशी की अपेक्षा प्रयाग दूर है एवं पटना से प्रयाग की अपेक्षा काशी समीप है । कालिक परत्व का ही दूसरा नाम ज्येष्ठत्व है । एवं कालिक अपरत्व का ही दूसरा नाम कनिष्ठत्व है । कालिक परत्व और अपरत्व भी आपेक्षिक हैं; क्योंकि जो कोई व्यक्ति एक व्यक्ति से ज्येष्ठ होता है, वही अपने से पूर्ववर्त्ती की अपेक्षा कनिष्ठ भी होता है । एवं जो कोई व्यक्ति एक व्यक्ति से कनिष्ठ होता है, वही अपने से पश्चाद्वर्त्ती की अपेक्षा ज्येष्ठ भी होता है । अतः इनमें भी अपेक्षाबुद्धि की आवश्यकता होती है । अतः अपेक्षाबुद्धि के नाश से इनका नाश होता है । परत्व और अपरत्व दोनों ही बुद्धिसापेक्ष हैं । अतः इनके निरूपण के बाद ही आकर-ग्रन्थों में बुद्धि का निरूपण किया गया है । तदनुसार मैं भी अब बुद्धि का निरूपण प्रारम्भ करता हूँ । बुद्धि के निरूपण में नव्यन्याय की दृष्टि से भी कुछ विषयों को समझाने का मैंने प्रयास किया है । बुद्धि संसार के सभी व्यवहारों के मूल में बुद्धि ही काम करती है । संक्षेपतः (१) प्रमा (विद्या) और (२) अप्रमा (अविद्या) इसके दो भेद हैं । इनमें अप्रमा के (१) संशय, (२) विपर्यय, (३) अनध्यवसाय और (४) तर्क, ये चार भेद हैं । ज्ञान या बुद्धि को अच्छी तरह से समझने के लिए उसके विशिष्ट स्वरूप के प्रत्येक अंश को अच्छी तरह समझ लेना आवश्यक है । नैयायिकों और वैशेषिकों के मत में ज्ञान किसी विषय का ही होता है । बिना विषय के ज्ञान नहीं होते । ज्ञान में भासित होनेवाले विषय (१) विशेषण, (२) विशेष्य और (३) उन दोनों
३० प्रशस्तपादभाष्यम् के संसर्ग, ये तीन प्रकार के हैं । 'विषय' का एक चौथा प्रकार भी है जो निर्विकल्पक ज्ञान में भासित होता है । 'घटवद्भूतलम्' इस ज्ञान में मुख्यतः घट विशेषण है और भूतल विशेष्य है एवं संसर्ग वह संयोग है, जिसके कारण भूतल में घट का रहना सम्भव होता है । वैसे तो इसी ज्ञान में घट में घटत्व भी भासित होता है । अतः घटत्व भी विशेषण है और घट भी विशेष्य है एवं इन दोनों का समवाय भी संसर्ग है । इसी प्रकार भूतल में भूतलत्व और संयोग में संयोगत्व के भान होने के कारण भूतलत्व संयोगत्वादि और भी विशेषण हैं एवं घट, भूतलादि और भी विशेष्य हैं । किन्तु ये गौण हैं । विशेषण को ही 'प्रकार' कहते हैं । ज्ञान के इन विषयों में ज्ञानीय 'विषयता' नाम का एक धर्म है, जो विषयों के प्रकारविशेष्यादि के विभेदों के कारण (१) प्रकारता, (२) विशेष्यता और (३) संसर्गता भेद से तीन प्रकार का है । निर्विकल्पक ज्ञान के चौथे प्रकार के विषयों में रहनेवाली इन तीनों विषयताओं से भिन्न एक चौथी विषयता भी है । उक्त प्रकारता ही उस स्थिति में प्रायशः विधेयता कहलाती है, जिसमें कि उसका आश्रय पहले ज्ञात न हो । विशेष्यता ही स्थिति विशेष में उद्देश्यता कहलाती है । ऊपर जिस संसर्ग की चर्चा की गयी है वह विभिन्न दो व्यक्तियों में क्रमशः विशेष्यविशेषणभाव का सम्पादक वस्तु विशेष रूप है, 'दण्डी पुरुषः' इत्यादि स्थलों में चूँकि दण्ड का संयोग संसर्ग या सम्बन्ध पुरुष में है, इसीलिए दण्ड विशेषण है और पुरुष विशेष्य है । सम्बन्ध (१) साक्षात् और (२) परम्परा भेद से दो प्रकार का है । साक्षात् सम्बन्ध संयोग समवाय स्वरूपादि भेद से अनेक प्रकार के हैं । जिस सम्बन्ध के निर्माण में दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता हो, उसे परम्परा सम्बन्ध कहते हैं । यह अनन्त प्रकार का हो सकता है । इसकी कोई संख्या निर्णित नहीं हो सकती । यह सम्बन्ध ऐसे दो वस्तुओं का भी हो सकता है, जिन्हें साधारण सम्बन्ध से कभी परस्पर सम्बद्ध होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती । (१) वृत्तिनियामक और (२) वृत्तिता का अनियामक भेद से सम्बन्ध दो प्रकार का है । जिस सम्बन्ध से आधार-आधेयभाव की प्रतीति हो, उसे 'वृत्तिता का नियामक' सम्बन्ध कहते हैं । ये संयोग समवायादि नियमित प्रकार के ही हैं । जिससे दो सम्बन्धियों में केवल सम्बद्ध मात्र होने की प्रतीति हो, उसे वृत्तिता का अनियामक सम्बन्ध कहते हैं । जिस ज्ञान के विशेष्य में विशेषण की सत्ता वस्तुतः रहे, उसी ज्ञान को 'प्रमा' कहते हैं । यथार्थ चाँदी में जो 'इदं रजतम्' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है, वह 'प्रमा' ज्ञान है; क्योंकि ज्ञान का विशेष्य या उद्देश्य है चाँदी (रजत), उसमें रजतत्व रूप विशेषण की या प्रकार की वस्तुतः सत्ता है, अतः उक्त ज्ञान 'प्रमा' है । किस वस्तु में किस वस्तु की यथार्थ सत्ता है ? इस प्रश्न का यह समाधान है कि
भूमिका ३१ जिस विशेष्य में विशेषण के सम्बन्ध की सत्ता रहे, उसी विशेष्य में विशेषण की यथार्थ सत्ता है । प्रकृत उदाहरण के रजत रूप विशेष्य में रजतत्व जाति का समवाय सम्बन्ध है, अतः रजतत्व की सत्ता रजत में है । शुक्तिका में जो 'इदं रजतम्' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है, वह 'प्रमा' इसलिए नहीं है कि इस ज्ञान के विशेष्य शुक्तिका में रजतत्व का समवाय नहीं है । अतः शुक्तिका में रजतत्व का ज्ञान प्रमा न होकर 'अप्रमा' है । फलतः प्रमा के विपरीत अर्थात् जिस ज्ञान के विशेष्य में विशेषण की सत्ता न रहे, उस ज्ञान को ही 'अप्रमा' या अविद्या या भ्रम कहते हैं । अयथार्थ ज्ञान के भेदादि इस ग्रन्थ में विस्तृत रूप से वर्णित हैं । कथित प्रमाज्ञान या यथार्थज्ञान के दो भेद हैं-(१) प्रत्यक्ष और (२) अनुमिति । शब्दादिजन्य जितने भी प्रमाज्ञान हैं वे सभी प्रायः अनुमिति में ही अन्तर्भूत हैं । फलतः प्रमाकरण भी, अर्थात् प्रमाण भी (१) प्रत्यक्ष और (३) अनुमान भेद से दो ही प्रकार के हैं । शब्दादि जितने भी प्रकार के प्रमाज्ञान हैं, वे सभी इन्हीं दोनों में से किसी करण से उत्पन्न होते हैं । प्रत्यक्ष शब्द 'प्रति' शब्द और 'अक्ष' शब्द से 'प्रतिगतम् अक्षि' या अक्ष्यक्षि प्रति वर्त्ततं इन दोनों व्युत्पत्तियों के द्वारा निष्पन्न होता है । प्रकृत में अर्थ के साथ सम्बद्ध इन्द्रिय ही प्रत्यक्ष शब्द से अभीष्ट है । अर्थात् विषय के साथ सम्बद्ध इन्द्रिय ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । इस प्रमाण के द्वारा उत्पन्न यथार्थ ज्ञान ही 'प्रत्यक्ष' रूप प्रमिति है । फलतः इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से जो यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो, वह है प्रत्यक्ष-प्रमिति और इस प्रमिति का कारण ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । प्रत्यक्ष के प्रसङ्ग में और विशद विवेचन इस ग्रन्थ में देखना चाहिए । 'अनु'पूर्वक 'मा' धातु से अनुमान शब्द बना है । 'अनु' शब्द का अर्थ है पश्चात् । 'पश्चात्' शब्द अपने अर्थबोध के लिए किसी और अवधि की आकांक्षा रखता है । प्रकृत में वह अवधि है 'लिङ्गपरामर्श', अर्थात् लिङ्गपरामर्श के पश्चात् ही जो ज्ञान उत्पन्न हो उसे 'अनुमिति' कहते हैं । इसी दृष्टि से 'परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः' इस प्रकार के अनुमिति के लक्षण मिलते हैं । व्याप्तिज्ञान और पक्षधर्मताज्ञान इन दोनों से परामर्श उत्पन्न होता है । हेतु के आश्रय में साध्य नियमित रूप से रहना ही व्याप्ति है । पक्ष में हेतु का रहना ही पक्षधर्मता है । 'साध्यव्याप्यो हेतुः' यही व्याप्तिज्ञान का आकार है और 'हेतुमान् पक्षः' यह पक्षधर्मताज्ञान का आकार है । अतः मिलकर इन दोनों से उत्पन्न परामर्श का स्वभावतः 'साध्यव्याप्यहेतुमान् पक्षः' यह आकार होता है । इस परामर्श को ही 'तृतीयलिङ्गपरमर्श' भी कहते हैं । इस दृष्टि से पक्षधर्मता-ज्ञान हेतु का प्रथम ज्ञान है और व्याप्तिविशिष्टहेतु का ज्ञान हेतु का दूसरा ज्ञान है, व्याप्ति और पक्षधर्मता
३२ प्रशस्तपादभाष्यम् इन दोनों रूपों से हेतु का परामर्श रूप तीसरा ज्ञान होता है, अतः उसे "तृतीय लिङ्गपरामर्श" कहते हैं । इसके बाद ही अनुमिति की उत्पत्ति होती है । पक्षता इस प्रसङ्ग में एक विचार उठता है कि प्रायः सभी ज्ञान दो क्षणों तक रहते हैं, तीसरे क्षण में उनका विनाश होता है । कथित परामर्श भी ज्ञान है, अतः वह भी दो क्षणों तक रहेगा । जिस क्षण में वह उत्पन्न होगा, उसके अव्यवहित उत्तरक्षण में जिस प्रकार की अनुमिति को उत्पन्न करेगा, इस अनुमिति के अगले क्षण में भी उसी प्रकार की अनुमिति को वह क्यों नहीं उत्पन्न करता ? क्योंकि कथित दूसरी अनुमिति के अव्यवहित पूर्वक्षण में अर्थात् पहली अनुमिति के उत्पत्तिक्षण में परामर्श की सत्ता है । एवं परामर्श अनुमिति का अन्यनिरपेक्ष कारण है । परामर्श संवलन के बाद अनुमिति के लिए और किसी की अपेक्षा नहीं रह जाती । सुतरां परामर्श अगर अपने उत्पत्तिक्षण के अव्यवहित उत्तरक्षण में जिस विषय की जिस आकार-प्रकार की अनुमिति को उत्पन्न करेगा, उसी आकार-प्रकार की उसी विषय की दूसरी अनुमिति को भी अपने स्थितिक्षण के अव्यवहित उत्तरक्षण में फलतः पहली अनुमिति के अव्यवहित उत्तरक्षण में उत्पन्न करने में कोई बाधा तो नहीं है ? किन्तु ऐसी बात होती नहीं है । अनुमान को जितने माननेवाले दार्शनिक हैं, उनमें से कोई भी एक आकार-प्रकार की अनुमिति के रहते हुए उसी आकार-प्रकार की दूसरी अनुमिति की सत्ता को स्वीकार नहीं करते; किन्तु किसी की स्वीकृति और अस्वीकृति मात्र पर वस्तु के सामर्थ्य को अन्यथा नहीं किया जा सकता । फलतः एक अनुमिति रूप सिद्धि के रहते हुए परामर्श के रहने पर भी दूसरी अनुमिति न हो सके, इसके लिए परामर्श के समान ही अनुमिति का एक और साक्षात् कारण माना गया है, जिसका नाम है 'पक्षता' । इसका ऐसा स्वरूप या लक्षण होना चाहिए, जिससे एक अनुमिति या अन्य किसी प्रकार की सिद्धि के रहते हुए कथित दूसरी अनुमिति की आपत्ति न हो सके। इसी प्रयोजन को सामने रखकर पक्षता के अनेकलक्षण किये गये हैं । जैसे कि (१) साध्य का संशय ही पक्षता है । (२) अनुमित्सा ही पक्षता है । (३) अथवा अनुमित्सा की योग्यता पक्षता है । (४) सिद्धि का अभाव ही पक्षता है । पक्षता के इन सभी लक्षण करनेवालों की यही दृष्टि रही है कि अनुमिति या अन्य किसी भी प्रकार की सिद्धि के रहते हुए उक्त प्रकार के लक्षणों से आक्रान्त किसी भी पक्षतारूप कारण का रहना सम्भव न हो; क्योंकि सभी के साथ सिद्धि का विरोध है । अतः सिद्धि के रहते हुए पक्षतारूप कारण का संवलन सम्भव ही नहीं है । अतः एक अनुमिति के बाद दूसरी अनुमिति की आपत्ति नहीं दी जा सकती ।
भूमिका ३३ पक्षता के ये जितने भी लक्षण कहे गये हैं, उन सभी लक्षणों का तत्त्वचिन्ता- मणिकार ने खण्डन किया है । खण्डन की युक्तियों को विस्तृत रूप से चिन्तामणि के पक्षता प्रकरण में देखना चाहिए । संक्षेप में तत्त्वचिन्तामणिकार कहना है कि एक अनुमिति के रहते हुए परामर्शादि सभी कारणों के रहने पर भी जब दूसरी अनुमिति नहीं होती है, तो पहली अनुमिति या सिद्धि को दूसरी अनुमिति का प्रतिबन्धक मानना पड़ेगा; क्योंकि और सभी कारणों के रहने पर भी जिसके रहते कार्य उत्पन्न न हो सके, उसे ही कार्य का प्रतिबन्धक कहा जाता है । प्रतिबन्धक का अभाव भी कार्य का एक कारण ही है । अतः प्रकृत में सिद्धि का भी अभाव भी अनुमिति का एक कारण है । जिसके चलते एक अनुमिति के बाद तुरन्त दूसरी अनुमिति नहीं हो पाती । अतः सिद्धि का अभाव ही पक्षता है; किन्तु कभी-कभी एक सिद्धि के रहते हुए भी विषय को विशेष प्रकार की जानने की इच्छा से तुरन्त दूसरी अनुमिति होती है । जैसे कि आत्मा को विशेष प्रकार से सजाने की इच्छा से आत्मा के श्रवण रूप सिद्धि के बाद भी मनन (अनुमिति) का विधान 'आत्मा वारे श्रोतव्यो मन्तव्यः' इत्यादि श्रुतियों के द्वारा किया गया है । अगर जिस किसी भी प्रकार की भी सिद्धि के रहने पर दूसरी अनुमिति के रूप सिद्धि बिलकुल ही नहो, तो फिर उक्त विधान असङ्गत हो जाएगा । अतः इतना इसमें जोड़ना आवश्यक है कि विशेष प्रकार की अनुमिति या सिद्धि की इच्छा रहने पर एक सिद्धि के रहने पर भी दूसरी अनुमिति होती है । अतः सामान्य रूप से सभी सिद्धियाँ अनुमिति की विरोधिनी नहीं हैं; किन्तु अनुमिति की इच्छा से असंश्लिष्ट अथवा यों कहिये कि सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि ही अनुमिति की विरोधिनी है । फलतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त जो सिद्धि, उसका अभाव ही अनुमिति का पक्षतारूप कारण हैं । इसको समझने के लिए अनुमिति की इन तीन स्थितियों को समझना आवश्यक है-(१) जहाँ परामर्श के बाद केवल अनुमितिरूप सिद्धि रहेगी, वहाँ उस सिद्धि के अव्यावहित उत्तर क्षण में अनुमिति नहीं होगी; क्योंकि यहां कथित पक्षतारूप कारण नहीं है । यहाँ सिद्धि अनुमित्सा या सिषाधयिषा से युक्त नहीं है, सिषाधयिषा के विरह से युक्त है । अतः यह सिद्धि अनुमिति का प्रतिबन्धक है । सुतरां प्रतिबन्धकाभावरूप कारण या कथित पक्षतारूप कारण के न रहने से अनुमिति का प्रतिरोध होता है । (२) जहाँ परामर्शादि कारणों के साथ अगर सिषाधयिषा भी है तो फिर उक्त परामर्शजनित अनुमितिरूप सिद्धि के बाद पुनः अनुमिति होगी; क्योंकि यह अनुमितिरूप सिद्धि सिषाधयिषा से युक्त नहीं है, अतः सिषाधयिषा के विरह से
प्रकरणसम, (४) साध्यसम और (५) कालात्ययापदिष्ट भेद से पाँच प्रकारों का
३४ प्रशस्तपादभाष्यम् युक्त नहीं है । अतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त न होने के कारण यह सिद्धि अनुमिति की प्रतिबन्धक कोई दूसरी सिद्धि है, जिसमें सिषाधयिषा का सम्बन्ध नहीं है । उसका यहाँ अभाव है, अतः पक्षतारूप कारण के रहने से अनुमिति होगी । (३) जहाँ सिद्धि नहीं वहाँ सिषाधयिषा रहे या न रहे-दोनों ही स्थितियों में अनुमिति होगी ही; क्योंकि यहाँ कोई भी सिद्धि नहीं है, अतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि भी नहीं है । सुतरां सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि का अभाव भी अवश्य है । अतः अनुमिति होगी । विस्तृत ज्ञान के लिए अध्यापकों का साहाय्य अपेक्षित है । हेत्वाभास किसी भी विषय के तत्व को अनुमान के द्वारा समझने के लिए जिस प्रकार हेतुवों को समझना आवश्यक है, उसी प्रकार जो हेतु नहीं हैं, किन्तु हेतु की तरह दीखते हैं, उन हेत्वाभासों को भी समझना आवश्यक है । अगर ऐसा न मानें तो हेतुवों और हेत्वाभासों के सम्मिश्रण से कदाचित् अतत्व भी तत्व की तरह प्रतिभात अन्त में अभीष्ट प्रवृत्ति को विफल कर देंगे और अनभीष्ट स्थिति में भी डाल देंगे । अतः हेतुवों की तरह विशेष रूप से आचार्यों ने हेत्वाभासों का भी निरूपण किया है । 'हेत्वाभास' शब्द दो व्युत्पत्तियों से निष्पन्न होता है-(१) हेतोराभासा हेत्वाभासाः और (२) हेतुवदाभासन्ते इति हेत्वाभासाः । इनमें पहली व्युत्पत्ति के अनुसार हेत्वाभास शब्द का अर्थ होता है 'हेतु का दोष' । महर्षि गौतम ने हेत्वाभासों को (१) सव्यभिचार, (२) विरुद्ध, (३) प्रकरणसम, (४) साध्यसम और (५) कालात्ययापदिष्ट भेद से पाँच प्रकारों का माना है और सव्यभिचार हेत्वाभास को समझाने के लिए 'अनैकान्तिकः सव्यभिचारः' इस सूत्र की रचना की है । जो हेतु साध्य या साध्याभाव इन दोनों में से किसी एक के साथ नियमित रूप से सम्बद्ध न हो, वही हेतु 'अनैकान्तिक' है । अर्थात् जो हेतु साध्य और साध्याभाव दोनों के साथ रहे, केवल साध्य के ही साथ न रहे, वही हेतु 'अनैकान्तिक' है । सव्यभिचारशब्द के अर्थ की आलोचना से भी इसी अर्थ की पुष्टि होती है । 'व्यभिचारेण सहितः सव्यभिचारः' इस व्युत्पत्ति से सव्यभिचार शब्द बना है । 'व्यभिचार' शब्द 'वि' 'अभि' और 'चार' इन तीन शब्दों से बना है । इनमें 'वि' शब्द विरुद्धार्थक है और 'अभि' शब्द उभयार्थक है । 'चार' शब्द सम्बन्ध का बोधक है । इसके अनुसार परस्पर विरोधी दो वस्तुओं के साथ अर्थात् साध्य और साध्याभाव के साथ किसी आश्रय
भूमिका ३५ में हेतु का रहना ही व्यभिचार है। यह व्यभिचार अर्थात् साध्याधिकरण और साध्याभावाधिकरण दोनों में समान रूप से रहना जिस हेतु का हो, वही 'सव्यभिचार' है। साध्य के साथ नियत सम्बन्ध ही हेतु की व्याप्ति है। इस व्याप्ति के बल से ही हेतु साध्य का ज्ञापक होता है। जो हेतु उक्त प्रकार से सव्यभिचार या अनैकान्तिक होगा वह कभी कथित रीति से व्याप्तियुक्त नहीं हो सकता। अतः व्यभिचारयुक्त हेतु 'सव्यभिचार' नाम का हेत्वाभास है, हेतु नहीं। किन्तु बाद में सूक्ष्म निरूपण से यह निष्पन्न हुआ कि व्याप्ति का उक्त स्वरूप ठीक नहीं है; किन्तु हेतु के नियत सम्बन्ध से युक्त साध्य के साथ सपक्षों में हेतु का रहना ही हेतु की व्याप्ति है। इस प्रकार व्याप्तिशरीर के दो अंश माने गये, एक तो साध्य में हेतु का नियत सम्बन्ध अर्थात् व्यापकत्व, दूसरा हेतु के व्यापकीभूत साध्य का सपक्षों में हेतु के साथ रहना अर्थात् सामानाधिकरण्य। इस स्थिति में साध्य में हेतु के व्यापकत्ववाला जो अंश है, उसका विरोध परोक्ष रूप से ही सही, कथित व्यभिचार करेगा; क्योंकि जो हेतु साध्य और साध्याभाव दोनों के साथ रहेगा, उस हेतु की व्यापकता उस साध्य में नहीं जा सकती। व्यापक होने के लिए यह आवश्यक है कि व्याप्य के अधिकरण में व्यापक का अभाव न रहे। कथित व्यभिचारी हेतु के आश्रय में तो साध्य का अभाव रहता है। अतः साध्य कभी भी व्यभिचारी हेतु का व्यापक नहीं हो सकता। इस प्रकार व्याप्ति के उक्त स्वरूप मानने के पक्ष में भी कथित व्यभिचार दोष से युक्त हेतु अवश्य ही सव्यभिचार हेत्वाभास होगा। किन्तु उक्त व्याप्तिशरीर का एक अंश और है 'व्यापकीभूत साध्य का हेतु के साथ सपक्षों में रहना'। इस अंश को विघटित करनेवाला दोष भी अगर हेतु में रहेगा तो भी वह 'व्यभिचार' दोष से ही युक्त होने के कारण 'सव्यभिचार' हेत्वाभास होगा; क्योंकि सामान्यतः व्याप्ति का विघटन ही व्यभिचार होता है। व्याप्ति के उक्त द्वितीय अंश का विघटन दो प्रकारों से सम्भव है। जिस स्थल में कोई सपक्ष या विपक्ष नहीं है, वहाँ साध्य का हेतु के साथ सपक्ष में रहना सम्भव नहीं होगा; क्योंकि वहाँ कोई सपक्ष ही नहीं है। एवं जहाँ संसार के सभी पदार्थ-पक्ष होंगे, वहाँ भी सपक्ष का मिलना सम्भव नहीं होगा। अतः ऐसे स्थलों में भी हेतु के साथ साध्य का सामानाधिकरण्य सपक्ष में सम्भव नहीं होगा। पहले का उदाहरण है 'शब्दो नित्यः शब्दत्वात्'। यहाँ शब्दत्व हेतु केवल शब्द में ही है। शब्द ही पक्ष है। पक्ष में साध्य अनिर्णीत रहता है। सपक्ष में साध्य और हेतु दोनों को पहले से निश्चित रहना चाहिए। नित्यत्व निर्णीत है आकाशादि में, वहाँ शब्दत्व हेतु नहीं है। शब्दत्व निर्णीत है शब्द में, वहाँ नित्यत्व रूप साध्य ही
३६ प्रशस्तपादभाष्यम् निर्णीत नहीं है । अतः ऐसे स्थलों में सपक्ष न मिलने के कारण सपक्ष में साध्य और हेतु का सामानाधिकरण्य सम्भव न होने से व्याप्ति सम्भव नहीं होगी । अतः शब्दत्व हेतु में भी सव्यभिचार हेत्वाभास होगा; किन्तु नित्यत्व रूप साध्य का अभाव निर्णीत है घटादि अनित्य वस्तुओं में, यहाँ शब्दत्व भी नहीं है । अतः पूर्व कथित व्यभिचार दोष यहाँ सम्भव नहीं है । सुतरां यहाँ नित्यत्व हेतु का केवल पक्ष में रहना, किसी सपक्ष या विपक्ष में न रहना ही व्याप्ति का विघटक है । इसको 'असाधारण' नाम का व्यभिचार कहते हैं; क्योंकि यह हेत्वाभास साध्य के अधिकरण और साध्याभाव के अधिकरण दोनों में साधारण रूप से (सामान्य रूप से) नहीं है, जैसे कि साधारण हेत्वाभास रहता है । यह शब्दत्व हेतु केवल शब्द- रूप पक्ष में ही है, अतः उक्त शब्दत्व हेतु 'असाधारण' नाम का सव्यभिचार है । इसी प्रकार जिस स्थल में संसार के सभी वस्तु पक्ष होंगे-जैसे 'सर्वमभिधेयं प्रमेयत्वात्', ऐसे स्थलों के हेतु में भी उक्त सामानाधिकरण्य संभव नहीं होगा; क्योंकि प्रकृत स्थल में संसार के सभी वस्तु पक्ष के अन्तर्गत आ गये हैं । सपक्ष के लिए कोई नहीं बचा है । सपक्ष को पक्ष से भिन्न होना चाहिए । अतः ऐसे स्थलों में भी हेतु के व्यापक साध्य का किसी सपक्ष में हेतु के साथ रहना सम्भव नहीं होगा । अतः इस प्रकार के हेतुवों में भी व्याप्ति नहीं रह सकती । फलतः व्यभिचार रहेगा; किन्तु कथित साधारण या असाधारण व्यभिचार यहाँ सम्भव नहीं है । अतः 'अनुपसंहारी' नाम का अतिरिक्त ही व्यभिचार दोष माना गया है। जिससे उक्त हेतु 'अनुपसंहारी' नाम का तीसरा सव्यभिचार होगा । अतः तत्त्वचिन्तामणिकार ने अपने सव्यभिचार प्रकरण में लक्षण करने से भी पहले 'सव्यभिचारस्त्रिविधः संधारणासाधारणानुपसंहारिभेदात्' यह विभाग वाक्य ही लिखा है । यद्यपि सूत्र-भाष्यादि में इस त्रैविध्य की चर्चा नहीं है । फलितार्थ यह है कि सव्यभिचार (१) साधारण, (२) असाधारण और (३) अनुपसंहारी भेद से तीन प्रकार का है । इनमें जो हेतु साध्य और साध्याभाव दोनों के साथ रहे, उसे साधारण कहते हैं । जैसे कि 'धूमवान् वह्नेः' का वह्नि हेतु । वह्नि हेतु धूम के साथ भी महानसादि में है और धूमाभाव के साथ भी तप्त अयःपिण्डादि में है । जो हेतु केवल पक्ष में ही रहे, सपक्ष या विपक्ष में जो न रहे, उस हेतु को 'असाधारण' सव्यभिचार कहते हैं । जैसे कि 'शब्दो नित्यः शब्दत्वात्' इस अनुमान का शब्दत्व हेतु । यह शब्दत्व हेतु केवल शब्दरूप पक्ष में ही है । न आकाशादि सपक्षों में है और न घटादि विपक्षों में । अतः शब्दत्व हेतु 'असाधारण' सव्यभिचार है । जिस धर्म का सभी वस्तुओं में केवल अन्वय ही रहे, व्यतिरेक या अभाव किसी भी वस्तु में न रहे, उस धर्म को केवलान्वयि धर्म कहते हैं, केवलान्वयि धर्म जिस पक्ष का विशेषण (अवच्छेदक) हो उस पक्ष के
भूमिका ३७ अनुमान का हेतु भी 'व्यभिचारी' है; क्योंकि इस अनुमान में भी कोई सपक्ष नहीं हो सकता, चूँकि सभी पदार्थ पक्ष के अन्तर्गत आ जाते हैं। अतः उक्त अनुमान के हेतु का व्यापकत्व साध्य में रहने पर भी व्यापकीभूत वह साध्य किसी स पक्ष में हेतु के साथ नहीं रह सकता; क्योंकि वहाँ कोई सपक्ष ही नहीं है। जो हेतु साध्य के बदले साध्याभाव के साथ ही नियमित रूप से रहे, उस हेतु को 'विरुद्ध' हेत्वाभास कहते हैं। अर्थात् हेतु का साध्याभाव के साथ नियमित रूप से रहना 'विरोध' नाम का हेतुदोष है, जिस दोष से युक्त हेतु 'विरुद्ध' नाम का हेत्वाभास है। 'वि' अर्थात् विशेष रूप से साध्य की अनुमिति को जो 'रुन्ध' करे, अर्थात् साध्य के साथ नियत रूप से न रहकर साध्याभाव के साथ ही नियमित होकर व्यतिरेकव्याप्ति को विघटित करते हुए जो अनुमिति को विघटित करे, वही विरुद्ध नाम का हेत्वाभास है। नियमतः साध्य के साथ ही रहनेवाले हेत्वभाव का प्रतियोगित्व ही 'विरोध' दोष है, यह विरोध दोष से युक्त हेतु ही 'विरुद्ध' नाम का हेत्वाभास है। जैसे कि 'ह्रदो वह्निमान् जलात्' इस अनुमिति का जल हेतु 'विरुद्ध' हेत्वाभास है; क्योंकि जलरूप हेतु वह्निरूप साध्य के साथ न रहकर वह्नि के अभाव के साथ ही नियमित रूप से रहता है। अतः जलरूप हेतु का अभाव वह्नि का व्यापकीभूतत अभाव है, इस अभाव का प्रतियोगित्व कथित जल-हेतु में है। जिस प्रकार हेतु के साथ साध्य का नियमित रूप से रहना व्याप्ति का प्रयोजक है, उसी प्रकार साध्याभाव के साथ हेत्वभाव का नियमित रूप से रहना भी व्याप्ति का एक प्रयोजक है, जिसे व्यतिरेक व्याप्ति कहते हैं। साध्याभाव के साथ नियमित रूप से रहनेवाले (साध्याभाव-व्यापकीभूत) हेत्वभाव का प्रतियोगित्व ही व्यतिरेकव्याप्ति है। इस व्याप्ति के शरीर में साध्याभावव्यापकीभूताभाववाला जो अंश है, उसी को विरोध दोष अपने साध्याव्यापकीभूताभाववाले अंश के द्वारा विघटित कर व्यतिरेक व्याप्ति को विघटित कर देता है। इस विरोध दोष के प्रसङ्ग में एवं विरुद्ध हेत्वाभास के प्रसङ्ग में बाद में भी अधिक परिवर्तन नहीं हुआ। जिस हेतु के प्रयोग करने पर 'प्रकरण' की अर्थात् परस्पर विरुद्ध दो पक्षों की 'चिन्ता' अर्थात् संशय ही उपस्थित हो, उन दोनों पक्षों में से किसी भी एक पक्ष का निर्णय संभव न हो, वह हेतु अगर उन दोनों पक्षों में से किसी भी एक पक्ष के निर्णय के लिए प्रयुक्त हो, तो वह हेतु 'प्रकरणसम' नाम का हेत्वाभास होगा। शब्द में अनित्यत्व के साधन के लिए नैयायिक अगर 'नित्यधर्मानुपलब्धि' को हेतु रूप से उपस्थित करें तो उनका यह हेतु 'प्रकरणसम' नाम का हेत्वाभास होगा; क्योंकि प्रतिपक्षी मीमांसक भी तुल्य युक्ति से शब्द में नित्यत्व साधन के 'अनित्यधर्मानुपलब्धि' हेतु को उपस्थित कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में शब्द में
३८ प्रशस्तपादभाष्यम् अनित्यत्व या नित्यत्व का निर्णय नहीं होगा; किन्तु शब्द में नित्यत्व और अनित्यत्व का संशय ही होगा । अतः उक्त 'नित्यधर्मानुपलब्धि' या 'अनित्यधर्मानपलब्धि' रूप हेतु प्रकरणसम हेत्वाभास होगा । यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि उक्त विवरण के अनुसार साध्यधर्म की अनुपलब्धि को ही अगर हेतु रूप से उपस्थित किया जाएगा तो वह 'प्रकरणसम' हेत्वाभास होगा, और कोई हेतु प्रकरणसम नहीं होगा । किन्तु श्री वाचस्पति मिश्र ने तात्पर्यटीका में प्रकरणसम के उक्त लक्षण को असम्पूर्ण ठहराया है और प्रकरणसम को सत्प्रतिपक्ष का नामान्तर कहा है । 'सन् प्रतिपक्षो यस्य' इस व्यत्पत्ति के अनुसार जिस हेतु का प्रतिपक्ष अर्थात् विरोधी दूसरा हेतु रहे वही हेतु सत्प्रतिपक्ष दोष से ग्रस्त है । वादी अगर किसी पक्ष में किसी साध्य की सिद्धि के लिए एक हेतु का प्रयोग करता है, उसके बाद ही कोई प्रतिवादी अगर उसी पक्ष में उसी साध्य के अभाव की सिद्धि के लिए दूसरे हेतु का प्रयोग करता है, तो फिर ये दोनों हेतु सत्प्रतिपक्ष दोष से ग्रस्त समझे जायेंगे । अगर दोनों हेतु अर्थात् हेतु और प्रतिहेतु दोनों समान बल के हों । अर्थात् दोनों में व्याप्ति और पक्षधर्मता समान रूप से रहे, तो वे दोनों सत्प्रतिपक्ष दोष से ग्रसित होंगे और दोनों ही हेतु न होकर 'सत्प्रतिपक्ष' नाम के हेत्वाभास होंगे । इसी बात को दृष्टि में रखकर 'समानबलौ सत्प्रतिपक्षौ' यह लक्षणवाक्य प्रचलित हैं । इन दोनों हेतुओं में से अगर एक हेतु व्याप्ति और पक्षधर्मता से युक्त होने के कारण प्रबल रहेगा और दूसरा उन दोनों से रहित होने के कारण दुर्बल रहेगा तो फिर वहाँ सत्प्रतिपक्ष दोष नहीं होगा । दुर्बल हेतु में केवल व्यभिचार या स्वरूपासिद्धि दोष होगा और सबल हेतु से अभीष्ट अनुमिति ही जाएगी । प्राचीन नैयायिकों ने सत्प्रतिपक्ष को अनित्य दोष माना है । उन लोगों का अभिप्राय है कि जब तक कि हेतुलिङ्गक परामर्श और प्रतिहेतुलिङ्गक परामर्श इन दोनों में से किसी एक परामर्श के किसी भी अंश में भ्रमत्व का निश्चय नहीं हो जाता, तब तक ही उक्त दोनों हेतु सत्प्रतिपक्षित रहेंगे, उक्त भ्रमत्व निश्चय के बाद नहीं । अतः कुछ नियमित समय में ही रहने के कारण सत्प्रतिपक्ष अनित्य दोष है । इस मत में सद्धेतु स्थल में भी अगर विरोधी प्रतिहेतु का भ्रमात्मक परामर्श भी है, तो सद्धेतु भी तब तक सत्प्रतिपक्षित रहेगा, जब तक कि उक्त भ्रमात्मक विरोधी परामर्श का भ्रमत्व ज्ञात नहीं हो जाता । नव्य नैयायिकों के मत से सत्प्रतिपक्ष नित्य दोष हैं; क्योंकि किसी हेतु को सत्प्रतिपक्षित होने के लिए इतना ही आवश्यक है कि प्रकृत हेतु से जिस पक्ष में साध्य का साधन इष्ट है, उस पक्ष में उक्त साध्य के अभाव की व्याप्ति से युक्त दूसरा (प्रतिहेतु) अगर विद्यमान है, तो वह पहला हेतु सत्प्रतिपक्षित होगा । जल में वह्नि के साधक सभी हेतु सत्प्रतिपक्षित होंगे; क्योंकि वह्नि के अभाव
भूमिका ३९ की व्याप्ति जलत्व में है एवं जल में वह्न्यभावव्याप्य जलत्व सर्वदा ही विद्यमान है। अतः इस प्रकार का हेतु सदा ही सत्प्रतिपक्षित रहेगा। अतः सत्प्रतिपक्ष नित्य दोष है। महर्षि गौतम ने चौथे हेत्वाभास का नाम 'साध्यसम' कहा है और उसके स्वरूप को समझाने के लिए 'साध्याविशिष्टः साध्यत्वात् साध्यसमः' यह सूत्र लिखा है। पहले से जो सिद्ध नहीं रहता है वही 'साध्य' कहलाता है। हेतु के लिए यह आवश्यक है कि वह पहले से 'सिद्ध' रहे। अर्थात् उसमें असाध्य की व्याप्ति सिद्ध रहे। एवं (साध्यव्याप्ति से युक्त) हेतु स्वयं पक्ष में सिद्ध रहे; किन्तु जिस अनुमान का हेतु पहले से सिद्ध नहीं है, वह हेतु साध्य के समान ही है, अतः उसे 'साध्यसम' कहा गया है। अगर कोई 'छाया द्रव्य है क्योंकि वह गतिशील है' इस प्रकार से अनुमान का प्रयोग करे तो यहाँ 'गतिशीलत्व' हेतु 'साध्यसम' हेत्वाभास होगा; क्योंकि 'छाया में गति है' यही पहले से सिद्ध नहीं है। अतः छाया में द्रव्यत्व की सिद्धि की तरह छाया में गति की भी सिद्धि अपेक्षित है। 'साध्यसम' हेत्वाभास को ही नव्य नैयायिकों ने 'असिद्ध' शब्द से व्यक्त किया है। एवं (१) आश्रयासिद्ध, (२) स्वरूपासिद्ध और (३) व्याप्यत्वासिद्ध इसके ये तीन भेद किये हैं। जिसमें साध्य की सिद्धि अभिप्रेत हो उसे पक्ष कहते हैं। पक्ष को ही 'आश्रय' भी कहते हैं। आश्रय अगर सिद्ध नहीं रहेगा तो अनुमान कहाँ होगा ? अगर कोई साधारण फूलों के दृष्टान्त से आकाशकुसुम में गन्ध का अनुमान करे, तो वहाँ के सभी हेतु आश्रयासिद्ध होंगे। एवं स्वर्णमय पर्वत में अगर कोई वह्नि का अनुमान करे तो वहाँ के भी सभी हेतु आश्रयासिद्ध होंगे। यद्यपि पर्वत असिद्ध नहीं है, किन्तु पर्वत में स्वर्णमयत्व असिद्ध है। अतः स्वर्णमय पर्वतरूप विशिष्टपक्ष भी असिद्ध है। हेतु यदि कथित पक्ष में विद्यमान न रहे तो वह हेतु 'स्वरूपासिद्ध' हेत्वाभास होगा। जैसे कि जल में कोई धूम हेतु से भी वह्नि का अनुमान करना चाहेगा तो वहाँ का धूमहेतु स्वरूपासिद्ध हेत्वाभास होगा; क्योंकि जल रूप पक्ष में धूम हेतु नहीं है। भाष्यकार ने जो असिद्ध का उदाहरण दिया है, वह स्वरूपासिद्ध का ही उदाहरण है; क्योंकि छाया या अन्धकार में गति रूप हेतु नहीं है। इससे ऐसा भान होता है कि वात्स्यायनादि प्राचीन नैयायिकों ने केवल स्वरूपासिद्ध को ही असिद्ध मानते थे। असिद्ध के और भेद बाद में किये गये। हेतु में उसके विशेषणीभूत धर्म (हेतुतावच्छेदक) के अभाव और साध्य में साध्यतावच्छेदक के अभाव को व्याप्यत्वासिद्ध दोष कहते हैं। इस दोष से युक्त हेतु व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास है। 'पर्वतो वह्निमान् काञ्चनमयधूमात्' इस अनुमान के हेतु धूम में काञ्चनमयत्वरूप हेतुतावच्छेदक नहीं है। अतः वह (हेत्वप्रसिद्धि
४० प्रशस्तपादभाष्यम् रूप) व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास है । एवं 'पर्वतः काञ्चनमयवह्निमान् धूमात्' इस अनुमान के साध्य वह्नि में काञ्चनमयत्वरूप साध्यतावच्छेदक नहीं है, अतः यह हेतु (साध्याप्रसिद्ध रूप) व्याप्यत्वासिद्ध है । इसी प्रकार व्याप्ति में अनुपयोगी (व्यर्थ) विशेषणादि से युक्त हेतु भी व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास ही है, जैसे कि 'पर्वतो वह्निमान् नीलधूमात्' इत्यादि स्थलों का नीलधूम रूप हेतु व्याप्यत्वासिद्ध है; क्योंकि धूम का नील विशेषण व्यर्थ है । यह ध्यान रहना चाहिए कि दोष जहाँ कहीं भी रहे, किन्तु दुष्टता हेतु में ही आवेगी । पाँचवें हेत्वाभास को महर्षि ने 'कालातीत' की संज्ञा दी है और इसके परिचय के लिए "कालात्ययापदिष्टः कालातीतः" इस सूत्र का निर्माण किया है । पक्ष में पूर्ण रूप से निश्चित साध्य के लिए अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती है एवं पक्ष में जिस साध्य का अभाव ही पूर्णरूप से निश्चित है, उस साध्य के लिए भी न्याय की प्रवृत्ति नहीं होती है; किन्तु जो साध्य पक्ष में सन्दिग्ध रहता है, उस साध्य को उस पक्ष में निश्चित रूप से समझाने के लिए ही न्याय का प्रयोग होता है । हेतुवाक्य का प्रयोग भी न्याय के ही अन्तर्गत है । जिस समय जिस पक्ष में जिस साध्य का सन्देह वर्तमान है, वही समय हेतु- प्रयोग के लिए उपयुक्त है । यदि उस समय उस पक्ष में उस साध्य का अभाव दूसरे किसी बलवत् प्रमाण से निश्चित है, तो उस समय उस पक्ष में साध्य का सन्देह नहीं रह सकता । साध्यसन्देह का समय पक्ष में साध्याभाव निश्चय के पूर्व ही था, जो 'अतीत' हो चुका है । अतः जिस पक्ष में जिस साध्य का अभाव किसी बलवत् प्रमाण से निश्चित है, उस पक्ष में उस साध्य की अनुमिति के लिए अगर कोई हेतु का प्रयोग करे तो वह हेतु व्याप्ति-पक्षधर्मता प्रभृति से युक्त होने पर भी 'कालातीत' नाम का हेत्वाभास होगा । उससे प्रमा अनुमिति नहीं हो सकती । इसका 'अतीतकाल' नाम भी प्राचीन ग्रन्थों में है । नवीननैयायिक इस हेत्वाभास को ही 'बाधित' और उसके विशेषणीभूत दोष को 'बाध' कहते हैं । पक्ष में बलवत् प्रमाण के द्वारा निश्चित साध्य के अभाव का निश्चित रहना ही बाध है । फलतः पक्ष में साध्याभाव का रहना ही बाध दोष है । जिस किसी भी सम्बन्ध के द्वारा इस बाध दोष से युक्त हेतु ही 'बाधित' नाम का हेत्वाभास है । दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार हेत्वाभास शब्द का अर्थ होता है 'दुष्ट हेतु' । दोषों से युक्त हेतु ही दुष्ट हेतु है । फलतः कथित दोष ही दुष्ट हेतुवों को सद्धेतुवों से पृथक् करते हैं । अतः दुष्ट हेतुरूप हेत्वाभासों को समझने के लिए हेतु के दोषों को समझना पहले आवश्यक है । दोषों को समझ लेने के बाद 'इस दोष से युक्त ही दुष्ट हेतु है' इस प्रकार दुष्ट हेतुवों को समझना सुलभ हो जाता
भूमिका ४९ है। इसी दृष्टि से 'हेतोराभासा हेत्वाभासाः' इस व्युत्पत्ति से लभ्य हेतु के दोषों का ही लक्षण आकर ग्रन्थों में किया गया है। हेतुवों के ये दोष दो प्रकार से अनुमिति का प्रतिरोध करते हैं। एक सीधे ही अनुमिति को रोकते हैं। जैसे कि सप्रतिपक्ष और बाध। कुछ हेत्वाभास अनुमिति के कारण व्याप्ति या पक्षधर्मता का विघटन करते हुए अनुमिति का प्रतिरोध करते हैं, जैसे कि व्यभिचार एवं स्वरूपासिद्धि। कुछ हेत्वाभास ऐसे भी हैं जो उक्त दोनों ही प्रकार से अनुमिति का प्रतिरोध करते हैं, जैसे कि आश्रया- सिद्धि एवं साध्याप्रसिद्धि। हेत्वाभास की संख्याओं में और नामों में भी मतभेद देखा जाता है। जैसे कि वैशेषिकदर्शन के सूत्र में इसके तीन ही भेद कहे गये हैं; किन्तु भाष्यकार ने उनमें अनध्यवसित नाम को जोड़कर निम्नलिखित चार भेद किया है-(१) असिद्ध, (२) विरुद्ध, (३) सन्दिग्ध और (४) अनध्यवसित। न्यायमत में (१) सव्यभिचार, (२) विरुद्ध, (३) सप्रतिपक्ष, (४) असिद्ध और (५) बाध ये पाँच हेत्वाभास के मुख्य भेद माने गये हैं। मीमांसकों ने महर्षि कणाद की रीति से इसके तीन ही भेद किये हैं। इस प्रकार ज्ञान के परिशोधन के अभिप्राय से आचार्यों ने हेतु की तरह हेत्वाभासों को भी समझाने में बहुत श्रम किया है। जिसका लाभ हम लोगों को उठाना चाहिए। एक पक्ष के स्थापन के लिए विरुद्ध पक्ष के हेतुवों में दोषों का प्रदर्शन आवश्यक है। जो आज भी न्यायालयों की व्यवस्थाओं को सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर अवगत हो सकता है। प्राचीन समय की धर्मशास्त्रानुयायी व्यवस्थाओं को देखने से तो यह बात और स्पष्ट हो जाती है। जिसके लिए भारतीय व्यवहार के द्वैतपरिशिष्टादि निबन्ध-ग्रन्थों के व्यवहारप्रकरणों को देखना उपयोगी होगा। सुख जिस इच्छा के लिए और किसी इच्छा की आवश्यकता न हो, उसे 'सुख' कहते हैं। सुख की इच्छा से ही चन्दनवनितादि सभी विषयों की इच्छा होती है। अर्थात् चन्दनादि विषय चूँकि सुख के कारण हैं, इसीलिए उनकी इच्छा होती है। सुख की इच्छा के लिए किसी और इच्छा की आवश्यकता नहीं होती। अतः किसी और इच्छा के अनधीन इच्छा का विषय ही 'सुख' है। दुःख इसी प्रकार जिसमें द्वेष उत्पन्न होने के लिए मध्य में दूसरे विषयों के द्वेष की अपेक्षा न हो, वही 'दुःख' है। मुख्यतः जीवों को दुःखों से ही द्वेष है। फिर 'ये
४२ प्रशस्तपादभाष्यम् मुझे न मिलें' इस प्रकार की धारणा से जिनसे साक्षात् या परम्परा से दुःख मिलने की सम्भावना समझ में आती है, उन सभी वस्तुओं से द्वेष उत्पन्न होता है । इच्छा अपने लिए अथवा दूसरे के लिए किसी अप्राप्त वस्तु की 'मुझे यह मिले या उसे यह मिले' इस प्रकार की जो प्रार्थना, उसे ही 'इच्छा' कहते हैं । काम, अभिलाषादि इससे अनेक अवान्तर भेद हैं । द्वेष आत्मा के जिस गुण के द्वारा जीव अपने को जलता-सा अनुभव करे, वही 'द्वेष' है । क्रोध-द्रोहादि इसी के अवान्तर भेद हैं । प्रयत्न उत्साह को ही 'प्रयत्न' कहते हैं । यह तीन प्रकार का है-(१) जीवनधारणो- पयोगी (या जीवनयोनि), (२) इच्छा से उत्पन्न और (३) द्वेष से उत्पन्न । इनमें जीवनयोनि यल से सोते हुए जीव के प्राणादि वायुओं की क्रियायें उत्पन्न होती हैं । एवं जागते हुए पुरुष का इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध होता है । अपने अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति के लिए आवश्यक क्रिया का कारण ही इच्छाजनित 'प्रयत्न' है । इस इच्छाजनित प्रयत्न के कारण ही शरीर का पतन नहीं होता । एवं अहित वस्तुओं से बचने के लिए जो व्यापार होते हैं, उनका कारण भी प्रयत्न ही है, जो द्वेष से उत्पन्न होता है । बुद्धि से लेकर प्रयत्न तक कहे गये ये १७ गुण ही महर्षि कणाद के सूत्रों के द्वारा कहे गये हैं । गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार, धर्म, अधर्म और शब्द इन सात वस्तुओं में गुणत्व की व्यवस्था भाष्यकार प्रशस्तपाद ने की है और इसे कथित सत्रह गुणों के विधायक सूत्र में पठित 'च' शब्द के द्वारा सूत्रकार का अनुमत माना है । गुरुत्व पृथिवी और जल का पहला पतन जिस गुण के कारण हो उसे 'गुरुत्व' कहते हैं । यह 'गुरुत्व' नाम का गुण केवल पृथिवी और जल में ही रहता है । गुरुत्व से पतन का सिद्धान्त पृथ्वी के मध्याकर्षणवाले आधुनिक सिद्धान्त से बिलकुल विपरीत है ।