वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४९
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४९ प्रशस्तपादभाष्यम् सामान्यादीनां त्रयाणां स्वात्मसत्त्वं बुद्धिलक्षणत्वमकार्यत्वमकारणत्वम- सामान्यविशेषवत्त्वं नित्यत्वमर्थशब्दानभिधेयत्वञ्चेति । सामान्य प्रभृति तीन पदार्थों का अर्थात् सामान्य विशेष और समवाय इन तीन पदार्थों का 'स्वात्मसत्त्व' अर्थात् सत्ता जाति के बिना सत्ता, बुद्धिलक्षणत्व, अकार्यत्व, अकारणत्व, असामान्यविशेषवत्त्व, नित्यत्व और 'अर्थ शब्द' का अभिधेय न होना ये सात साधर्म्य हैं । न्यायकन्दली सम्प्रति सामान्यादीनां साधर्म्यमाह-सामान्यादीनामिति। स्वात्मैव सत्त्वं स्वरूपं यत्सामान्यादीनां तदेव तेषां सत्त्वम्, न सत्तायोगः सत्त्वम् । एतेन सामान्यादीनां त्रयाणां सामान्यरहितत्वं साधर्म्यमुक्तमित्यर्थः । कथमेतत् ? बाधकसद्भावात्, सामान्ये सत्ता नास्ति, अनिष्टप्रसङ्गात् । विशेषेष्वपि सामान्यसद्भावे संशयस्यापि सम्भवात् । निर्णयार्थं विशेषानुसरणेऽप्यनवस्थैव । समवायेऽपि सत्ताभ्युपगमे तद्वृत्त्यर्थं समवायाभ्युपगमाद- निष्ठापत्तिरेव दूषणम् । गोत्वादिष्वपरजातिमत्त्वेन व्याप्तस्य सत्तासम्बन्धस्य तन्निवृत्तौ निवृत्तिसिद्धिः । कुतस्तर्हि सामान्यादिषु सत्सदित्यनुगमः ? स्वरूपसत्त्वसाधर्म्येण सत्ताध्यारो- द्रव्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्य कहकर अब 'सामान्यादीनाम्' इत्यादि से सामान्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्य कहते हैं । अर्थात् सामान्यादि का 'आत्मा' अर्थात् स्वरूप ही 'सत्त्व' है । (द्रव्यादि तीनों की तरह) सत्ता जाति का सम्बन्ध उनकी 'सत्ता' नहीं है । इससे सत्ता जाति से रहित होना सामान्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्य कथित होता है । (प्र.) सामान्यादि में सत्ता क्यों नहीं है ? (उ.) सामान्यादि तीन पदार्थों में सत्ता मानने में यह बाधा है कि इससे 'अनवस्था' होगी । विशेषों में भी अगर सामान्य की सत्ता मानें तो वहाँ संशय हो सकता है कि ये विशेष एकजातीय हैं या विभिन्न-जातीय ? और तब फिर सभी नित्य द्रव्यों में यह संशय होगा । निश्चय करने के लिए अगर और विशेष निश्चयों के पीछे दौड़ेंगे तो अनवस्था होगी । समवाय में अगर सत्ता जाति मानेंगे तो उसके सम्बन्ध के लिये दूसरे समवाय की कल्पना करनी पड़ेगी । इस प्रकार इसमें भी अनवस्था होगी । और भी बात है, जहाँ-जहाँ सत्ता जाति रहती है, उन सभी स्थानों में गोत्वादि अपर जातियों में से भी कोई जाति अवश्य ही रहती है । सत्ता और गोत्वादि अपर जातियों की यह व्याप्ति गोप्रभृति वस्तुओं में सिद्ध है । सामान्यादि में कोई भी अपरजाति नहीं है, अतः सत्ता जाति भी उनमें नहीं है । (प्र.) फिर सामान्यादि में 'ये सत् हैं' इस प्रकार की प्रतीति क्यों होती है ? (उ.) सामान्यादि में रहनेवाली 'स्वरूपसत्ता' और सत्ता जाति इन दोनों के सादृश्य से सामान्यादि पदार्थों में सत्ता जाति का आरोप
५० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- न्यायकन्दली पात् । तर्हि मिथ्याप्रत्ययोऽयम् ? को नामाह नेति । भिन्नस्वभावेष्येकानुगमो मिथ्यैव, स्वरूपग्रहणंन्तु न मृषा, स्वरूपस्य यथार्थत्वात् । द्रव्यादिष्वपि सत्ताध्यारोपकृत एवास्तु प्रत्ययानुगमः ? नैवम्, सति मुख्येऽध्यारोपस्यासम्भवात् । न चेयं सामान्यादिष्वेव मुख्या, बाधकसम्भवादू द्रव्यादिषु च तदभावात् । बुद्धिलक्षणत्वमिति । बुद्धिरेव लक्षणं प्रमाणं येषां ते बुद्धिलक्षणाः, विप्रतिपन्न- सामान्यादिसद्भावे बुद्धिरेव लक्षणं नान्यत्, द्रव्यादिसद्भावे त्वन्यदपि तत्कार्यं प्रमाणं स्यादित्यर्थः । कश्चित् पुनरेवमाह- बुद्धया लक्ष्यन्ते प्रतीयन्त इति बुद्धिलक्षणाः, तदयुक्तम्, द्रव्यादेरपि स्वबुद्धिलक्षणत्वान्नेदं वैधर्म्यमुक्तं स्यात् । होता है । इसी आरोप से सामान्यादि पदार्थों में भी एक प्रकार की 'ये सत् हैं' इस आकार की प्रतीति होती है । (प्र.) तो फिर सामान्यादि में उक्त एक आकार की सत्त्व की प्रतीति भ्रमरूप है ? (उ.) कौन कहता है कि भ्रम रूप नहीं है ? भिन्न स्वभाव की वस्तुओं में एक आकार की प्रतीति अवश्य ही भ्रम है । किन्तु उनके स्वरूपों का ज्ञान यथार्थ ही है, क्योंकि वे उनमें ठीक ही हैं । (प्र.) फिर द्रव्यादि तीनों पदार्थों में भी (सामान्यादि की तरह) स्वरूपसत्त्व के आरोप से सत्ता की एक आकार की प्रतीति को भी मिथ्या क्यों नहीं मान लेते ? (उ.) इसलिए कि मुख्य प्रतीति के सम्भव होने पर आरोप मानना अनुचित है । यह भी सम्भव नहीं है कि सामान्यादि में ही सत्त्व की एक आकार की प्रतीति को ही मुख्य मान लें, क्योंकि ऐसा मानने में अनवस्था आ जाती है । द्रव्यादि तीनों पदार्थों में सत्त्व की एक आकार की प्रतीति को मुख्य मानने में इस प्रकार की कोई बाधा नहीं है । 'बुद्धिलक्षणत्वम्', "बुद्धिरेव लक्षणं प्रमाणं येषां ते बुद्धिलक्षणाः" इस व्युत्पत्ति के अनुसार बुद्धि ही जिनका प्रमाण है, वे ही बुद्धिलक्षण कहे जाते हैं । अभिप्राय यह है कि द्रव्यादि के प्रसङ्ग में विरुद्ध मत रखनेवालों को द्रव्यादि के कार्यों से भी समझाया जा सकता है । किन्तु सामान्यादि के प्रसङ्ग में विरुद्ध मत रखनेवालों को समझाने के लिए बुद्धि ही एक अवलम्ब है । (प्र.) किसी सम्प्रदाय के व्यक्ति "बुद्ध्या लक्ष्यन्ते प्रतीयन्ते इति बुद्धिलक्षणाः" इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत 'बुद्धिलक्षण' शब्द की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि "जो बुद्धि से ही प्रतीत हों वे ही बुद्धिलक्षण हैं" । (उ.) किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है, क्योंकि इस प्रकार का बुद्धिलक्षणत्व तो द्रव्यादि में भी है, फिर यह 'बुद्धिलक्षणत्व' का रूप सामान्यादि तीन पदार्थों के साधर्म्य को द्रव्यादि पदार्थों का वैधर्म्य कहना सम्भव न होगा¹ ।
- अभिप्राय यह है कि ग्रन्थ के आदि में पदार्थ एवं उनके साधर्म्य-वैधर्म्य के निरूपण की प्रतिज्ञा कर चुके हैं । उसके बाद पदार्थ एवं उनके साधर्म्यों का विस्तार से निरूपण
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५१ न्यायकन्दली अकार्यत्वं कारणानपेक्षस्वभावत्वम्, तच्च सामान्ये तावद् व्यक्तेः पूर्वमूर्ध्वं व्यक्तिकाले चावस्थितिग्राहकेण कारणाभावोपलब्धिसहकारिणा भूयोदर्शनजसंस्कारानुगृहीतेन प्रत्यक्षेणैव व्याप्तिवद् गृह्यते । समवायस्याप्यकार्यत्वं पूर्वापरसहभावानवक्लृप्तेः, यदि हि पटस्य समवायः पटात् पूर्वं सम्भवति, असति अकार्यत्व शब्द का अर्थ है-अपनी (स्वरूप) सत्ता के लिए कारणों की अपेक्षा न रखना । सामान्यादि के आश्रय द्रव्यादि व्यक्तियों में तीनों कालों में ही सामान्य की सत्ता के ज्ञापक एवं सामान्यादि के कारणों के अभाव- ज्ञान का सहायक तथा बार-बार के देखने से उत्पन्न संस्कार के द्वारा विशेष बलप्राप्त प्रत्यक्ष के द्वारा ही व्याप्ति की तरह इस अकार्यत्व का ज्ञान होता है । समवाय में भी अकार्यत्व है ही, क्योंकि समवाय को कार्य मानने की कोई रीति उपपन्न नहीं होती है । समवाय को अगर कार्य मानें तो फिर उसकी किया है । वैधर्म्यनिरूपण के लिए साधर्म्यनिरूपण के अन्त में लिखा है कि "एवं सर्वत्र साधर्म्यविपर्ययाच्च वैधर्म्यम्" अर्थात् इस प्रकार ये साधर्म्य हैं और (ये ही साधर्म्य) उनसे भिन्न वस्तुओं में न रहने के कारण उनके वैधर्म्य हैं । तदनुसार "सामान्यादीनाम्" इत्यादि प्रकृत पङ्क्ति का एक यह भी अर्थ मानना पड़ेगा कि ये सभी स्वात्मसत्त्वादि तीन पदार्थों से भिन्न पदार्थों के वैधर्म्य भी हैं । अगर बुद्धिलक्षणत्व शब्द की ऐसी व्याख्या करें जिसके अनुसार यह द्रव्यादि में भी रह सके तो फिर प्रकृत पङ्क्ति से उक्त वैधर्म्य का आक्षेप सम्भव न हो सकेगा । अभिप्राय यह है कि एक घट व्यक्ति की उत्पत्ति के पहले भी उससे पहले के घट में घटत्व की प्रतीति होती है । एवं एक घट व्यक्ति के नष्ट हो जाने पर भी दूसरे अविनष्ट घट में घटत्व की प्रतीति होती है । वर्तमान घट में घटत्व की प्रतीति में तो कोई विवाद ही नहीं है, अतः यह समझते हैं कि व्यक्ति के तीनों कालों में ही जाति की सत्ता रहती है । ऐसी स्थिति में सामान्य को अगर किसी कारण का कार्य मानें तो वह कारण उसके आश्रयीभूत व्यक्तियों के कारणों में से ही होगा या उसके सदृश ही कोई दूसरा होगा, किन्तु किसी भी प्रकार से सामान्य में कार्यत्व मान लेने से उसकी उक्त त्रैकालिक प्रतीति की उपपत्ति नहीं होगी, अतः उक्त त्रैकालिक प्रतीति के कारणभूत प्रमाणों से ही यह भी समझते हैं कि सामान्यादि का कोई कारण नहीं है, अतः जिस प्रकार धूम और वह्नि के सामानाधिकरण्य के भूयोदर्शनजनित संस्कार से युक्त पुरुष को धूम को देखते ही उसकी व्याप्ति भी दिखती है, उसी प्रकार व्यक्तियों में सामान्य का प्रत्यक्ष होते ही उसी प्रत्यक्ष प्रमाण से उसमें रहने वाले अकार्यत्व का भी ज्ञान हो जाता है ।
५२ न्याय्कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- न्याय्कन्दली सम्बन्धिनि कस्यासौ सम्बन्धः स्यात् ? अथ पटेन सहोत्पद्यते, तदा पटस्यानाधारत्वं प्राप्नोति । अथ पश्चाद्भवति, तथापि पटस्यानाधारत्वमेव, न च कार्य्यत्वमनाधारं युक्तम्, तस्मादकृतकः समवायः । विशेषाणाञ्चाकार्य्यत्वं वस्तुत्वे सति द्रव्यगुणकर्म्मान्यत्वात् सामान्यसमवायवत् सिद्धम् । अकारणत्वं समवाय्यसमवायिकारणत्वाभावः, न तु निमित्तकारण- त्वप्रतिषेधः, बुद्धिनिमित्तत्वाभ्युपगमात् । असामान्यविशेषवत्त्वम् अपर- जातिरहितत्वमित्यर्थः । सामान्येषु सामान्यन्नाम नापरं सामान्यमस्ति, अत्रापि सामान्यप्राप्त्याऽनवस्थानात् । विशेषसमवाययोस्तु सामान्याभावे कथित एव निम्नलिखित तीन ही गति हो सकती है कि (१) समवाय अपने पटादिरूप प्रतियोगी से पूर्व ही उत्पन्न हो, या (२) अपने प्रतियोगी से पीछे उत्पन्न हो अथवा (३) प्रतियोगी के साथ ही उत्पन्न हो । किन्तु इनमें से कोई भी प्रकार सम्भव नहीं है; (१) क्योंकि सम्बन्ध बिना प्रतियोगी के नहीं होता है । अगर समवाय की उत्पत्ति के पूर्व पट की सत्ता नहीं रहेगी तो फिर पट से पूर्व उत्पन्न वह समवाय किसका सम्बन्ध होगा ? अतः समवाय अपने पटादि प्रतियोगियों के पहले उत्पन्न नहीं हो सकता । (२) समवाय अपने पटादि प्रतियोगियों के साथ-साथ भी उत्पन्न न हो, (३) अथवा प्रतियोगी के साथ ही उत्पन्न हो । किन्तु इनमें से कोई भी प्रकार सम्भव नहीं है, (१) क्योंकि सम्बन्ध बिना प्रतियोगी के नहीं होता है । अगर समवाय की उत्पत्ति के पूर्व पट की सत्ता नहीं रहेगी तो फिर पट से पूर्व उत्पन्न वह समवाय किसका सम्बन्ध होगा ? अतः समवाय अपने पटादि प्रतियोगियों के पहले उत्पन्न नहीं हो सकता । (२) समवाय अपने पटादि प्रतियोगियों के साथ-साथ भी उत्पन्न नहीं हो सकता है; क्योंकि इससे पटादि कार्य समवाय के आधार ही नहीं हो सकते, क्योंकि आधार को आधेय से पूर्व रहना आवश्यक है । सुतराम्, एक ही क्षण में उत्पन्न दो वस्तुओं में आधाराधेयभाव असम्भव है । (३) समवाय की उत्पत्ति अगर पटादि कार्यों की उत्पत्ति के बाद मानें फिर भी पटादि की अनाधार उत्पत्ति की आपत्ति रहेगी, क्योंकि पट की उत्पत्ति के समय अगर समवाय ही नहीं है तो तन्तु में किस सम्बन्ध से पट की उत्पत्ति होगी ? अतः समवाय अकार्य ही है । वह कारणों से उत्पन्न नहीं होता है । विशेष भी कार्य नहीं है, क्योंकि द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों से भिन्न होने पर भी वह भाव पदार्थ है, जैसे कि सामान्य और समवाय । यहाँ 'अकारणत्व' शब्द से समवायिकारणत्व और असमवायिकारणत्व इन दोनों का ही निषेध इष्ट है, निमित्तकारणत्व का नहीं, क्योंकि सामान्यादि में भी बुद्धि की निमित्तकारणता स्वीकृत है । 'असामान्यविशेषवत्त्व' शब्द का अर्थ है अपरजातियों का न रहना । सामान्यों में सामान्यत्व नाम का कोई अपर सामान्य नहीं है, क्योंकि इससे अनवस्था¹ होगी । समवायो और विशेषों में सामान्य के न रहने की युक्ति दिखला १. जातियों में जातित्व नाम का सामान्य मानने में अनवस्था इस प्रकार होती है कि द्रव्यत्व गुणत्वादि जितने सामान्य पहले से स्वीकृत हैं उन सभी सामान्यों में जातित्व या सामान्यत्व नाम का एक और सामान्य मानना पड़ेगा, किन्तु यह
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३ न्याय्कन्दली न्यायः । कथं तर्हि सामान्येषु प्रत्ययानुवृत्तिः, सामान्यं सामान्यमिति ? अनेक- व्यक्तिसमवायोपाधिवशाद् विशेषेष्वप्येकशब्दप्रवृत्तिः, अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिजनकत्वस्य सर्वत्र सम्भवात् । नित्यत्वं विनाशरहितत्वम्, तदपि सामान्यस्य व्यक्त्युत्पादविनाशयो- रवस्थितिग्राहिणा भूयो भूयः प्रवृत्तेन निरुपाधिप्रत्यक्षेण व्याप्तिवन्निश्चीयते । समवायस्य तु सर्वत्र कार्योपलम्भादकृतकत्वाच्चानुमीयते । अर्थशब्दानभिधेयत्वञ्चेति । स्वसमयार्थशब्दान- भिधेयत्वं चैतेषां साधर्म्यम् । चः समुच्चये । चुके हैं । (प्र.) फिर सभी सामान्यों में 'ये सामान्य हैं' इस एक आकार की प्रतीति (अनुवृत्तिप्रत्यय) क्यों होती है ? (उ.) सभी सामान्य अनेक व्यक्तियों में रहते हैं, अतः यह "अनेक व्यक्तियों में रहना या अनेक व्यक्तिवृत्तित्व" रूप एक उपाधि सभी सामान्यों में है । इसी अनेक व्यक्तिवृत्तित्व-रूप उपाधि के कारण सभी सामान्यों में उक्त एक आकार की प्रतीति होती है । सभी विशेषों में भी 'ये विशेष हैं' इस एक आकार की प्रतीति होती है । इसके लिए भी विशेषत्व नाम के सामान्य का मानना आवश्यक नहीं है; क्योंकि सभी विशेषों में जो अपने-अपने आश्रय को विभिन्न पदार्थों से विलक्षण रूप से समझाने की क्षमता है, उसी क्षमता रूप एक उपाधि के बल से ही उक्त एकाकार की प्रतीति की उपपत्ति हो जाएगी । 'नित्यत्व' शब्द का अर्थ है विनाशरहित होना । यह (नित्यत्व) भी व्यक्तियों की उत्पत्ति से पहले और उनके नाश के बाद भी सामान्यों की वर्त्तमानता का ज्ञापक उनमें बार-बार प्रवृत्त प्रत्यक्ष प्रमाण से ही व्याप्ति की तरह ज्ञात होता है । समवाय से सभी स्थलों में (सभी कालों में) कार्य की उत्पत्ति देखी जाती है, एवं समवाय किसी भी कारण से उत्पन्न हुआ नहीं दीखता है । इन्हीं दोनों हेतुओं से समवाय में नित्यत्व का अनुमान होता है । 'अर्थशब्दानभिधेयत्वञ्च' अर्थात् वैशेषिक शास्त्र में बिना विशेषण के केवल 'अर्थ' शब्द से द्रव्य, गुण, कर्म्म इन तीनों के ही समझने का एक सङ्केत है । तदनुसार उक्त 'अर्थ' शब्द का अभिधावृत्ति द्वारा न समझा जाना भी सामान्यादि तीनों का साधर्म्य है । 'च' शब्द समुच्चय अर्थ का बोधक है । 'सामान्यत्व' भी सामान्य ही होगा । यह सामान्यत्वरूप सामान्य द्रव्यादि पहले से स्वीकृत सामान्यों में तो रहेगा, किन्तु स्वाभिन्न सामान्यत्वरूप सामान्य में नही रहेगा; क्योंकि एक वस्तु में आधाराधेयभाव असम्भव है, अतः पूर्वस्वीकृत द्रव्यादि सामान्य एवं अधुना स्वीकृत सामान्यत्वरूप सामान्य एतत्साधारण एक दूसरे सामान्यत्व की कल्पना करनी पड़ेगी । इस प्रकार अनन्त सामान्यत्वों की कभी समाप्त न होनेवाली कल्पना की धारा चलेगी । यही अनवस्था है ।
५४ न्यायकन्दलीसंविलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् पृथिव्यादीनां नवानाामपि द्रव्यत्वयोगः स्वात्मन्यारम्भकत्वं गुणवत्त्वं कार्य्य- कारणाविरोधिध्वन्त्यन्त्यविशेषवत्त्वम् । द्रव्यत्व जाति का सम्बन्ध, अपने में समवाय सम्बन्ध से कार्य्य को उत्पन्न करना, गुणवत्त्व, अपने कार्य्यों से या कारणों से विनष्ट न होना एवं अन्त्यविशेष ये पाँच साधर्म्य पृथिवी प्रभृति नौ द्रव्यों के हैं । न्यायकन्दली इदानीं द्रव्याणामेव साधर्म्यं निरूपयति- पृथिव्यादीनामिति । पृथिव्यादीनामेव द्रव्यत्वेन सामान्येन योगः सम्बन्धः । स कियतामत आह-नवानाामपीति । अपिशब्दोऽभि- व्याप्त्यर्थः । एतेन द्रव्यपदार्थस्येतरेभ्यो भेदलक्षणमुक्तम् । द्रव्यशब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तञ्च चिन्तितम् । अत्र कश्चित् चोदयति-द्रव्यत्वयोगो द्रव्यत्वसमवायः, स च पञ्चपदार्थधर्मत्वात् कथं द्रव्यलक्षणमिति । अपरः समाधत्ते-यद्यपि सर्वत्राभिन्नः समवायः, तथापि द्रव्यत्वोलक्षणभेदाद् द्रव्यस्य लक्षणम्, दृष्टो हि कल्पितभेदस्याप्याकाशस्य श्रोत्रभावेनार्थक्रियाभेद इति । द्वयमप्ये- 'पृथिव्यादीनाम्' इत्यादि सन्दर्भ से अब केवल नौ द्रव्यों का ही साधर्म्य कहते हैं । पृथिवी प्रभृति नौ द्रव्यों का ही द्रव्यत्व जाति के साथ 'योग' अर्थात् सम्बन्ध है । द्रव्यत्व जाति का यह सम्बन्ध पृथिव्यादि कितने द्रव्यों के साथ है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'नवानाम्' इस पद से दिया है । 'नवानाामपि' इस वाक्य के 'अपि' शब्द का अर्थ है (सभी द्रव्यों में सम्बन्ध रूप) 'अभिव्याप्ति' । अर्थात् पृथिव्यादि नौ द्रव्यों में से किसी को न छोड़कर सभी द्रव्यों में रहना । इस अभिव्याप्ति से द्रव्य पदार्थ को गुणादि पदार्थों से भिन्न समझानेवाला स्वरूप कहा गया है। इससे 'द्रव्य' शब्द का 'प्रवृत्तिनिमित्त' भी निर्दिष्ट हो जाता है । इस प्रसङ्ग में कोई आक्षेप करते हैं कि प्रकृत 'द्रव्यत्वयोग' शब्द का अर्थ है द्रव्यत्व का समवाय, वह द्रव्य से विशेषपर्यन्त पाँचों पदार्थों में समान रूप से है । फिर यह 'द्रव्यत्वयोग' पृथिव्यादि नौ पदार्थों का ही 'साधर्म्य' कैसे है ? इस आक्षेप का समाधान कोई इस प्रकार कहते हैं कि यह ठीक है कि (समवाय एक होने के कारण) सभी स्थलों में एक ही है, किन्तु द्रव्यत्वरूप उपलक्षण (प्रतियोगी) के भेद से वह केवल द्रव्यों का ही लक्षण हो सकता है । एक ही वस्तु में उपलक्षण के भेद से विभिन्न कार्यों के सम्पादन की क्षमता देखी जाती है, जैसे एक ही आकाश के सर्वत्र रहने पर भी कर्णशष्कुलीरूप उपाधि से श्रोत्रभावापन्न आकाश से ही शब्दश्रवणरूप कार्य्य होता है । किन्तु उक्त आक्षेप और उसका यह समाधान दोनों ही असङ्गत हैं, क्योंकि जिस प्रकार आकाश ही श्रोत्र है
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५५
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५५ न्यायकन्दली तदसाधीयः, यथाकाशं श्रोत्रं नैवं योगो द्रव्यस्य लक्षणम्, किन्तु द्रव्यत्वमेव, तत्त्वसम्बद्धं लक्षणं न स्यादिति योगसङ्कीर्त्तनं लिङ्गस्य धर्मिण्यस्तित्वकथनम् । तथा चैवं प्रयोगः - पृथिव्यादिकमितरेभ्यो भिद्यते द्रव्यत्वात्, येषामितरेभ्यो भेदो नास्ति तेषां द्रव्यत्वमपि नास्ति, यथा रूपादीनामिति । तस्मादसच्छोद्यमसदुत्तरञ्च । अन्यदपि द्रव्याणां साधर्म्यमाह-स्वात्मन्यारम्भकत्वमिति, स्वसमवेतकार्यजनकत्वमि- त्यर्थः । गुणवत्त्वं गुणैः सह सम्बन्धः । एतद्द्वयमुभयं गुणादिभ्यो द्रव्याणां वैधर्म्यमन्यत्रासम्भवात् । कार्यकारणाविरोधीत्वम् । गुणो हि क्वचित् कार्येण विनाश्यते, यथा आद्यः शब्दो द्वितीयशब्देन । क्वचित् कारणेन विनाश्यते, यथा अन्त्यः शब्द उपान्त्यशब्देन । कर्मापि कार्येण विनाश्यते, यधोत्तरसंयोगेन । द्रव्याणि तु न कार्येण विनाश्यन्ते नापि कारणे- नेति कार्यकारणाविरोधीनि । नित्यानां कारणविनाशयोरभावादेव कारणेनाविनाशः, उसी प्रकार प्रकृत में 'योग' अर्थात् द्रव्यत्व का समवाय रूप सम्बन्ध ही द्रव्यों का साधर्म्य या लक्षण नहीं है, किन्तु द्रव्यत्व ही द्रव्यों का लक्षण है । यह द्रव्यत्व बिना किसी असाधारण सम्बन्ध के लक्षण नहीं हो सकता, अतः 'योग' शब्द का उल्लेख है । अर्थात् इस 'योग' शब्द से (इतरभेदानुमिति के पक्षरूप) धर्मी में (उस अनुमिति के लक्षणरूप) हेतु का अस्तित्व दिखलाया गया है । इससे अनुमान का यह रूप फलित होता है कि पृथिव्यादि नौ पदार्थ गुणादि और पदार्थों से भिन्न हैं, क्योंकि इनमें द्रव्यत्व है । जिनमें यह इतरभेद नहीं है, उनमें द्रव्यत्व भी नहीं है । अतः उक्त आक्षेप और उसका समाधान दोनों ही अशुद्ध हैं । 'स्वात्मन्यारम्भकत्वम्' इत्यादि से द्रव्यों का और भी साधर्म्य कहते हैं, अर्थात् अपने में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले कार्यों का कारणत्व भी द्रव्यों का साधर्म्य है । 'गुणवत्त्व' शब्द का अर्थ है गुण के साथ सम्बन्ध, ये दोनों ही गुणादि पदार्थों से द्रव्यों में असाधारण्य के सम्पादक हैं, क्योंकि द्रव्य से भिन्न किसी भी पदार्थ में इन दोनों की सम्भावना नहीं है । " कार्यकारणा- विरोधित्वम्" गुण कहीं अपने कार्य से ही नष्ट होता है, जैसे कि पहला शब्द दूसरे शब्द से, कहीं वह अपने कारण से भी नष्ट होता है, जैसे कि अन्तिम शब्द अपने अव्यवहितपूर्व के शब्द से । क्रिया भी अपने कार्य से नष्ट होती है, जैसे कि उत्तर देश के संयोग से; द्रव्य न अपने कार्यों से नष्ट होते हैं, न कारणों से ही, अतः द्रव्य कार्य और कारण दोनों के अविरोधी हैं । नित्य द्रव्यों का न कोई कारण है, न उनका विनाश ही होता है, अतः उनका विनाश कार्य और कारण किसी से भी नहीं होता है । अनित्य द्रव्यों का विनाश भी होता है, एवं उनके कारण भी होते हैं, किन्तु उनका विनाश अपने कारणों
५६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् अनाश्रितत्वनित्यत्वे चान्यत्रावयविद्रव्येभ्यः । पृथिव्युदकज्वलनपवनात्ममनसामनेकत्वापरजातिमत्त्वे । क्षितिजलज्योतिरनिलमनसां क्रियावत्त्वमूर्त्तत्वपरत्वापरत्व- अवयवी द्रव्यों को छोड़कर और सभी द्रव्यों के अनाश्रितत्व और नित्यत्व ये दो साधर्म्य हैं । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आत्मा और मन इन छः द्रव्यों के अनेकत्व और अपरजातिमत्त्व ये दो साधर्म्य हैं । पृथ्वी, जल, तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों के क्रिया, मूर्त्तत्व, न्यायकन्दली अनित्यद्रव्याणां कारणविनाशयोः सम्भवेऽपि कारणेन न विनाशः, किन्त्वन्येनेति विवेकः । तथा अन्त्यविशेषवत्त्वमन्य विशेषयोगित्वमित्यर्थः । अनाश्रितत्वं क्वचिदप्यसमवेतत्वम्, नित्यत्वं विनाशरहितत्वञ्च द्रव्याणां साधर्म्यम् । तत् किं सर्वेषां साधर्म्यमित्यत आह-अवयविद्रव्येभ्योऽन्यत्रेति । अवयविद्रव्याणि परित्यज्यान्त्यविशेषवत्त्वानाश्रितत्वनित्यत्वान्यन्यत्र सन्तीत्यर्थः । न केवलं पूर्वोक्ताः पृथिव्यादीनां धर्माः, किन्त्वनाश्रितत्वनित्यत्वे चेति चार्थः । पृथिव्यादीनां द्रव्याणामेव परस्परसाधर्म्यं वैधर्म्यञ्च प्रतिपादयन्नाह-पृथिव्युदक- ज्वलनपवनात्ममनसामिति । अनेकत्वं प्रत्येकं व्यक्तिभेदः । अपरजातिमत्त्वमिति पृथिवीत्वादिजातिसम्बन्धित्वम् । से नहीं होता है, अन्य वस्तुओं से होता है । इसी प्रकार 'अन्त्यविशेष' शब्द का अर्थ है अन्त्यविशेष का सम्बन्ध । कभी भी समवाय सम्बन्ध से न रहना ही 'अनाश्रितत्व' शब्द का अर्थ है । 'नित्यत्व' शब्द का अर्थ है नाश को प्राप्त न होना, 'अनाश्रितत्व' और 'नित्यत्व' ये दोनों ही द्रव्य के साधर्म्य हैं । ये दोनों क्या सभी द्रव्यों के साधर्म्य हैं ? इसी प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि "अवयविद्रव्येभ्योऽन्यत्र" अर्थात् अवयविद्रव्यों को छोड़कर और सभी द्रव्यों में अन्त्यविशेष, अनाश्रितत्व और अनित्यत्व ये तीनों रहते हैं । 'च' शब्द से यह अभिप्रेत है कि पृथिवी प्रभृति द्रव्यों के पहले कहे हुए साधर्म्य ही नहीं हैं, किन्तु प्रकृत अनाश्रितत्व और नित्यत्व भी उनके साधर्म्य हैं । पृथिव्यादि द्रव्यों में ही परस्पर साधर्म्य और वैधर्म्य का निरूपण करते हुए "पृथिव्युदकज्वलनपवनात्ममनसाम्" इत्यादि सन्दर्भ कहते हैं । प्रत्येक व्यक्ति में परस्पर भेद ही 'अनेकत्व' शब्द का अर्थ है । 'अपरजातिमत्त्व' शब्द से पृथिवी- त्वादि जातियों की अधिकरणता अभिप्रेत है ।
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५७
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५७ प्रशस्तपादभाष्यम् वेगवत्त्वानि । परत्व, अपरत्व और वेगवत्त्व ये पाँच साधर्म्य हैं । न्यायकन्दली क्षितिजलज्योतिरनिलमनसां क्रियावत्त्वमूर्त्तत्वपरत्वापरत्ववेगवत्त्वानीति । क्रिया- वत्त्वमुत्क्षेपणादिक्रियायोगः । मूर्त्तत्वमवच्छिन्नपरिमाणयोगित्वम् । परत्वापरत्ववेगवत्त्वानि परत्वापरत्ववेगसमवायः । संयुक्तसंयोगाल्पीयस्त्वभूयस्त्वयोरेव परापरव्यवहारहेतुत्वात् परत्वापरत्वे न स्त इति केचित्, न, भिन्नदिक्सम्बन्धिनोः सत्यपि संयुक्तसंयोगाल्पीयस्त्वभूयस्त्वसद्भावे सत्यपि च द्रष्टुः शरीरापेक्षया सन्निकृष्टविप्रकृष्टबुद्ध्योरुत्पादे परापरप्रत्ययाभावात् । क्रिया, मूर्त्तत्व, परत्व अपरत्व और वेग ये पाँच पृथिवी, जल, तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों के साधर्म्य हैं । 'क्रियावत्त्व' शब्द का अर्थ है उत्क्षेपणादि क्रियाओं का सम्बन्ध । मूर्त्तत्व शब्द का अर्थ है किसी अल्प परिमाण का सम्बन्ध । परत्व, अपरत्व और वेग इन तीनों का समवाय ही 'परत्वापरत्व- वेगवत्त्व' शब्द का अर्थ है । (प्र.) कुछ आचार्यों का कहना है कि परत्व और अपरत्व नाम के स्वतन्त्र गुण नहीं हैं । पाटलिपुत्र से काशी की अपेक्षा प्रयाग 'पर' (दूर) है एवं पाटलिपुत्र से प्रयाग की अपेक्षा काशी 'अपर' (समीप) है, इसी प्रकार की प्रतीतियों से तो दैशिक परत्व और अपरत्व स्वीकार किये जाते हैं । किन्तु यह 'परत्व' और 'अपरत्व' दूरत्व और समीपत्व को छोड़कर और कुछ नहीं है । एवं परत्व और अपरत्व इन प्रतीतियों से भी स्वीकार किये जाते हैं कि देवदत्त यज्ञदत्त से 'पर' है एवं यज्ञदत्त देवदत्त से 'अपर' है, यह (कालकृत) परत्व और अपरत्व ज्येष्ठत्व और कनिष्ठत्व के ही दूसरे नाम हैं । किन्तु इन व्यवहारों के लिए परत्व और अपरत्व नाम के स्वतन्त्र गुणों की कल्पना व्यर्थ है, क्योंकि दूरत्व और समीपत्व रूप परत्व और अपरत्व के व्यवहार का नियामक देश के साथ संयोग की अधिकता और न्यूनता ही है । यह स्वीकार करना होगा कि पाटलिपुत्र से काशी में जितने दिग्देशों का सम्बन्ध है उससे प्रयाग में अधिक है । एवं पाटलिपुत्र से प्रयाग में जितने दिग्देशों का संयोग है उससे काशी में अल्प है । इसी प्रकार ज्येष्ठत्व और कनिष्ठत्व रूप परत्व एवं अपरत्व का व्यवहार भी सूर्य की अधिक क्रिया से युक्त काल के सम्बन्ध और सूर्य की अल्प क्रिया से युक्त काल के सम्बन्ध से ही होता है । सुतराम्, सूर्यक्रियाओं की अधिकता और अल्पता से ही (कालिक) परत्वापरत्व के व्यवहार की उपपत्ति होगी । इन प्रतीतियों के लिए परत्व और अपरत्व नाम के स्वतन्त्र गुण की कल्पना आवश्यक नहीं है । (उ.) किन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि इस प्रकार से तो परस्पर विरुद्ध दो दिशाओं
५८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् आकाशकालदिगात्मनां सर्वगतत्वं परममहत्त्वं सर्वसंयोगि- आकाश, काल, दिक् और आत्मा इन चार द्रव्यों के सर्वगतत्व, परम- महत्त्व और सर्वसंयोगिसमानदेशत्व (सभी संयोगी द्रव्यों का समान रूप से न्यायकन्दली एकस्यां दिश्यवस्थितयोः पिण्डयोस्तथा प्रत्यय इति चेत् ? अस्ति तर्हि संयोगाल्पीयस्त्व- भूयस्त्वाभ्यां विषयान्तरम्, विषयवैलक्षण्यमन्तरेण विलक्षणया बुद्धेरनुत्पादात् । वेगोऽपि गुणान्तरम्, न क्रियासन्ततिमात्रम्, मन्दगतौ वेगप्रतीत्यभावात् । क्रियाक्षणानामाशुत्पाद- निमित्तो वेगव्यवहार इति चेत् ? न, अलातचक्रादिषु क्रियाक्षणानां निरन्तरोत्पादव्ययवतां प्रत्येकमन्तराग्रहणेनाशुत्पादस्य प्रत्यक्षेणाप्रतीतेः, वेगप्रत्ययस्य च भावात् । व्यक्ता च लोके क्रियावेगयोर्भेदस्यावगतिः, वेगेन गच्छतीति प्रतीतेः । आकाशकालदिगात्मनां सर्वगतत्वमित्यादि । सर्वशब्देनात्र प्रकृतापेक्ष- यानन्तरोक्तानि मूर्त्तद्रव्याणि परामृश्यन्ते । सर्वगतत्वं सर्वमूर्त्तैः सह संयोग में विद्यमान वस्तुओं में भी परत्व और अपरत्व का व्यवहार होना चाहिए, किन्तु देखनेवाले के शरीर से उनमें सामीप्य की बुद्धि होने पर भी (विरुद्ध) दिशाओं में अवस्थित उन दोनों वस्तुओं में परस्पर की अपेक्षा परत्व या अपरत्व की बुद्धि नहीं होती है । (प्र.) अगर इसी में इतना बढ़ा दें कि समान दिशा के देशों के संयोग के अल्पत्व और अधिकत्व ही (अपरत्व एवं परत्व) प्रतीतियों के नियामक हैं, (उ.) तो भी परत्व और अपरत्व नाम का स्वतन्त्र गुण मानना ही पड़ेगा, क्योंकि विषयों में अन्तर हुए बिना प्रतीतियों में अन्तर नहीं हो सकता । वेग भी स्वतन्त्र गुण है, क्रियाओं का समूह नहीं, क्योंकि मन्द गतिवाली वस्तुओं में वेग की प्रतीति नहीं होती है । (प्र.) क्रिया के कारणीभूत क्षणों का यह स्वभाव है कि वे अत्यन्त शीघ्र विनष्ट होते हैं । उनकी इस अत्यन्त शीघ्रविनाशशीलता से ही वेग का व्यवहार होता है (अतः क्रियाओं का समूह ही वेग है, कोई स्वतन्त्र गुण नहीं) । (उ.) चूँकि अलातचक्रादि में होनेवाली क्रियाओं के कारणभूत क्षणों का बराबर उत्पाद और विनाश होता रहता है, किन्तु उत्पत्ति और विनाश की अत्यन्त शीघ्रता के कारण उन दोनों के बीच के समय गृहीत नहीं हो पाते, अतः उनका प्रत्यक्ष नहीं होता है, किन्तु अलातचक्रादि में भी वेग की प्रतीति तो होती ही है । क्रिया और वेग की विभिन्न रीति से प्रतीति सर्वजनसिद्ध है । 'यह वेग से जा रहा है' इस आकार की वेग की प्रतीति होती है । (क्रियाओं की प्रतीति का यह आकार नहीं है) । प्रकृत भाष्य के 'सर्वगतत्व' पद में प्रयुक्त 'सर्व' शब्द से प्रकृत आकाशादि से ठीक पहले कहे हुए सभी मूर्त द्रव्यों को समझना चाहिए । आकाशादि का सभी
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५९
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५९ प्रशस्तपादभाष्यम् समानदेशत्वञ्च । पृथिव्यादीनां पञ्चानामपि भूतत्वेन्द्रियप्रकृतित्वबाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्यविशेषगुण- वत्त्वानि । आधार होना) ये तीन साधर्म्य हैं । पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँच द्रव्यों के भूतत्व, इन्द्रियप्रकृतित्व और एक-एक बाह्येन्द्रिय से गृहीत होनेवाले विशेष गुण ये तीन साधर्म्य हैं । न्यायकन्दली आकाशादीनाम्, न तु सर्वत्र गमनम्, तेषां निष्क्रियत्वात् । परममहत्त्वमियत्तान- वच्छिन्नपरिमाणयोगित्वम् । सर्वसंयोगिसमानदेशत्वं सर्वेषां संयोगिनां मूर्त्तद्रव्याणामाकाशः समानो देश एक आधार इत्यर्थः । एवं दिगादिष्वपि व्याख्येयम् । यद्यप्याकाशादिकं सर्वेषां संयोगिनामाधारो न भवति, आधारभावेनानवस्थानात्, तथापि सर्वसंयोगाधारत्वात् सर्वसंयोगिनामाधार इत्युच्यते, उपचारात् । अत एव सर्वगतत्वमित्यनेनापुनरुक्तता । तत्र हि सर्वैः सह संयोगोऽस्तीत्युक्तम् । इह तु सर्वषामाधार इत्युच्यते । पृथिव्यादीनामाकाशान्तानामितरवैधर्म्येण साधर्म्यं कथयति – पृथिव्या- दीनामिति । भूतत्वं भूतशब्दवाच्यत्वम् । एकनिमित्तमन्तरेणानेकेषु मूर्त्त द्रव्यों के साथ संयोग ही सर्वगतत्व है, आकाशादि का भी मूर्त्त द्रव्यों में जाना नहीं, क्योंकि वे सभी क्रियाशून्य हैं । 'परममहत्त्व' शब्द का अर्थ है इयत्ता से रहित परिमाण का (सबसे बड़े परिमाण का) सम्बन्ध । 'सर्वसंयोगसमानदेशत्व' अर्थात् आकाश संयोग से युक्त सभी मूर्त्त द्रव्यों का एक आधार है । इसी प्रकार दिशा में भी व्याख्या करनी चाहिये । यद्यपि आकाशादि संयोग से युक्त पदार्थों का आधार नहीं है, किन्तु उनके सभी संयोगों का आधार है, अतः उनमें 'सर्वाधार' शब्द का लाक्षणिक प्रयोग होता है । अतएव 'सर्वगतत्व' के बाद 'सर्वसंयोगि- समानदेशत्व' के कथन से पुनरुक्ति की आपत्ति नहीं होती है; क्योंकि 'सर्वगतत्व' शब्द से आकाशादि में भी मूर्त्त द्रव्यों का संयोग प्रतिपादित होता है और 'सर्वसंयोगिसमानदेशत्व' शब्द से लक्षणा वृत्ति के द्वारा उनमें सर्वाधारत्व का प्रतिपादन होता है । पृथ्वी से लेकर आकाशपर्यन्त पाँच द्रव्यों का साधर्म्य औरों से असाधारण्य दिखलाते हुए कहते हैं । 'भूत' शब्द का अर्थ है 'भूत' शब्द से अभिधावृत्ति के द्वारा कहा जाना । यद्यपि पृथिवी प्रभृति पाँच द्रव्यों में सभी को समझाने के लिए एक शब्द की प्रवृत्ति का नियामक कोई एक धर्म नहीं है, किन्तु तब भी 'अक्ष' शब्द
६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- न्यायकन्दली पृथिव्यादिष्वेकशब्दप्रवृत्तिरक्षशब्दवत्, यथा देवनत्वेन्द्रियत्वबिभीतक्तत्वसामान्यत्रययोगा- देवनादिष्वक्षशब्दः सङ्केतितः, तथा पृथिवीत्वादिसामान्यवशात् पृथिव्यादिषु चतुर्षु भूतशब्दः सङ्केतितः । आकाशे तु व्यक्तिनिमित्त एव भूतं भूतमिति तच्छब्दानुविद्धः प्रत्ययस्तच्छब्द- वाच्यतोपाधिकृतः, यथा देवनादिष्येकोऽक्ष इति प्रत्ययः । इन्द्रियप्रकृतत्वमिन्द्रियस्वभावत्वम् । न भूतस्वभावानीन्द्रियाणि, अप्राप्यका- रित्वात्, प्राप्यकारित्वं हि भौतिको धर्मो यथा प्रदीपस्येति केचित् । तदयुक्तम्, व्यवहितानुपलब्धेः, यदीन्द्रियमप्राप्यकारि कुड्यादिव्यवहितमप्यर्थं गृह्णीयादप्राप्तेर- विशेषात् । योग्यताभावाद् व्यवहितार्थग्रहणमिति चेत् ? इन्द्रियस्य तावद् योग्यता विषयग्रहणसामर्थ्यमस्त्येव तदानीमव्यवहितार्थग्रहणात्, विषयस्यापि योग्यता की तरह 'भूत' शब्द की प्रवृत्ति उनमें होती है । अर्थात् जैसे देवनत्व (द्यूतत्व), इन्द्रियत्व और बिभीतकत्व इन तीन सामान्य के सम्बन्ध से जूये प्रभृति में 'अक्ष' शब्द की प्रवृत्ति होती है, वैसे ही पृथिवीत्वादि चारों जातियों से पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों को समझाने के लिए 'भूत' शब्द प्रवृत्त होता है । आकाश में आकाशरूप व्यक्तिमूलक 'यह भूत है' इत्यादि 'भूत' शब्दमूलिका प्रतीति भूतशब्दबोध्यत्वरूप उपाधि से होती है । जैसे कि एक ही 'अक्ष' शब्द देवनादि सभी अर्थों को समझाने के लिए प्रवृत्त होता है । 'इन्द्रियप्रकृतित्व' शब्द का अर्थ है इन्द्रियस्वभावत्व । यहाँ कोई शङ्का उठाते हैं कि (प्र.) भूत इन्द्रियों की प्रकृति (समवायिकारण) नहीं है, क्योंकि इन्द्रियाँ वस्तुओं के साथ असम्बद्ध होकर ही अपना काम करती हैं । भौतिक वस्तुओं का यही स्वभाव है कि अपने विषयों के साथ सम्बद्ध होकर ही अपना काम करें, जैसे कि प्रदीप । (उ.) किन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि व्यवहित वस्तुओं की इन्द्रियों से उपलब्धि नहीं होती । अगर इन्द्रियाँ अपने से असम्बद्ध विषयों का भी ग्रहण करें, तो फिर दीवाल प्रभृति से ढके हुए अपने विषयों का भी वे ग्रहण कर सकती हैं । दीवाल से घिरे और न घिरे हुए वस्तुओं में तो कोई अन्तर नहीं है, और इन्द्रियों की असम्बद्धता तो दोनों प्रकार की वस्तुओं में समान है । (प्र.) व्यवहित वस्तुओं में प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है, अतः उनका प्रत्यक्ष नहीं होता है ? (उ.) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि व्यवहित विषयों में प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है ? या इन्द्रियों में व्यवहित विषयों के प्रत्यक्ष के उत्पादन की योग्यता नहीं है ? इन्द्रियों की योग्यता है विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य, सो उनमें है ही । क्योंकि उस समय भी अव्यवहित विषयों का वे ग्रहण करती
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६१ न्यायकन्दली महत्त्वानेकद्रव्यवत्त्वरूपविशेषाद्यात्मिका व्यवधानेऽपि न निवृत्तैव, आर्जवावस्थानमपि तदवस्थमेव । अथ मतम्- आवरणाभावोऽप्यर्थप्रतीतिकारणं संयोगाभाव इव पतन- कर्म्मणि, आवरणे सत्यावरणाभावो निवृत्त इति प्रतीतेरनुत्पत्तिः कारणाभावादिति । नैतत्सारम्, आवरणस्य स्पर्शवद्द्रव्यप्राप्तिप्रतिषेधभावोपलब्धेः, छत्रादिकं हि पततो जलस्य सावित्रस्य च तेजसः प्रतिषेधति, न तु स्वस्याभावमात्रं निवर्त्तयति । तथा सति सुलभ- मेतदनुमानम्-प्राप्तप्रकाशकं चक्षुः, व्यवहितार्थाप्रकाशकत्वात् प्रदीपवत्, बाह्येन्द्रियत्वात् त्वगि- न्द्रियवत् । नन्वेवं तर्हि विप्रकृष्टार्थग्रहणं कुतः ? रश्म्यर्थसन्निकर्षादनुद्भूतरूपस्पर्शा नायना ही हैं। विषयों में प्रत्यक्ष होने की योग्यता है महत्त्व, अनेकद्रव्यवत्त्वादि, सो दीवाल से घिर जाने पर भी विषयों से हट नहीं जाती । दीवाल से घिर जाने पर भी वे इन्द्रियों के सामने ही रहती हैं । (प्र.) जिस प्रकार संयोग का अभाव भी पतन का कारण है, उसी प्रकार आवरण का अभाव भी प्रत्यक्ष का कारण है । आवरण के रहते हुए आवरण का अभाव नहीं रह सकता, अतः दीवाल से घिरी हुई वस्तुओं का प्रत्यक्ष नहीं होता, क्योंकि वहाँ आवरणाभावरूप कारण ही नहीं है । (उ.) आवरण का इतना ही काम है कि स्पर्श से युक्त द्रव्यों के साथ संयोग न होने दे । जैसे छाता गिरते हुए पानी या धूप के साथ संयोग को नहीं होने देता । आवरण का इतना ही काम नहीं है कि अपने अभाव को हटाये । अतः (१) यह अनुमान सुलभ है कि चक्षु अपने से सम्बद्ध वस्तुओं का ही प्रकाशक है, क्योंकि व्यवहित वस्तुओं का प्रकाश उससे नहीं होता, जैसे कि प्रदीप । (२) अथवा चक्षुरादि (इन्द्रियाँ) अपने से सम्बद्ध वस्तुओं के ही प्रकाशक हैं, क्योंकि वे बाह्येन्द्रिय हैं, जैसे कि त्वगिन्द्रिय । (प्र.) तो फिर चक्षु से कुछ दूर हटी हुई वस्तुओं का ही प्रत्यक्ष (क्यों) और कैसे होता है ? (उ.) चक्षु की रश्मियों के साथ विषयों के संयोग से । 1 अनुद्भूत रूप और अनुद्भूत स्पर्श से युक्त चक्षु की रश्मियाँ वहाँ विद्यमान वस्तुओं के प्रत्यक्ष को उत्पन्न
- चक्षु की रश्मियाँ दूर की वस्तुओं को ग्रहण करने के लिए अगर उनके देशों तक जाती हैं तो फिर सूर्य की रश्मियों की तरह उनके रूप और स्पर्श का भी प्रत्यक्ष होना चाहिए, किन्तु होता नहीं है । अतः "चक्षु की रश्मियाँ दूर जाकर वस्तुओं का ग्रहण करती हैं" यह कहना ठीक नहीं है । इसी पूर्वपक्ष के समाधान की सूचना देने के लिए कन्दलीकार ने चक्षु की रश्मियों में अनुद्भूत रूप और अनुद्भूत स्पर्श, ये दो विशेषण लगाये हैं । कहने का तात्पर्य है कि अगर चक्षु की रश्मियों का विषय देश तक जाना युक्तियों से सिद्ध है तो फिर उनके रूप और स्पर्श की अनुपलब्धि से वह हट नहीं सकती । उनके प्रत्यक्षापत्तिवारण का यह उपाय सुलभ है कि रश्मियों के रूप और स्पर्श को अनुद्भूत मान लेना ।
६२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- न्यायकन्दली रश्मयो दूरे गत्वा सन्तंमर्थं गृह्णन्ति, अत एव महदणुप्रकाशकत्वात् किमिन्द्रियस्य भौतिकत्वं न सिद्ध्यति ? प्रदीपस्येव रश्मिद्वारेण तदुपपत्तेः । यत्र च रश्मयो भूयोभिः स्वावयवैः सहार्थायवयविना तदवयवैश्च सह सम्बद्ध्यन्ते, तत्राशेषविशेषास्कन्दितस्यार्थस्य ग्रहणात् स्पष्टं ग्रहणम् । यत्र त्ववयवमात्रेण सम्बन्धस्तत्र सामान्यमात्रविशिष्टस्य धर्म्मिणो ग्रहणादस्पष्टं ग्रहणम् । यद् गच्छति तत् सन्निहितव्यवहितार्थौँ क्रमेण प्राप्नोति । तत् कथं शाखाचन्द्रमसोस्तुल्यकालोपलब्धिरिति चेत् ? इन्द्रियवृत्तेराशुसञ्चारित्यात् पलाशशतव्यति- भेदवत् क्रमाग्रहणनिमित्तोऽयं भ्रमो न तु वास्तवं यौगपद्यम् । ननु प्राप्तिपक्षे सान्तरा- लोऽयमिति ग्रहणं न स्यात् ? न, अन्यथा तदुपपत्तेः । इन्द्रियसम्बन्धस्यातीन्द्रियत्यान्न तदभावाभावकृतौ सान्तरनिरन्तरप्रत्ययौ, किन्तु शरीरसम्बन्धभावाभावकृतौ, यत्र शरीरसम्बद्धस्यार्थस्य ग्रहणं तत्र निरन्तरोऽयमिति प्रत्ययः, यत्र तु तदसम्बद्धस्य ग्रहणं तत्र सान्तर इति । करती हैं । इन्द्रियाँ चूँकि छोटी और बड़ी दोनों प्रकार की वस्तुओं को दिखलाती हैं, इससे भी उनमें भौतिकत्व की सिद्धि क्यों नहीं होगी ? प्रदीप की तरह रश्मियों में भी भौतिकता सिद्ध हो सकती है । जहाँ पर रश्मियाँ अपने बहुत से अवयवों को लेकर अवयवी रूप वस्तु और उनके अवयवों के साथ सम्बद्ध होती हैं, वहाँ सभी विशेषों से युक्त अवयवी का ज्ञान होता है । अतएव वह ज्ञान 'स्पष्ट ग्रहण' कहलाता है । जहाँ वे केवल वस्तुओं के किसी अवयव के साथ ही सम्बद्ध होती हैं, वहाँ सामान्यधर्म से युक्त ही उस धर्मी का ज्ञान होता है, जिसे 'अस्पष्ट ग्रहण' कहते हैं । (प्र.) गतिशील वस्तु समीप की वस्तुओं के साथ पहले सम्बद्ध होती है और दूर की वस्तुओं के साथ पीछे, तो फिर गतिशील इन्द्रियों से शाखा और चन्द्रमा का ग्रहण एक ही समय क्यों होता है ? (उ.) वस्तुतः एक समय में शाखा और चन्द्रमा दोनों का ज्ञान नहीं होता है । दोनों के ज्ञान क्रमशः ही होते हैं, किन्तु इन्द्रियाँ इतनी शीघ्रता से चलती हैं कि उनकी गति के क्रम का ज्ञान नहीं हो पाता । अतएव यह भ्रम होता है कि शाखा और चन्द्रमा दोनों का ज्ञान एक ही समय होता है । जैसे फूल के सौ पत्रों को सूई से छेदने पर उसका क्रम उपलब्ध नहीं होता और भ्रम होता है कि एक ही समय में सभी पत्रों का छेदन हुआ है । (प्र.) 'इन्द्रियाँ अपने से सम्बद्ध वस्तुओं का ही ग्रहण करती हैं' इस पक्ष में विषय और इन्द्रियों में सार्वजनीन व्यवधान की प्रतीति अनुपपन्न होगी ? (उ.) नहीं, क्योंकि दूसरी रीति से उसकी उपपत्ति हो सकती है। इन्द्रियों का सम्बन्ध अतीन्द्रिय है, अतः उसकी सत्ता से व्यवधान की प्रतीति और असत्ता से अव्यवधान की प्रतीति नहीं हो सकती, किन्तु शरीरसम्बन्ध की सत्ता और असत्ता से ही उक्त दोनों प्रतीतियाँ
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३ प्रशस्तपादभाष्यम् चतुर्णां द्रव्यारम्भकत्वस्पर्शवत्त्वे । त्रयाणां प्रत्यक्षत्वरूपवत्त्वद्रवत्वानि । पृथिवी, जल, तेज, और वायु इन चार द्रव्यों का द्रव्य को उत्पन्न करना और स्पर्श से युक्त होना ये दो साधर्म्य हैं । पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों का प्रत्यक्षत्व, रूपवत्त्व और द्रवत्व ये तीन साधर्म्य हैं । न्यायकन्दली बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्यविशेषगुणवत्त्वानीति । बाह्यैकैकेन्द्रियेण चक्षुरादिना ग्राह्या ये विशेषगुणा रूपादयस्तैस्तद्वत्ता पृथिव्यादीनामिति । अन्तःकरणग्राह्यत्वमप्येषां गुणानामस्ति, ततश्चैकैकेन्द्रियग्राह्यत्वमसिद्धम्, तदर्थं बाह्यग्रहणम् । एकैकग्रहणं स्वरूपकथनार्थम् । चतुर्णां द्रव्यारम्भकत्वस्पर्शवत्त्वे । चतुर्णां पृथिव्युदकानलानिलानाम् । द्रव्यारम्भ- कत्वं द्रव्यं प्रति समवायिकारणभावः । स च निजा शक्तिरेव । स्पर्शवत्त्वं स्पर्शसमवायः । त्रयाणां प्रत्यक्षत्वरूपवत्त्वद्रवत्वानि । त्रयाणां क्षित्युदकतेजसां प्रत्यक्ष- त्वमिन्द्रियजज्ञानप्रतिभासमानता, न तु महत्त्वादिकारणयोगः, रूपवत्त्व- होती हैं । जहाँ शरीर से सम्बद्ध अर्थ का ग्रहण होता है, उस अर्थ में 'यह व्यवधानरहित है' इस प्रकार की बुद्धि होती है और जहाँ शरीर से असम्बद्ध अर्थ का ग्रहण होता है उस अर्थ में 'यह व्यवहित है' इस प्रकार की प्रतीति होती है । 'बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्यगुणवत्त्वानि' अर्थात् चक्षुरादि एक-एक बाह्य इन्द्रियों से गृहीत होनेवाले जो रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द, ये पाँच विशेष गुण हैं, 'तद्वत्त्व' पृथिव्यादि पाँच द्रव्यों का साधर्म्य है । ये रूपादि मन रूप अन्तरिन्द्रिय से भी गृहीत होते हैं, अतः उनमें 'एकैकेन्द्रियग्राह्यत्व' नहीं रह सकता, अतः 'बाह्य' पद का प्रयोग है । 'एकैक' पद केवल इस वस्तुस्थिति को समझाने के लिए है कि कथित रूपादि पाँच विशेष गुण एक-एक बाह्य इन्द्रिय से ही गृहीत होते हैं, संयोगादि की तरह दो इन्द्रियों से नहीं । 'चतुर्णाम्' अर्थात् पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों का 'द्रव्यारम्भ- कत्व' अर्थात् द्रव्य का समवायिकारणत्व साधर्म्य है । यह उनकी स्वाभाविक शक्ति है । 'स्पर्शवत्त्व' शब्द का अर्थ है, स्पर्श का समवाय । 'त्रयाणाम्' अर्थात् पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों का 'प्रत्यक्षत्व' साधर्म्य है । इस 'प्रत्यक्षत्व' शब्द का अर्थ है इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न ज्ञान में प्रतिभासित
६४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् द्वयोर्गुरुत्वं रसवत्त्वञ्च । भूतात्मनां वैशेषिकगुणवत्त्वम् । पृथिवी और जल इन दोनों का गुरुत्व और रसवत्त्व ये दो साधर्म्य हैं । भूत अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश ये पाँच और आत्मा इन छः द्रव्यों का विशेषगुणवत्त्व साधर्म्य है । न्यायकन्दली मित्यस्य पुनरुक्तत्वप्रसङ्गात् । नन्वात्मनोऽपि प्रत्यक्षत्वमस्ति ? सत्यम्, बाह्येन्द्रियापेक्षया त्रयाणामित्युक्तम् । तथा रूपवत्त्वं रूपसमवायः । द्रवत्वं द्रवत्वन्नाम गुणान्तरम् । द्वयोर्गुरुत्वम् । द्वयोः पृथिव्युदकयोः, गुरुत्वन्नाम गुणान्तरम्, तस्य भावात् पृथिव्यामुदके च गुरुशब्दनिवेशः । रसवत्त्वञ्च रससमवायः, न केवलं तयोर्गुरुत्वं रसवत्त्वञ्चेति चार्थः । भूतात्मनां वैशेषिकगुणवत्त्वम् । भूतानां पृथिव्यप्तेजोवायुनभसामात्मनां च वैशेषिक- गुणयोगः । विशेषो व्यवच्छेदः, विशेषाय स्वाश्रयस्येतरेभ्यो व्यवच्छेदाय प्रभवन्तीति वैशेषिका रूपादयस्तद्योगो भूतात्मनाम् । होना, महत्त्वादि प्रत्यक्ष के कारणों का सम्बन्ध नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर इन तीनों के रूपवत्त्व को साधर्म्य कहना पुनरुक्ति-दुष्ट हो जाएगा । प्रत्यक्षत्व तो आत्मा में भी है ? (उ.) हाँ है, किन्तु यहाँ बाह्य इन्द्रियों से उत्पन्न प्रत्यक्ष का ही ग्रहण है । एवं 'रूपवत्त्व' शब्द का अर्थ है रूप का समवाय और 'द्रवत्व' शब्द से द्रवत्व नाम का स्वतन्त्र गुण विवक्षित है । 'द्वयोः' पृथिवी और जल इन दोनों का 'गुरुत्व' अर्थात् गुरुत्व नाम का स्वतन्त्र गुण साधर्म्य है । इसी गुरुत्व नामक गुण के सम्बन्ध से पृथिवी और जल ये दोनों 'गुरु' शब्द से व्यवहृत होते हैं । 'रसवत्त्व' शब्द से रस का समवाय इष्ट है । गुरुत्व और रसवत्त्व इन दोनों में से केवल गुरुत्व ही या केवल रसवत्त्व ही पृथिवी और जल के साधर्म्य नहीं हैं, किन्तु दोनों मिलकर उनके साधर्म्य हैं, यही 'च' शब्द से सूचित होता है । 'भूतात्मनाम्' अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश एवं आत्मा इन छः द्रव्यों का वैशेषिक गुण का सम्बन्ध साधर्म्य है । यहाँ 'विशेष' शब्द का अर्थ है 'भेद' (व्यवच्छेद) "विशेषाय स्वाश्रयस्येतरेभ्यो व्यवच्छेदाय प्रभवन्तीति वैशेषिकाः" इस व्युत्पत्ति के अनुसार अपने आश्रय को जो गुण भिन्न पदार्थों से अलग रूप से समझावे वही यहाँ 'वैशेषिक' शब्द का अर्थ है । इन्हीं रूपादि विशेष गुणों का योग पृथिव्यादि पाँच भूत एवं आत्मा इन छः द्रव्यों का साधर्म्य है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५ प्रशस्तपादभाष्यम् क्षित्युदकात्मनां चतुर्दशगुणवत्त्वम् । आकाशात्मनां क्षणिकैकदेशवृत्तिविशेषगुणवत्त्वम् । दिक्कालयोः पञ्चगुणवत्त्वं सर्वोत्पत्तिमतां निमित्तकारणत्वञ्च । पृथिवी, जल और आत्मा इन तीन द्रव्यों का चौदह गुणों का सम्बन्ध साधर्म्य है । आकाश और आत्मा इन दो द्रव्यों के क्षणिक एवं अव्याप्यवृत्ति (अर्थात् अपने आश्रय के किसी एक अंश में ही रहनेवाला) विशेष गुण साधर्म्य है । दिशा और काल इन दो द्रव्यों के¹ (संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग) पाँच गुण और सभी उत्पत्तिशील पदार्थों का निमित्तकारणत्व ये दो साधर्म्य हैं । न्यायकन्दली क्षित्युदकात्मनां चतुर्दशगुणवत्त्वम् । क्षितेरुदकस्यात्मनां चतुर्दशगुणयोगः । आकाशात्मनाञ्च क्षणिकैकदेशवृत्तिभिर्विशेषगुणैः सह योगो विद्यत इत्याह- आकाशात्मनामिति । विशेषगुणाः पृथिव्यादीनामपि सन्ति, तन्निवृत्त्यर्थमेकदेशवृत्ति- ग्रहणम् । ये च ते आकाशात्मनामव्याप्यवृत्तयो विशेषगुणास्तेषामाशुतरविनाशित्वञ्च स्वरूपमस्तीति क्षणिकसङ्कीर्त्तनं कृतम् । सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः पञ्चैव गुणा दिशि काले च वर्त्तन्त इत्याह- दिक्कालयोरिति । न केवलमनयोः पञ्चगुणवत्त्वं साधर्म्यं सर्वोत्पत्तिमतां पृथिवी, जल और आत्मा, इन तीन द्रव्यों का चौदह¹ गुणों का सम्बन्ध साधर्म्य है । 'आकाशात्मनाम्' इत्यादि सन्दर्भ से कहते हैं कि आकाश में और आत्माओं में क्षणिक एवं 'अव्याप्यवृत्ति' (अपने आश्रय के किसी एक देश में रहनेवाले) विशेष गुणों का सम्बन्ध है । विशेष गुण पृथिवी प्रभृति द्रव्यों में भी हैं, अतः 'एकदेश- वृत्ति' यह पद है । 'क्षणिक' पद का उपादान यह सूचना देने के लिए है कि आकाश और आत्माओं के जितने भी 'अव्याप्यवृत्ति' अर्थात् अपने आश्रय को व्याप्त कर न रहनेवाले विशेष गुण हैं, अतिशीघ्र नष्ट हो जाना ही उनका स्वरूप है । 'दिक्कालयोः' इत्यादि से कहते हैं कि संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये ही पाँच गुण दिशा और काल में रहते हैं । उक्त पाँच गुण ही इन दोनों के साधर्म्य
- रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व और वेगाख्य तथा स्थितिस्थापक संस्कार ये चौदह गुण पृथिवी के हैं । इन्हीं चौदह गुणों में गन्ध के स्थान पर स्नेह को रख देने से जल के चौदह गुण हो
६६ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- न्यायकन्दली निमित्तकारणत्वञ्च साधर्म्यम् । ननु दिक्कालौ सर्वेषामुत्पत्तिमत्तां निमित्तमिति कुत एतत् प्रत्येतव्यम् ? यदि सन्निधि- मात्रेण ? आकाशस्यापि कारणत्वं स्यात्, अथ तद्व्यपदेशात् ? सोऽप्यनैकान्तिकः, गृहे जातो गोष्ठे जात इत्यनिमित्तेऽपि दर्शनात् । अत्रोच्यते-अस्ति तावत् तन्त्वादिप्रतिनियमात् पटाद्युत्पत्तिर्यद्देशविशेषनियमात् कालविशेषनियमाच्च सर्वेषामुत्पत्तिः, यदि देशकाल- विशेषावपि न कारणम्, अत्र क्वचन हेतवः कार्यं कुर्युर्विशेषात् । सर्वदा सर्वत्र कारणाभावात् कार्यानुत्पत्तिरिति चेत् ? यत्र देशे काले च कारणानि भवन्ति, तत्र तेषां जनकत्वं नान्यत्रेत्यभ्युपगन्तव्यं विशिष्टदेशकालयोरङ्गत्वम्, कार्यजननाय तयोः कारणै- रपेक्षणीयत्वात् । इदमेव च देशस्य कालस्य च निमित्तत्वम्, यदेकत्र कार्योत्पत्ति- रन्यत्रानुत्पत्तिरिति । नहीं हैं, किन्तु सभी उत्पत्तिशील वस्तुओं का निमित्तकारणत्व भी इन दोनों का साधर्म्य है । (प्र.) यह कैसे समझें कि दिशा और काल सभी उत्पत्तिशील वस्तुओं के निमित्तकारण हैं ? अगर सभी वस्तुओं की उत्पत्ति के पहले नियत रूप से रहने के कारण ही ये दोनों सभी उत्पत्तिशील वस्तुओं के निमित्तकारण हैं, तो फिर आकाश में भी यह कारणता रहनी चाहिए । 'अभी घट की उत्पत्ति हुई है' या 'उस दिशा में पट की उत्पत्ति हुई है' इत्यादि व्यवहारों से भी काल और दिशा में निमित्तकारणता का मानना सम्भव नहीं है, क्योंकि निमित्तकारणता के बिना भी 'घर में घट की उत्पत्ति हुई और गोष्ठ में पट की उत्पत्ति हुई' इस प्रकार के व्यवहारों की उपपत्ति हो सकती है । (उ.) इस आक्षेप के उत्तर में कहना है कि जिस प्रकार पटादि कार्यों में यह नियम है कि वे तन्तु प्रभृति कारणों से ही उत्पन्न हों, उसी प्रकार सभी कार्यों की उत्पत्ति में देश और काल का भी नियम है । अगर ये दोनों अपेक्षित न हों तो फिर जहाँ-तहाँ विक्षिप्त कारणों से और भिन्नकालिक कारणों से भी कार्यों की उत्पत्ति होनी चाहिए, क्योंकि नियमित देश और नियमित काल के कारणों में और अनियत देश और अनियत काल के कारणों में स्वरूपतः (देश और काल के सम्बन्ध को छोड़कर) कोई अन्तर नहीं है । (प्र.) सभी देशों और सभी कालों में कारणों की सत्ता न रहने से ही सभी देशों और सभी कालों में कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है । (उ.) तो फिर यह मानना पड़ेगा कि जिस देश में और जिस काल में सम्मिलित होकर जो सब कारण कार्य को उत्पन्न कर सकें, उसी काल में और उसी देश में वे कारण हैं और कालों में नहीं और देशों में नहीं, जाते हैं । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, भावनाख्य संस्कार, धर्म और अधर्म ये चौदह गुण आत्मा के हैं ।
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७ प्रशस्तपादभाष्यम् क्षितितेजसोर्नैमित्तिकद्रवत्वयोगः । पृथिवी और तेज इन दो द्रव्यों का नैमित्तिक द्रवत्व का सम्बन्ध साधर्म्य है । न्यायकन्दली क्षितितेजसोर्नैमित्तिकद्रवत्वयोगः । निमित्तादुपजातं (नैमित्तिकम्), नैमित्तिकञ्च तद्द्रवत्वञ्चेति नैमित्तिकद्रवत्वम्, तेन सह क्षितितेजसोर्योगः, पार्थिवस्य सर्पिरादेस्तैजसस्य च सुवर्णरजतादेरग्निसंयोगेन विलयनात् । गुरुत्ववत्पार्थिवमेव द्रवत्वं दह्यमानेषु सुवर्णादिषु संयुक्तसमवायात् प्रतीयत इति चेत् ? न, पार्थिवद्रवत्वस्यात्यन्ताग्निसंयोगेन भस्मीभावोपलब्धेः, अस्य च तदभावात् । अत एव सुवर्णादिकमपि पार्थिवमेवेति कस्यचित् प्रवादोऽपि प्रत्युक्तः, पार्थिवत्वे सति सर्पिरादिवदत्यन्तवह्निसंयोगेन द्रवत्वोच्छेदप्रसङ्गात् । यदपीदमुक्तं पार्थिवं सुवर्णादिकम्, सांसिद्धिकद्रवत्वाभावे सति इस प्रकार यह स्वीकार करना पड़ेगा कि देश और काल भी कार्योत्पत्ति के अङ्ग हैं, क्योंकि कार्य के उत्पादक सभी कारण काल और दिशा की अपेक्षा रखते हैं । काल और दिशा में सभी कार्यों का यही निमित्तकारणत्व है कि किसी कालविशेष और देशविशेष में ही कार्यों की उत्पत्ति होती है, सभी कालों और सभी देशों में नहीं । 'निमित्तादुपजातं नैमित्तिकम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो कारण से उत्पन्न हो उसे 'नैमित्तिक' कहते हैं । 'नैमित्तिकञ्च तद्द्रवत्वञ्चेति' इस कर्मधारय समास के बल से किसी निमित्त से उत्पन्न द्रवत्व ही 'नैमित्तिकद्रवत्व' शब्द का अर्थ है । उसके साथ सम्बन्ध ही पृथिवी और तेज का साधर्म्य है; क्योंकि घृतादि पार्थिव द्रव्य और सुवर्णादि तैजस द्रव्य आग के संयोग से विलीन होते (पिघलते) दीख पड़ते हैं, अतः उनमें अवश्य ही नैमित्तिक द्रवत्व है । (प्र.) जिस प्रकार सुवर्ण में पार्थिव गुरुत्व की ही उपलब्धि संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से होती है, उसी प्रकार सुवर्ण में पृथिवीगत नैमित्तक द्रवत्व की ही संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से उपलब्धि होती है । (अर्थात् सुवर्ण में नैमित्तिक द्रवत्व नहीं है ।) (उ.) घृतादि पार्थिव द्रव्यों में रहनेवाले नैमित्तिक द्रवत्व का यह स्वभाव है कि अग्नि के अत्यन्त संयोग से नष्ट हो जाना, सुवर्ण के द्रवत्व में यह बात नहीं है । इसी समाधान से स्वर्ण को पृथिवी होने का प्रवाद भी खण्डित हो जाता है, अगर सुवर्ण पार्थिव होता तो फिर घृतादि पार्थिव द्रव्यों के द्रवत्व की तरह सुवर्ण का द्रवत्व तो अग्नि के अत्यन्त संयोग से नष्ट हो जाता । (प्र.) यह जो विरोधी अनुमान का प्रयोग किया जाता है कि सुवर्ण पार्थिव ही है; क्योंकि सांसिद्धिक द्रवत्व के न रहने पर भी उसमें गुरुत्व है, जैसे कि ढेले में । (उ.) इस
६८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् एवं सर्वत्र साधर्म्यं विपर्ययाद्वैधर्म्यञ्च वाच्यमिति द्रव्यासङ्करः । इसी प्रकार रहने के कारण साधर्म्य और नहीं रहने के कारण वैधर्म्य समझना चाहिए । अतः द्रव्यों में कोई साङ्कर्य नहीं है । न्यायकन्दली गुरुत्वाधिकरणत्वाल्लोष्टादिवत्, तदप्यसारम्, किं तत्र गुरुत्वस्योपलब्धिस्तद्गुणत्या- दुतान्यगुणत्वेऽपि घृतादिष्वपि स्नेहवत् स्वाश्रयप्रत्यासत्तिनिमित्तादिति संशयस्यानिवृत्तेः । यदपि साधनान्तरं परप्रकाशयमानत्वादिति, तदप्यनुद्भूतरूपवत्त्वेनाप्युपपत्तेरसाधनम् । दिङ्मात्रमस्माभिरुपदिष्टम् । अनेनैव न्यायेन सर्वत्र पदार्थेऽन्यदपि साधर्म्यं स्वयं वाच्यम्, विपर्ययादितरव्यावृत्तेवैधर्म्यं वाच्यमिति शिष्यानाह- एवमिति । अनुद्दिष्टेषु पदार्थेषु न तेषां लक्षणानि प्रवर्तन्ते निर्विषयत्वात्, अलक्षितेषु च तत्त्वप्रतीत्यभावः कारणाभावात्, अतः पदार्थव्युत्पादनाय प्रवृत्तस्य शास्त्रस्योभयथा प्रवृत्तिः उद्देशो लक्षणञ्च । परीक्षायास्त्वनियमः । यत्राभिहिते लक्षणे प्रवादान्तरव्याक्षेपात्तत्त्वनिश्चयो न भवति, तत्र परपक्षव्युदासार्थं अनुमान में भी कुछ सार नहीं है; क्योंकि सुवर्ण में जिस गुरुत्व की उपलब्धि होती है वह उसका अपना गुण है, जैसे कि ढेले में, या उसमें संयुक्त किसी दूसरे द्रव्य का है, जैसे कि तेल में स्नेह का, इस संशय की निवृत्ति नहीं होती है । 'सुवर्ण तैजस नहीं है' इसको सिद्ध करने के लिए कोई यह हेतु देते हैं कि सुवर्ण तैजस इसलिए नहीं है कि वह (दीपादि) दूसरी वस्तुओं से प्रकाशित होता है, किन्तु यह भी हेत्वाभास ही है, क्योंकि स्वर्ण को (दीपादि) दूसरे द्रव्यों से प्रकाशित होने की उपपत्ति उसके भास्वर शुक्ल रूप को अनुद्भूत मान लेने से भी हो सकती है । सुवर्ण में तैजसत्व की साधक और बाधक युक्तियों का यहाँ हम लोगों ने दिग्दर्शन मात्र किया है । इसी प्रकार सभी पदार्थों में और साधर्म्यों की भी कल्पना स्वयं करनी चाहिए । एवं जो साधर्म्य जिनमें न हो उसको उनका वैधर्म्य समझना चाहिए । इसी विषय को शिष्यों को समझाने के लिए आगे 'एवम्' इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं । जिन पदार्थों का उल्लेख नामतः नहीं होता है, उनमें लक्षण की प्रवृत्ति नहीं होती है; क्योंकि उस लक्षण का कोई लक्ष्य ही निर्दिष्ट नहीं रहता है । एवं बिना लक्षण के पदार्थों का बोध ही असम्भव है । अतः पदार्थों के प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रों की प्रवृत्ति नियमतः (१) उद्देश और (२) लक्षण भेद से दो ही प्रकार की होती है, परीक्षा रूप शास्त्र की प्रवृत्ति के प्रसङ्ग में नियम नहीं है, (अर्थात्) जहाँ लक्षण कहे जाने के