वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ प्रशस्तपादभाष्यम् (२) सदसत् (९।१।२) । पहले से विद्यमान भी घटादि कार्य नाश के बाद असत् हैं; (क्योंकि नाश के बाद भी उनमें गुणक्रियादि का व्यवहार नहीं होता) । (३) असतः क्रियागुणव्यपदेशाभावादर्थान्तरम् । अविद्यमान पदार्थों में यतः गुणक्रियादि का व्यवहार नहीं होता है, अतः अभाव पदार्थ द्रव्यादि भावपदार्थों से भिन्न पदार्थ है । (४) सच्चासत् (९।१।४) सत् अर्थात् विद्यमान घटादि का भी प्रतिषेध होता है (यह प्रतिषेध ही अन्योन्याभाव है) । (५) यच्चान्यदसत्तत्सदसत् (९।१।५) । कथित तीनों प्रकार के अभावों से भिन्न अभाव भी हैं (यही अत्यन्ताभाव है) । इनमें तीसरे सूत्र से अभाव को द्रव्यादि छः पदार्थों से भिन्न ठहराया गया है और शेष चार सूत्रों में से पहला प्रागभाव का, दूसरा ध्वंस का, चौथा अन्योन्याभाव का एवं पाँचवाँ अत्यन्ताभाव का ज्ञापक है । अतः इन सूत्रों के द्वारा अभाव का द्रव्यादि छः पदार्थों से स्वातन्त्र्य है और उसके प्रागभावादि चारों भेद सुव्यवस्थ हैं । सुतराम् उद्देश्य सूत्र में अभाव पदार्थ का पृथक् रूप से उल्लेख न रहने के कारण सूत्रकार के ऊपर न्यूनता का ही आक्षेप कथञ्चित् हो सकता है । इससे अभाव के प्रसङ्ग में उनकी असम्मति नहीं मानी जा सकती । उपसंहार सूत्रों के अनुसार भी उपक्रम सूत्र में ह्रास-वृद्धि अनेक स्थानों में देखी जाती है । दूसरी बात यह है कि मिथिला विद्यापीठ से और बड़ौदा से जो वैशेषिकसूत्र छपे हैं, उन दोनों में ही "द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानाम्" इत्यादि उद्देश्य- सूत्र हैं ही नहीं । अतः इस सूत्र का प्रामाण्य ही सन्दिग्ध है । अतः सन्दिग्ध प्रामाण्यवाले सूत्र के द्वारा किसी निश्चित परिणाम पर नहीं पहुँचा जा सकता । वैशेषिकदर्शन के प्रसङ्ग में षट्पदार्थ-प्रतिपादक और जितने भी वाक्य हैं, वे सभी कथित वैशेषिक सूत्रों से दुर्बल ही हैं । अतः प्रवादों के बल पर अभाव की वैशेषिकशास्त्रीय स्वीकृति काटी नहीं जा सकती है । इन सभी उपपत्तियों के अनुसार मेरी सम्मति में अभाव पदार्थ भी महर्षि- कणाद के द्वारा स्वीकृत है । इस पुस्तक के पाठ के प्रसङ्ग में मैंने साधारणतः मुद्रित न्यायकन्दली का ही अनुसरण किया है; किन्तु जहाँ कहीं मुझे ऐसे पाठ मिले, जिनसे प्रकृत अर्थ का बोध ही संभव नहीं था, उनको यथामति संशोधन करके तदनुसार ही अनुवाद किया है; किन्तु मूल में यथावत् प्रायः मुद्रित पुस्तक के पाठ को ही रहने दिया है । नीचे टिप्पणी में उपपत्ति सहित उन पाठभेदों का उल्लेख कर दिया है । विद्वान् लोग इस पर अवश्य दृष्टिपात करें ।