वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ५५ अनुवाद में मैंने अर्थ को स्पष्ट करने के अभिप्राय से कुछ अधिक शब्दों के प्रयोग का स्वातन्त्र्य ग्रहण किया है । इतने बड़े आकार के ग्रन्थ में न्यूनता के अतिरिक्त भ्रम और प्रमाद की पूरी सम्भावना है । अतः विद्वानों से क्षमा-याचना पूर्वक प्रार्थना है कि ऐसे स्थलों से मुझे अवश्य अवगत करावें । जिससे अगर इसका पुनः संस्करण संभव हुआ तो उन अवगतियों से लाभ उठाया जा सके । तद्विद्वांसोऽनुगृह्णन्तु चित्तश्रोत्रैः प्रसादिभिः । सन्तः प्रणयिवाक्यानि गृह्णन्ति ह्यनसूयवः ॥ आचार्य कुमारिल भट्ट के इस श्लोक के साथ मैं इस भूमिका को समाप्त करता हूँ । दुर्गाधर झा अनुसन्धान-सहायक वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी