वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे निर्णय- प्रशस्तपादभाष्यम् स प्रत्यक्षनिर्णयः । यथा स्थाणुपुरुषयोरूर्ध्वतामात्रसादृश्यालोचनाद् विशेषेष्व- प्रत्यक्षेष्ूभयविशेषांनुस्मरणात्, किमयं स्थाणुर्वा पुरुषो वेति संशयोत्पत्तौ शिरःपाण्यादिदर्शनात् पुरुष एवायमित्यवधारणज्ञानं प्रत्यक्षनिर्णयः । विषाणमात्रदर्शनाद् गौर्गवयो वेति संशयोत्पत्तौ सास्नामात्रादर्शनाद् गौरेवाय- मित्यवधारणज्ञानमनुमाननिर्णय इति । होते हैं। अतः १. प्रत्यक्षनिर्णय और २. अनुमाननिर्णय भेद से निर्णय दो प्रकार का है । १. (धर्मी के असाधारण धर्मरूप) विशेष के प्रत्यक्ष से जो संशय का विरोधी ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे 'प्रत्यक्षनिर्णय' कहते हैं । जैसे कि स्थाणु और पुरुष दोनों में साधारणरूप से रहनेवाली उच्चता (ऊँचाई) रूप सादृश्य के आलोचन (साधारण) ज्ञान से एवं स्थाणु और पुरुष दोनों के असाधारण धर्मों के ज्ञात न रहने के कारण केवल उन दोनों के असाधारण धर्मरूप विशेषों के स्मरण से, यह स्थाणु है ? या पुरुष ?' इस आकार के संशय की उत्पत्ति होती है । इसके बाद (केवल पुरुष में ही रहनेवाले शिर, पैर प्रभृति) पुरुष के असाधारण धर्मों के देखने से 'यह पुरुष ही है' इस आकार का जो निश्चयरूप ज्ञान उत्पन्न होता है, वही 'प्रत्यक्षनिर्णय' है । २. केवल सींग के देखने के कारण यह संशय होता है कि 'यह गो है या गवय ?' (इसके बाद केवल गाय में ही रहनेवाली) सास्ना के देखने से जो 'यह गाय ही है' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है, वही 'अनुमाननिर्णय' है । न्यायकन्दली सङ्ग्रहवाक्यं विवृण्वन्निर्णयस्य प्रत्यक्षानुमानयोरन्तर्भावं दर्शयति-एतदेवेत्यादि । प्रत्यक्षविषये यदवधारणात्मकं ज्ञानं स प्रत्यक्षनिर्णयः । यच्चानुमानविषयेऽवधारणज्ञानं सोऽनुमाननिर्णय इति उपरितनेन ग्रन्थसन्दर्भेण कथयति । प्रयुक्त) 'विशेरते' इस पद का अर्थ है 'संशेरते' अर्थात् संशय का होना । यद्यपि सभी प्रकार के निश्चयात्मक ज्ञान निर्णय हैं, फिर भी संशय के बाद होनेवाले निश्चयात्मक ज्ञान में ही 'निर्णय' शब्द का अधिकतर प्रयोग होता है, अतः निर्णय के लक्षणवाक्य में 'संशयविरोधि' पद का प्रयोग किया गया है । 'एतदेव' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अपने ही संक्षिप्त लक्षणवाक्य की व्याख्या करते हुए भाष्यकार ने 'निर्णय' का प्रत्यक्ष और अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाया है। ऊपर कहे हुए सन्दर्भ का संक्षिप्त अभिप्राय यह है कि प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का अवधारणात्मक ज्ञान 'प्रत्यक्षनिर्णय' है एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का जो अवधारणात्मक ज्ञान वह 'अनुमाननिर्णय' है ।