भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ६२५ प्रशस्तपादभाष्यम् लिङ्गदर्शनेच्छानुस्मरणायपेक्षादात्ममनसोः संयोगविशेषात् पट्वभ्यासादरप्रत्ययजनिताच्च संस्काराद् दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु लिङ्ग (हेतु) के दर्शन एवं इच्छा, स्मृति प्रभृति (उद्बोधकों) से साहाय्य- प्राप्त आत्मा और मन के विशेष प्रकार के संयोग और संस्कार इन दोनों से उत्पन्न ज्ञान ही स्मृति है । यह प्रत्यक्ष, अनुमिति एवं शाब्द- बोध के द्वारा ज्ञात विषयों की होती है, अतः स्मृति अतीतविषयक ही न्यायकन्दली स्मृतिक्षणां विद्यामाचष्टे - लिङ्गदर्शनेच्छेत्यादिना । लिङ्गदर्शनं चेच्छानुस्मरणं च । आदिशब्देन न्यायसूत्रोक्तानि प्रणिधानादीनि संगृह्यन्ते, तान्यपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगवि- शेषादिति स्मृतिकारणकथनम् । आत्ममनःसंयोगस्य च लिङ्गदर्शनादिसहकारितैव विशेषः, केवलादस्मात् स्मरणानुत्पत्तेः । लिङ्गदर्शनवत् संस्कारोऽपि स्मृतेर्निमित्तकारणमित्याह- पट्वभ्यासादरप्रत्ययजनितात् संस्काराज्जायते पटुप्रत्ययः स्फुटतरप्रत्ययस्तस्मात् संस्कारो जायते । तेन गच्छतृणसंस्पर्शज्ञानात् क्वचित् पटुप्रत्ययोत्पादेऽपि ग्रहणयोग्यः संस्कारो न भवति । यथा साक्षात् पठितेऽनुवाके । तेन गृहीतस्यावृत्त्या पुनःपुनर्ग्रहणलक्षणोऽभ्यासः संस्कारकारणम्, तस्मिन् सत्यनुवाकस्य ग्रहणदर्शनात् । 'लिङ्गदर्शनेच्छा' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा 'स्मृति' रूप विद्या (प्रमा) का निरूपण करते हैं । (उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'लिङ्गदर्शनेच्छानुस्मरण' शब्द से) 'लिङ्गदर्शनञ्च, इच्छा च, अनुस्मरणञ्च' इस व्युत्पत्ति के अनुसार, लिङ्गज्ञान, इच्छा और बार-बार स्मरण को एवं उक्त वाक्य में ही प्रयुक्त 'आदि' शब्द से न्यायसूत्र (अ. ३, आ. २, सू. ४४) में कथित स्मृति के प्रणिधानादि कारणों को संगृहीत समझना चाहिए । 'तान्यपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगविशेषात्' इस पूर्वानुवृत्तिवाक्य से स्मृति का कारण प्रदर्शित हुआ है। आत्मा और मन के संयोग को स्मृति के उत्पादन में जो कथित 'प्रणिधानादि' सहायकों की अपेक्षा होती है, वही उस संयोग का 'विशेष' है (जो प्रकृत वाक्य में प्रयुक्त 'संयोगविशेष' शब्द के द्वारा व्यक्त किया गया है ); क्योंकि (प्रणिधानादि के न रहने पर) केवल आत्मा और मन के संयोग से स्मृति की उत्पत्ति नहीं होती है । 'पट्वभ्यासादरप्रत्ययजनितात् संस्कारात्' इस वाक्य के द्वारा लिङ्गदर्शन की तरह संस्कार में भी स्मृति की निमित्तकारणता कही गयी है । 'पटुप्रत्यय' शब्द का अर्थ है स्फुटतर (उपेक्षान्य) प्रत्यय, उससे ही संस्कार की उत्पत्ति होती है । 'पटुप्रत्यय' शब्द का स्फुटतर प्रत्यय रूप अर्थ इसलिए कर दिया गया है कि राह चलते हुए पुरुष को किसी तृण के स्पर्श का यद्यपि पटुप्रत्यय होता है, फिर भी उससे स्मृति के उत्पादन में क्षम