भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५४१ न्यायकन्दली अत्रोच्यते-पदानि वाक्यार्थप्रतिपादनाय प्रयुज्यन्ते । तानि प्रत्येकं पदार्थसंस्पर्शा- त्मकं वाक्यार्थं प्रतिपादयितुमशक्नुवन्त्यपर्यवसितव्यापारत्वाद् एकार्थकारिणी पदान्तराण्य- पेक्षन्ते । यत्र पुनरमीभिर्वाक्यार्थः प्रतिपादितः, तत्रैषां शब्दान्तरापेक्षा नास्त्येव, स्वव्या- पारस्य कृतत्वात् । यस्तेरूपपादितोऽर्थः स नोपपद्यत इति चेत् । नोपपादि, न ह्यर्थस्याविरोधोपपादनमपि शब्दस्य व्यापारः, किन्तु प्रतिपादनम् । तच्चानेनासन्नि- हितेऽपि रात्रिवाक्ये कृतमेव । प्रतीयते हि दिवाऽभोजनवाक्यात् पीनस्याभोजनम्, निःसन्दिग्धाऽभ्रान्ता चात्रेयं प्रतीतिः, अन्यथाऽर्थापत्तेरपि प्रवृत्त्यभावात् । निश्चितस्यैव हि पीनस्य दिवाऽभोजनप्रमाणसिद्धस्यानुपपत्तिर्न युक्तेति तदुपपादनमर्थ्यते, सन्दिग्धे विपरीतत्वेन चावधारिते तस्मिन् कस्योपपत्तयेऽर्थान्तरकल्पना स्यात् ? न चार्थयोः पर- इस प्रसङ्ग में हम लोगों का कहना है कि वाक्य के अर्थ को समझाने के लिए ही पदों का प्रयोग किया जाता है । वाक्य में प्रयुक्त होनेवाले पदों के अर्थ ही परस्पर उपयुक्त सम्बन्ध से युक्त होकर 'वाक्यार्थ' कहलाते हैं । इस विशिष्ट वाक्यार्थ को कोई एक पद नहीं समझा सकता; क्योंकि पदों में केवल अपने-अपने ही अर्थ को समझाने का सामर्थ्य होता है । अतः एक पद अपने अर्थ के साथ और अर्थों के सम्बन्ध के लिए दूसरे पदों की अपेक्षा रखता है । जहाँ जितने ही पदों से वाक्यार्थविषयक बोध का सम्पादन हो जाता है, वहाँ उनसे भिन्न पदों की अपेक्षा नहीं होती है । इन पदों के द्वारा उपस्थित अर्थ में यदि अनुपपन्नता या विरोध है तो इसको छुड़ाने का दायित्व पदों पर नहीं है; क्योंकि अपने-अपने अर्थों का प्रतिपादन करना ही पदों का काम है, उनके विरोध को मिटाना नहीं । 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' यह वाक्य 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य का सान्निध्य न पाने पर भी दिन को भोजन न करनेवाले में पीनत्व रूप अपने अर्थ का बोध रूप काम तो कर ही दिया है; क्योंकि 'दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य से दिन में भोजन न करनेवाले में पीनत्व की अभ्रान्त एवं निःसन्दिग्ध प्रतीति हो जाती है । यदि 'दिवा' वाक्य से दिन को भोजन न करनेवाले में पीनत्व की अभ्रान्त और निःशङ्क प्रतीति न हो तो फिर आगे उससे अर्थापत्ति की प्रवृत्ति भी क्योंकर होगी ? दिन में न खाने पर भी देवदत्त में निश्चित पीनत्व की उपपत्ति ठीक नहीं बैठती है, उसकी उपपत्ति के लिए ही उसको प्रमाण सिद्ध रूप में समझाना आवश्यक होता है । दिन को न खाने पर भी देवदत्त में जो पीनता है, वह यदि इस स्थिति में सन्दिग्ध या विपरीत ही हो तो फिर उसकी उपपत्ति ही अपेक्षित नहीं है । अतः किसकी उपपत्ति के लिए रात्रि-भोजन रूप दूसरे अर्थ की कल्पना आवश्यक होगी ? किन्हीं दो अर्थों में परस्पर विरोध है, केवल इसीलिए 'उनकी प्रतीति ही नहीं होती' यह कहना