भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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पृष्ठ 507

५४२ न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् गुणेऽनुमानेऽभावप्रमाणान्तर्भाव- प्रशस्तपादभाष्यम् सम्भवोऽप्यविनाभावित्वादनुमानमेव । अभावोऽप्यनुमानमेव, यथोत्पन्नं कार्यं कारणसद्भावे लिङ्गम्, 'सम्भव' प्रमाण से भी व्याप्ति के द्वारा ही अर्थ का बोध होता है, अतः वह भी अनुमान ही है । अभाव प्रमाण भी अनुमान के ही अन्तर्गत है; क्योंकि जिस प्रकार न्यायकन्दली स्परविरोध इति तयोः प्रतीतिरप्रतीतिर्भवति । तस्मादर्थप्रतीतौ यवोपन्नः शब्दो न शब्दान्तरमपेक्षते, कर्तव्यतान्तराभावात् । अर्थ एव तु तेनाभिहितोऽर्थान्तरेण विनानुपपद्यमानः प्रतीत्यनुसारेण स्योपपत्तये मृगयतीत्यव्याहतं शब्दश्रवणादनुमितानुमान- मिति । शतं सहस्रे सम्भवतीति सम्भवाख्यात् प्रमाणान्तरात् सहस्रेण शतज्ञानमिति केचित् । तन्निरासार्थमाह-सम्भवोऽप्यविनाभावित्वादनुमानमेव । सहस्रं शतेनाविनाभूतम्, तत्पूर्व- कत्वात् । तेन सहस्राच्छतज्ञानमनुमानमेव । प्रमेयाभावप्रतीतौ भावग्राहकप्रत्यक्षादिपञ्चप्रमाणानुवृत्तिरभावाख्यं प्रमाणान्तरं कैश्चिदिष्टम् । तद् व्युदस्यति-अभावोऽप्यनुमानमेव । कथमित्यत ठीक नहीं है । अतः 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इत्यादि शब्द यदि दिन में न खानेवाले में 'पीनत्वादि' रूप अपने अर्थ को अभ्रान्त और निःशङ्क रूप से समझा देते हैं, तो फिर वे अपना कर्त्तव्य कर ही लेते हैं; क्योंकि उन शब्दों का उन अर्थों को समझाना छोड़कर दूसरा कोई कर्त्तव्य नहीं है । अपने इस कार्य के सम्पादन के लिए उन्हें 'रात्रौ भुङ्क्ते' इत्यादि किसी दूसरे शब्द की अपेक्षा नहीं है । तस्मात् दिन में न खानेवाले की पीनता रूप अर्थ ही रात्रि-भोजन रूप दूसरे अर्थ के बिना अनुपपन्न होकर अपनी उपपत्ति के लिए उस दूसरे अर्थ की खोज करता है, अतः 'दिवा न भुङ्क्ते' इस शब्द के श्रवण के बाद जो रात्रि-भोजन रूप अर्थ का बोध होता है, वह 'अनुमितानुमान' ही है । इसमें किसी प्रकार का विरोध नहीं है । 'हजार में सौ के रहने की सम्भावना है' इस प्रकार के सम्भव नाम के स्वतन्त्र प्रमाण से ही कोई सम्प्रदाय सहस्र संख्या से सौ संख्या का ज्ञान मानते हैं । उनका खण्डन करने के लिए ही 'सम्भवोऽप्यविनाभावादनुमानमेव' यह वाक्य लिखा गया है । अभिप्राय यह है कि सहस्र में सौ की व्याप्ति रूप सम्बन्ध है । इस व्याप्ति रूप सम्बन्ध के द्वारा ही उक्त ज्ञान होता है, अतः सहस्र संख्या से जो शत संख्या का ज्ञान होता है, वह भी अनुमान ही है । किसी सम्प्रदाय के लोग किसी वस्तु के अभाव की प्रतीति के लिए एक 'अभाव' नाम का और प्रमाण मानते हैं । एवं इस अभाव को भाव पदार्थों के ग्राहक प्रत्यक्षादि पाँच

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